सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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अस्तेन केचिद्विहता मनुष्या माधुर्ययोगे प्रणयीभवन्ति ।
तथाऽम्लयोगे मधुरेण तुप्रास्तेषां यथेष्टं प्रवदन्ति पथ्यम् ॥
अम्लरस से उबकाये (उद्विग्न) हुए बहुत से मनुष्य-मधु-
रस के उपयोग से सुखी हो जाते हैं । इसी प्रकार मधुररस से
तृप्त मनुष्य अम्लरस के योग में दुःखी होते हैं, यही इनकी
इच्छानुसार पथ्य है ॥४१६॥
श्रीतोणतोयासवमद्युषफलाम्लधान्याम्लपथोरसानाम् ।
यस्यानुपानं तु हितं भवेद्यत्तस्मै प्रदेयं विह मात्रया तत् ॥
व्याधिं च कालं च विभाष्य धीरै—
द्वैत्याणि भोज्यानि च तानि तानि ।
सर्वानुपानेषु वरं वदन्ति
मेध्यं यदस्मभः शुचिभाजनस्थम् ॥४२१॥
अनुपान द्रव्य—
शीत जल, उष्ण जल, आसव (द्रव प्रधान) द्रव्य प्रधान-
मद्य, यूष, फलाम्ल, धान्याम्ल, (कांजी), पय (दूध), रस (मांस-
रस), जो अनुपान हितकारी हो, वही उस पुरुष को उचित
मात्रा में देना चाहिये । व्याधि (ब्रह्म-ज्वरादि), काल (आव-
स्थिक और आर्चव), इनको विशेष रूप से जानकर, द्रव्य
(तैलादि), भोज्य (रक्तशलि आदि), इन सब को तर्क द्वारा
जानकर अनुपान देना चाहिये ।
सब अनुपानों में श्रेष्ठ अनुपान—पवित्र पात्र में रक्खा,
१मेध्य (अन्तरिक्ष) का जल है ॥४२०,४२१॥
लोकस्य जन्मप्रभृति प्रशस्तं
तोयात्मकाः सर्वरसाश्च दृष्टाः ।
सङ्क्षेप एषोऽभिहितोऽनुपाने-
व्रतः परं विस्तरतोऽभिधास्ये ॥४२२॥
कारण—संसार के (मनुष्यों के) जन्मकाल से प्रारम्भ करके
यही जल उत्तम है, सब रस जलमय ही हैं । यह अनुपान संक्षेप
में कह दिया । इसके आगे विस्तार से कहेंगे ॥४२२॥
उष्णोदकानुपानं तु स्नेहानामथ शस्यते ।
स्यते भरुलातकस्नेहात् स्नेहात्तौवरकात्तथा ॥४२३॥
अनुपानं वदन्त्येके तैले यूषाम्लकाञ्चिकम् ।
श्रीतोदकं माश्रिकस्य पिष्टान्नस्य च सर्वशः ॥४२४॥
दधिपायसमद्यातिविषजुष्टे तथैव च ।
केचित् पिष्टमयस्याहुर्नुपानं सुखोदकम् ॥४२५॥
पयो मांसरसो वाऽपि शालिमुद्गादिभोजिनाम् ।
युद्धाध्वातपसंतापविषमद्यरुजासु च ॥४२६॥
माषादेरनुपानं तु धान्याम्लं दधिमस्तु वा ।
मद्यं मद्योचितानां तु सर्वमासेषु पूजितम् ॥४२७॥
१ मेध्य का अर्थ—कविराज हाराणचन्द्रजी ने पवित्र किया
है । इस दृष्टि से पवित्र जल-उत्तम पात्र में रखना श्रेष्ठ है ।
अमद्यपानामुदकं फलाम्लं वा प्रशस्यते ।
क्षीरं घर्माध्वभाष्यच्छीकलान्तानामस्तुतोपमम् ॥४२८॥
सुरा कृशानां स्थूलानामनुपानं मधुदकम् ।
निरामयानां चित्रं तु सुक्तमध्ये प्रकीर्तितम् ॥४२९॥
स्निग्धघोषणं मारुते पथ्यं कफे रूक्षोष्णमिष्यते ।
अनुपानं हितं चापि पित्तो मधुरजीतलम् ॥४३०॥
हितं शोणितपित्तिभ्यः क्षीरमिखुरसस्तथा ।
अर्कशैलुशिरीषाणामासवास्तु विषातिषु ॥४३१॥
मिलावे और तुवरक१ स्नेह को छोड़कर—शेष सब स्नेहों
के लिये, उष्णोदक (गरम पानी) का अनुपान प्रशस्त है । कुछ
आचार्यों का विचार है कि-उष्णकाल में तेल का अनुपान
यूष, शीतकाल में तेल का अनुपान कांजी है । माश्रिक (मधु)
और पिष्टान्न (तण्डुल पिष्ट) का अनुपान शीतल जल है । दधि,
पायस (खीर), मद्यात्ति (मद्य विदाह), विष जुष्ट (विष व्यामोह
में)—अनुपान शीतल जल है । पिष्टान्न का अनुपान कई
आचार्य ईषदुष्ण पानी मानते हैं । शालि (हेमन्त धान्य), मूळ
आदि खानेवालों के लिये, युद्ध, अन्ध (माग) आतप (धूर),
सन्ताप (मनः सन्ताप, बेचैनी), विष, मद्य को पीड़ा में—दूध या
मांसरस का अनुपान उचित है । माष (उद्वद) आदि का अनु-
पान—धान्याम्ल (कांजी), दधि, या मस्तु है । मद्य पीनेवालों
के लिये तथा सब मांसों में मद्य अनुपान है । जो मद्य नहीं
पीते, उनके लिये पानी और फलाम्लों का अनुपान उत्तम है ।
घर्म (गरमी), अन्ध (माग), माष्य (जोर से बोलना), स्त्री संभोग
से थके पुरुषों के लिये सुरा और स्थूल पुरुषों के लिये, दूध
अमृत के समान है । कृश पुरुषों के लिये सुरा और स्थूल
पुरुषों के लिये शहद का शर्बत अनुपान है । निरामय (स्वरथ)
पुरुषों के लिये चित्र (नाना प्रकार के अनुपान) भोजन के बीच-
बीच में देने चाहिये । वायु रोग में—स्निग्ध और उष्ण, कफ
में—रूक्ष एवं उष्ण, पित्त में-मधुर और शीतल अनुपान हित-
कारी है । रक्त पित्त रोगियों के लिये—दूध और गन्ने का रस
हितकारी है । विषात्ति (विष पीड़ा) में—आक, सेलु (लसड़ा)
और शिरीष इनका आसव उत्तम है ॥४२३-४३१॥
अतः परं तु वर्गोणामनुपानं प्रथक् प्रथक् ।
प्रवदयाम्यनुपूर्वणं सर्वेषामेव मे शृणु ॥४३२॥
इसके आगे प्रत्येक वर्ग का अनुपान प्रथक् प्रथक् रूप में
कहता हूँ । इसको मुखसे सुनो—
तत्र पूर्वशस्यजातानां बदराम्लं, वैदलानां धान्याम्लं,
जङ्गलाणां धन्वजानां च पिप्पल्यासवः, विकिराणां कोल-
बदरासवः, प्रतुदानां क्षीरवृक्षसवः, गुहाशयानां खर्जूर-
१ तुवरक का लक्षण—
“पत्रस्तु केशराकारः कलायसदृशः फलेः ।
वृक्षास्तुवरनामानः पश्चिमाण्वतीरजाः ॥”