सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 226

१७८

मुत्तुसंहिता

[ अ० ४५ ]

यो यो मत्स्यगिडकाखण्डअर्कराणां स्वको गुणः ।
तेन तेनव निर्दण्यस्नेषां विस्त्रावणो गुणः ॥१६४॥
मत्स्यगिडका, खण्ड और शर्करा के जो जो अपने गुण हैं,
वे ही गुण इनके विस्तृत (स्वित) रस (शर्बतों) में समझने
चाहिये ।

वि० मन्तव्य—मत्स्यगिडका आदि को चुखा कर, उसमें से
चोटा या सीरा निकाल कर खण्ड को स्वच्छ किया जाता है,
जितना ही चोटा निकलता जाता है उतना ही स्वच्छता आती
है । शर्करा को जमाकर मिश्री बनाई जाती है, फूलमिश्री
सर्बथा स्वच्छ होती है । यह बिल्लौर के समान स्वच्छ, श्वेत
एवं चमकीली होती है । चोटा का नाम “विस्त्रावण” है ।
मिशरी बनाने के लिये चुआते समय शर्करा से जो चोटा निक-
लता है अधिक स्वच्छ होता है । राव को खाँची में डाल दिया
जाता है, ऊपर सेवार बिछा दी जाती है, कुछ दिनों पश्चात्
उसका सीरा (चोटा) खाँची के निचले छिद्र से बहने लगता है
और कण खाँची में रह जाते हैं ॥१६४॥

सारस्थिता सुविमला निःक्षारा च यथा यथा ।
तथा गुणवती सर्वा विज्ञेया शर्करा बुधैः ॥१६५॥

जैसे जैसे शर्करा मल के निकल जाने से सारमात्र बची
हो, इसलिये अत्यन्त स्वच्छ एवं क्षार से रहित हो, वह वैसे वैसे
ही गुणवाली समझनी चाहिये ॥१६५॥

मधुअर्करा पुनश्छवतीसागहरी रूक्षा छेदनी प्रसादनी
कषायमधुरा मधुरविपाका च ॥१६६॥

कालान्तर में, शुष्क होने से मधु में शर्करा बैठ जाती है,
यही मधुशर्करा—वमन, अतिसार रोगनाशक, रूक्ष, छेदक
(कफ आदि को), प्रसादनी (त्वचा-रक्त आदि को स्वच्छ
करनेवाली), कषाय-मधुर और मधुर विपाकवाली है ।

वि० मन्तव्य—मधुशर्करा—जैसे राव में खण्ड बैठती है
वैसे किसी-किसी मधु में भी खण्ड बैठ जाती है—खण्ड के से
कण बन जाते हैं और चोटा के समान मधु का तरल भाग
ऊपर आ जाता है । बोलत या भाण्ड में मधु रख देने पर—
चार छः मास में खण्ड के कण बैठ जाते हैं । मधु का तरल
भाग पृथक् करने पर “मधुशर्करा” मधु की खण्ड रह जाती है ॥

यवासअर्करा मधुरकषाया तित्तानुरसा श्लेष्महरी
सरा चेति ॥१६७॥

यवास शर्करा (यवास के कषाय को घन करके उत्पन्न की
गई शर्करा)—मधुर-कषायरस, तित्त—अनुरस कफनाशक
और विरेचक होता है ।

वि० मन्तव्य—यवास शर्करा—माना या मना नाम से
मिलती है । यह राजयोग्य विरेचन है, इसे १-२ तोला लेकर
गुलाब जल में घोलकर पीने से विरेचन होता है, यूनानी का

“तुरज्वीन” भी यही है, जवासा के पौद पर मधुर कण बैठ
जाते हैं उनका संग्रह कर लिया जाता है ॥१६७॥

यावत्यः अर्कराः प्रोक्ताः सर्वा दाहप्रणागनाः ।

रक्तपित्तप्रशमनाशकदिमूर्च्छातृषापहाः ॥१६८॥

जितनी भी शर्करायें हैं, वे सब दाह (जलन) को नष्ट
करती हैं । रक्तपित्तनाशक, छुँदि मूर्च्छा तृषा को नष्ट करती है ।

वि० मन्तव्य—ताड़, पुनक्का आदि जितने मधुर द्रव्य हैं
उनके रसों को इक्षुस के समान पकाकर-सुखाकर, इक्षुशर्करा
के समान शर्करायें बना ली जाती हैं । मधुरसार ही गुड़ तथा
गुड़ का सार शर्करा है ॥१६८॥

रूक्षं मधुकुपुषोत्थं फाणितं वातपित्तकृतं ।

कफद्वनं मधुरं पाके कषायं वस्तिदूषणम् ॥१६९॥

इतीक्ष्णवर्गः ।

महुवे के फूलों से बनाई राव रूक्ष, वातपित्तकारक, कफ-
नाशक, मधुर, विपाक में कषायरस और वस्ति को दूषित
करती है ॥१६९॥ इति इक्षुवर्गः ।

अथ मधुवर्गः ।

सर्वं पित्तकरं मद्यमरूळं रोचनदीपनम् ।

भेदंनं कफवातद्वनं हृद्यं वस्तिविशोधनम् ॥१७०॥

पाके लघु विदाह्युष्णं तोक्षणमिन्द्रियबोधनम् ।

विकासि स्मृद्विषमूर्त्रं श्रृणु तस्य विशेषणम् ॥१७१॥

इसके आगे मधुवर्ग कहते हैं—

मद्य के सामान्यगुण—सब मद्य पित्तकारक, अम्लरस,
अग्निदीपक, रोचक, भेदक (कफ), कफवातनाशक, हृदय के
लिये प्रिय, वस्तिशोधक (मूर्त्रल) हैं । पचने में लघु विदाही,
उष्णवीर्य, तीक्ष्ण, इन्द्रियबोधन (इन्द्रियों में पटुता होशियारी
उत्पन्न करता है), मल-मूत्र का प्रवर्तक है । विशेष लक्षणों को
आगे कहते हैं । ये गुण—पैष्टिक, मार्दीक और गौड तीन
प्रकार के मद्य के हैं ॥१७०, १७१॥

मार्दीकमविदाहित्वान्मधुरान्वयतस्तथा ।

रक्तपित्तोऽपि सततं बुधैर्न प्रतिपिष्यते ॥१७२॥

मधुरं तद्वि रूक्षं च कषायानुरसं लघु ।

लघुपाकिं सरं शोषविषमज्वरनाशनम् ॥१७३॥

मार्दीक (मूदीका से बने) मद्य के गुण—अविदाहि होने से
एवं मधुर द्रव्य (द्राक्षा) से उत्पन्न होने के कारण रक्तपित्त रोग
में भी निरन्तर उपयोग कर सकते हैं१ । यह मार्दीक मद्य
मधुररस, रूक्ष, कषाय-अनुरस, लघु, विपाक में लघु सर
(विरेचक), शोष-विषमज्वरनाशक है ॥१७२, १७३॥

१ रक्तपित्त चिकित्सा में—

‘द्राक्षाश्रुतं नागरकैः श्रुतं वा ।

श्रुतं पयो वायुश्च पर्णिनीभिः ।’ चरक ।