सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 256

२०२

मुश्रुतसंहिता

[ अ० ४६ ]

स्फटिक आदि मणियां—भाँखों के लिये हितकारी, शीतल, लेखन, विषनुशाक, पवित्र, धारण करने योग्य, पाप्मा (पाप) अलक्ष्मी (दौर्भाग्य) और मल के नाशक हैं ॥३२६-३३०॥
धान्येषु मांसेषु फलेषु चैव शाकेषु चानुकृमिहाप्रमेयात् ।
आस्वादतो भूतगुणेश्च मत्वा तदादिशेद्द्रव्यमनल्पबुद्धिः॥
अनहगबुद्धि (अगाध बुद्धिशाली वैद्य)—इष शास्त्र में—अप्र-
मेयात् (अनन्त होने से), धान्य, मांस, फल एवं शाक (कन्द)
वगों में—न कहे हुए द्रव्यों को आस्वादतः (रस के आस्वाद से)
तथा भूतगुणों से (द्रव्यारधक भूत गुणों से, वीर्य-विपाक आदि
से) पद्भिचान के ॥३३१॥

षष्टिका यवगोधूमा लोहिता ये च शालयः ।

मुदाठकीमसुराश्च धान्येषु प्रवराः स्मृताः ॥३३२॥

कहे हुए द्रव्यों में श्रेष्ठ द्रव्यों का विचार—

धान्यों में श्रेष्ठ—षष्टिक, यव (जौ), गोधूम (गेहूँ), और
लाल शालि, मूळ, अरहर और मसूर श्रेष्ठ हैं ॥३३२॥

ठावतिस्तिरिसारङ्गकुरुक्षेत्रकपिखलाः ।

मयूरवसिकुर्माश्च श्रेष्ठा मांसगणेष्विव ॥३३३॥

मांसवर्ग में श्रेष्ठ—ठाव (बटेर), तित्तिरि, सारङ्ग, कुरुङ्ग,
ऐण, कपिखल, मोर, वर्मि, कुर्म (कछुवा) श्रेष्ठ हैं ॥३३३॥

दाडिमामलकं द्राक्षा खजूरं सपरूपकम् ।

राजादनं मातुलुङ्गं फलवर्गं प्रशस्यते ॥३३४॥

फलवर्ग में श्रेष्ठ—अनार, आँवला, द्राक्षा, खजूर, फालसा,
राजादन, बिजौरा श्रेष्ठ हैं ॥३३४॥

सतीनो वास्तुकश्चुचूचिच्छिर्मूलकपोतिकाः ।

मण्डूकपर्णीं जीवन्तीं शाकवर्गं प्रशस्यते ॥३३५॥

शाकवर्ग में श्रेष्ठ—सतीन (मटर), बथुवा, चुन्चू, चिछी,
मूलकपोतिका (वालमूली), मण्डूकपर्णी, जीवन्ती श्रेष्ठ हैं ॥३३५॥
गन्धं क्षीरं घृतं श्रेष्ठं सैन्धवं लवणेषु च ।

धात्रीदाडिममन्लेषु, पिप्पली नागरं कटौ ॥३३६॥

तिक्के पटोलवार्ताकं मधुरं घृतमुच्यते ।

क्षौद्रं, पूगफलं श्रेष्ठं कषायं सपरूपकम् ॥३३७॥

शर्करेश्वुविकारेषु, पाने मध्वासवौ तथा ।

दूध और घी में गाय का दूध घी उत्तम है, नमकों में
सैन्धव नमक, खटाई-अम्लस में अनार और आँवला, कटुरस
में पिप्पली और सोंठ, तिक्रस में पटोल और वैंगन, मधुरस
में घी और शहद, कषायरस में पूगफल (खुपारी) और फालसा,
गन्ने के विकारों में शर्करा, आसवों में (मर्चा में), मूढ़ीका और
द्राक्षसव श्रेष्ठ हैं ॥३३७॥

