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सर्वकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 366

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ५ ]

शय—मलद्रव में से चल कर जलीयांश मूत्राशय अर्थात् वस्ति में ही ठहरता है। गर्भाशय—गर्भ गर्भाशय में कई मास पर्यन्त ठहरता है। आशय का अर्थ है जिसमें आकर ठहरा जाता है। शुक्रशोणित गर्भाशय में आकर ठहरते हैं, अतः वह आशय कहलाता है। अधाङ्गहृदयशा० स्था० अ० ३ में—‘सप्त च आधारा रक्तस्य आधः क्रमात् परे। कफामपित्तपक्वानां वायोः मूत्रस्य च स्मृताः। गर्भाशयोऽष्टमः स्त्रीणां।’ आशय का नाम आधार है, इसका भी वही अर्थ है आगत को धारण करनेवाला। शाङ्खधर संहिता में स्तनों को भी दो आशय माना है। ये आशय माने जा सकते हैं, परन्तु क्लिष्ट कल्पना से। आशय को ‘स्थान’ भी कहते हैं—स्थानान्यामानिपक्वानां मूत्रस्य रुधिरस्य च। स्थान शब्द का अर्थ है—जहाँ गति—गमन की निवृत्ति हो जाय—चलते २ ठहरा जाय। इस प्रकार आशय, आधार तथा पर्याय वाचक हैं ॥८॥

सार्धत्रिज्यामान्यन्त्राणि पुंसां,

स्त्रीणांमर्धव्यामहीनानि ॥९॥

पुरुषों की आंत की लम्बाई साठे तीन व्याम है, स्त्रियों में आंतों की लम्बाई तीन व्याम है।

वक्तव्य—व्याम—हाथों को कन्धों के बराबर फैलाकर मध्यमांगुली से दूसरी मध्यमांगुली तक की लम्बाई व्याम है।

वि० मन्तव्य—व्याम ४ हाथ का होता है। पुमान् की अन्त्र की लम्बाई लगभग १४ हाथ, स्त्री की अन्त्र की लम्बाई लगभग १२ हाथ होती है। रक्त का प्रदाद—सार भाग ही मांस का रूप धारण करता है, अतः यह मांस से बनी कोमल नाली है, मोटाई अँगूठा जैसी। यह १४ हाथ लम्बी अँगूठा जैसी मोटी रबड़ की नाली की सी लचकीली और गेण्डली मारे सप के समान उदर में पड़ी रहती है, इसका प्रारम्भ आमाशय से और अन्त्र मलाशय के प्रारम्भिक भाग पर होता है, वस्तुतः आमाशय भी इसी का प्रारम्भिक भाग है और मलाशय अन्तिम भाग। इसके भीतरी भाग पर जो कला चिपकी रहती है उसमें आहार रस को ग्रहण करनेवाले अवयव होते हैं, अतः उसको ग्रहणी कहते हैं। अन्त्रोलपति के वर्णन में—(अ०४ सू० २६ २०) बतलाया गया है। अन्त्र शब्द ‘अम्’—गती धातु से बना है। जब आमाशय में आहार जाता है तब उसमें गति होने लगती है। फलतः विलोइन होने से आहार घुलने लगता है। जितना घुलता जाता है उतना अन्त्र में गिरने लगता है। अन्त्र के प्रारम्भिक भाग में पिताशय की नली का मुख लगा है उसके द्वारा पाचक पित्त आकर अन्त्र में मिलने लगता है और उसके प्रभाव से—आहार का रस—सार-भाग रस धातु पृथक् होने

लगता है और अन्त्र भर में ग्रहणी नामक कला के अवयवों द्वारा ग्रहीत-आन्वृषित हो जाता है। अबशिष्ट मलद्रव पक्वाशय अर्थात् मलाशय में चला जाता है। वहाँ जलांश आन्वृषित होकर मूत्र बनने के लिये रक्त में चला जाता है और गाढ़ा भाग पुरीष रूप में वहाँ रह जाता है ॥१॥

श्रवणनयनवदनघ्राणगुदमेढाणि नव स्तोतांसि नराणां वहिर्मुखाणि, एतान्येव स्त्रीणामपेराणि च त्रीणि द्वे स्तनयोरेधस्ताद्रक्तवहं च ॥१०॥

दो कान, दो नयन, मुख, २ नासिका, गुदा, मेहन में नौ स्तोत मनुष्यों में वहिर्मुख होते हैं। स्त्रियों में ये नौ स्तोत तो हैं ही, परन्तु तीन और अधिक हैं, इनमें दो स्तनों में और एक अपत्यपथ नीचे ॥१०॥

षोडश कण्डराः—तासां चतस्रः पादयोः, तावत्यो हस्तग्रीवापृष्ठेषु, तत्र हस्तपादगतानां कण्डराणां नखा अप्रप्ररोहाः, ग्रीवाहृदयनिबन्धिनोनामधोभागगतानां मेदः, श्रोणिपृष्ठनिबन्धिनोनामधोभागगतानां विम्बं, मूर्धोरुव-क्षोऽसपिण्डादीनां च ॥११॥

कण्डरायें सोलह हैं—इनमें चार कण्डरायें पैरों में, हाथ, ग्रीवा, पीठ में भी चार-चार हैं। इनमें हाथ पैर की कण्डराओं के अप्रप्ररोह (आगे निकले अंकुर रूप) नख हैं। ग्रीवा हृदय को बाँधनेवाली, नीचे की ओर गई हुई कण्डराओं का अप्रप्ररोह मेहन है। श्रोणि-पीठ-को बाँधनेवाली-नीचे (पीछे) की ओर जानेवाली कण्डराओं का प्ररोह विम्ब (नितम्ब) हैं। ऊरु, वक्ष, अंशपिण्ड इत्यादि की कण्डराओं का प्ररोह शिर है ॥११॥

मांसशिरास्नायवस्थिजालानि प्रत्येकं चत्वारि, तानि मणिबन्धगुरुफसंश्रितानि परस्परनिबद्धानि परस्परगवांक्षितानि चेति, यैर्गवांक्षितमिदं शरीरम् ॥१२॥

जालकों का वर्णन—मांस, शिरा, स्नायु और अस्थि प्रत्येक के चार चार जाल हैं। ये जाल मणिबन्ध (कलई), गुरुफ(गिद्ध) में स्थित हैं। एक दूसरे से परस्पर बंधे हुए हैं, और एक दूसरे में गवाक्ष (वातायन) की भाँति है। जिनसे कि यह शरीर गवांक्षित (छिद्रित) बना हुआ है, (मांस-शिरा स्नायु और अस्थि इनके जाल परस्पर फँसे हुए हैं) ॥१२॥

षट् कूर्चाः, ते हस्तपादग्रीवामेदेषु, हस्तयोर्द्वौ, पादयोर्द्वौ, ग्रीवामेद्वयोरेकैकः ॥१३॥

कूर्च छेः हैं—ये हाथ, पैर, ग्रीवा और मेहन में हैं। इनमें हाथ में दो, पैरों में दो, ग्रीवा में एक, मेहन में एक ॥१३॥

महत्यो मांसरज्जवश्चतस्रः—षुष्ठवंशमुभयतः पेक्षितिबन्धनाथ द्वे बाह्ये, आभ्यन्तरे च द्वे ॥१४॥