परिसंवत्सरं धान्यं मांसं वयसि मध्यमे ॥३३८॥

अपर्युषितमन्नं तु संस्कृतं मात्रया शुभम् ।

फलं पर्यागतं, शाकमशुष्कं तरुणं नवम् ॥३३९॥

एक साल पुराने धान्य, मध्यम आयुवाले पशु का मांस,
जिस पर रात नहीं बीती ऐसा एवं संस्कृती (मली प्रकार पका),
मात्रा में (उचित अभिनबलानुसार) एवं शुभ (पवित्र), अन्न
पर्यागत (पका पुष्ट) फल तथा अशुष्क (हरा), तरुण (मध्यम-
वय) एवं नव (नया) शाक उत्तम हैं ॥३३८, ३३९॥

अथ कृतान्नवर्गः ।

अतः परं प्रबद्धाभि कृतान्नगुणविस्तरम् ।

लाजमण्डो विशुद्धातां पथ्यः पाचनदीपनः ॥३४०॥

वातानुलोमतो हृद्यः पिप्पलीनागरायुतः ।

इसके आगे "कृतान्न" वर्ग के गुणों को कहते हैं —

लाजमण्ड विशुद्ध (वमन-विरेचन द्वारा शुद्ध हुए) रोगियों
के लिये हितकारी है, पाचन एवं अभिनदीपक है । पिप्पली एवं
सोंठ से युक्त लाजमण्ड वायु का अनुलोमक एवं हृदय के
लिये प्रिय है१ ।

वि- मन्तव्य—किया-बनाया-पकाया हुआ अन्न-भोजन-
'कृतान्न' कहलाता है । लाजमण्ड-भुने चावलों का मण्ड मण्ड
पिच्छ । पेया—चावलों या जौ, गेहूँ का बनाया वह खाद्य जो
पीने योग्य हो जैसे साबुदाना या बारली, इनमें चावल आदि
घुले रहते हैं । बिलेयी—जो खाद्य पेया से कुछ गाढा हो, कड़-
छुली में लिपता-सटता है, जैसे-फिरनी खिचड़ी आदि । यवगु
बिलेयी से भी गाढा खाद्य जैसे—दलिया आदि । ओदन-भात
पकाए गये चावल आदि धान्य । ओदन के दो प्रकार—१-
अप्रस्तुत-जिसका मन्द पृथक् नहीं किया है—इसे "पिच्छमार
भात" कहते हैं । २—प्रस्तुत भात जिसका मण्ड पृथक् कर
दिया गया—जुआ दिया गया है । विधि भेद से ओठन के
दो प्रकार—भूतन्दुल-जो चावलों को थोड़ा भूनकर भात
बनाया जाता है । अमृधतन्दुल-जो चावलों को बिना भूने
बनाया जाता है । यह सब शालि एवं षष्टिक धान्यों के खाद्य
हैं जो प्रायः रोगियों के लिये उपयोगी हैं । इनके भात एवं
रोटियां आदि स्वस्थों के लिये बनते हैं । क्षीरोपसाधित दूध से
पकाए चावल आदि जैसे खीर आदि । सूप—दालों-द्विदलों के
खाद्य जो तरल रहते हैं वे सूप यूप तथा नूस कहे जाते हैं ।
यह पतली दाल है । परन्तु मूली आदि के पके रसों को भी
'यूप' कहते हैं । कृशरा—शालि अथवा षष्टिक धान्य तथा
द्विदल के योग से बना खाद्य-खिचड़ी आदि । शाक-पत्र पुष्प
फल आदि वे पदार्थ जिनके शाक बनाए जाते हैं । स्विब-
उबाला हुआ निष्पीडित-जिसका रस निचोड़ दिया गया है ।
स्नेह संस्कृत स्नेहघृत तैल आदि में छोँका हुआ ॥३४०॥

१ सोंठ और पिप्पली का योग—षडंग परिभाषा के अनुसार
होना चाहिये । यथा—

‘यदस्मृ श्रुतशीतासु षडंगादि प्रयुज्यते ।

कषमात्रं ततो द्रव्यं साधयेत्प्रास्थिकेऽन्मसि ॥’