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सर्वकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ४५ ]

सूत्रस्थानम्

१७१

मृगव्यालविदग्धप्रभृतिषु च परिपेकाभ्यङ्गावगाहादिषु तिल-
तैलं प्रशस्यते ॥११२॥
इसके आगे तैल कहते हैं—

तैल आग्नेय गुण, उष्ण, तीक्ष्ण, मधुररस, मधुरविपाक, बृहण (शरीर को बढ़ानेवाला), ग्रीणन, व्यवायी, सूक्ष्म, विशद, गुरु, सर, विकारि, (सन्धि बन्धों को खोलनेवाला), वृष्य (शुक्ल), त्वकप्रसादन (अभ्यंग और भोजन में त्वचा का प्रसादन करनेवाला), शोधन, मेधावर्धक, मार्दव (कोमलता), मांसस्थिरता-वर्ण-बलकारक, आँखों के लिये हितकारी, मूत्र को रोकनेवाला, लेखन, तित्कषाय अनुरस पाचक, वायु, कफ का नाशक, क्रमिनाशक, खाने पर पित्तजनक ( थोड़ा पित्त प्रकोपक); योनिशूल, शिरःशूल, कर्णशूल का शामक, और गर्भाशय का शोधक है । लिङ्ग (दो भागों में विभक्त), भिन्न (विदारित), विद्ध (सूई आदि से विंशा), उल्लिङ्ग (चूर्णित), न्युत (स्थान से गिरा), मथित (विलोडित), क्षत ( क्षत घाव आदि ), पिचित (चपटा हुआ), भग्न (टूटा), स्फुटित (फूटा), क्षारदग्ध, अग्निदग्ध, विशिळ्ड ( सन्धिबन्ध से अलग हुआ ), दारित ( बहुत स्थानों से फटा), अभिहृत (चोट लगने पर), दुर्भग्न (चूर्णित, अवपातित, बुरी तरह से टूटा), मृग (शेर आदि), व्याल (सर्प आदि) के काटने पर परिपेक, अभ्यंग, अवगाहन आदि कार्यों में तिलतैल उत्तम है ॥११२॥

तद्वस्तितु च पानेषु नस्ये कर्णाक्षिपूरणे ।

अन्नपानविधौ चापि प्रयोज्यं वातशान्तये ॥११३॥

तिल का तेल—बस्ति कार्य में, पान में, नस्य, कान या आँख में डालने के लिये, खानपान को संस्कृत (पकाने) करने में, वायु को शान्त करने के लिये तिलतैल बरतना चाहिये ॥

एरण्डतैलं मधुरमुष्णं तीक्ष्णं दीपनं कटु कषायानुरसं सूक्ष्मस्रोतोविशोधनं त्वच्छ्यं वृष्यं मधुरविपाकं वयःस्थापनं योनिशुक्रविशोधनमारोग्यमेधाकान्तिस्मृतिबलकरं वातकफहरमधोभागदोषहरं च ॥११४॥

एरण्ड का तैल—मधुर उष्णवीर्य, तीक्ष्ण, अग्निदीपक, कटु-कषाय अनुरस, सूक्ष्म ( सूक्ष्म स्रोतों में घुसनेवाला ), स्रोतों का शोधक, त्वचा के लिये हितकारी, वृष्य (शुक्रवर्धक), विपाक में मधुर, वयःस्थापक, योनि ( गर्भाशय ) एवं शुक्र का शोधक, आरोग्य, मेधा, कान्ति (प्रभा), स्मृति एवं बल कारक, वात-कफनाशक और अधोभाग ( विरेचन ) द्वारा दोष का हरण करनेवाला है ॥११४॥

१—प्रभा-आग्नेय गुणयुक्त परन्तु उष्ण नहीं, क्षार उष्ण है, परन्तु सोम्य है, मछलियाँ उष्ण हैं, परन्तु आग्नेय गुण नहीं हैं । तिल आग्नेय और उष्ण दोनों हैं ।

निम्ब्यातसीक्षुसुभ्रमूलकजीमूतकवृक्षद कृतवेधनाकं-
म्पिल्लकहस्तिकर्णपृथ्वीकापीलुकरङ्खेकुदोशिमुसर्पपसुवर्च-
लाविद्धङ्ग्योतिष्मतीफलतैलानि तीक्ष्णानि लघुन्युष्णवीर्या-
णि कटुनि कटुविपाकानि सराण्यनिलकफकुमिष्ठप्रमेह-
शिरोरोगापहराणि चेति ॥११५॥

निम्ब (नीम), अतसी (अलसी), कुसुम्भ, मूलक (मूली), जीमूतक (देवदाली), वृक्षक (कुटज), कृतवेधन (तुरई), अर्क (आक), कपिल्ल (कमिला), हस्तिकर्ण (लाठ एरण्ड), पृथ्वीका (काला जीरा), पीलु, करञ्ज (करंजुवा), इंगुदी, शिमु (सहजन), सर्पप (सरसों), सुवर्चला ( सूर्यावर्च ), विद्धङ्ग (वायविद्धङ्ग) व्योतिष्मती (मालकगनी), इनके फलों के तेल, तीक्ष्ण, लघु, उष्णवीर्य, कटुरस, कटु विपाक, सर ( विरेचक ) हैं, वायु, कफ, क्रमि, कुष्ठ, प्रमेह और शिरोरोग को नष्ट करनेवाले हैं ॥११५॥

वातद्वन्द्वं मधुरं तेषु क्षोभं तैलं वलावहम् ।

कटुपाकमचक्षुष्यं स्निग्धोष्णं गुरु पित्तलम् ॥११६॥

अलसी (क्षुमा) का तेल—वायुनाशक, कटुविपाक, आँखों के लिये अहितकारी, स्निग्ध, उष्ण, गुरु और पित्तकारक है ॥
क्रमिद्वन्द्वं सार्पपं तैलं कण्डुकुष्टापहं लघु ।

कफमेदोनिळहरं लेखनं कटुदीपनम् ॥११७॥

सरसों का तेल—क्रमिनाशक, कण्डू, कुष्ठ को नाश करने-वाला, लघु, कफ, मेद, वायु नाशक, लेखन ( स्थूलता को कम करनेवाला) कटु विपाक और अग्निदीपक है ॥११७॥

क्रमिद्वन्द्वमिङ्गुदीतैलमोषत्तिकं तथा लघु ।

कुष्टामयक्रुमिहरं दृष्टिशुक्लबलापहम् ॥११८॥

इङ्गुदी का तेल—क्रमिनाशक, थोड़ा तित्तरस लघु, है ।
कुष्ठरोग, क्रुमिरोग का नाशक, दृष्टि, शुक्ल, बलको कम करता है ॥
विपाके कटुकं तैलं कौसुम्भं सर्वदोषकृतम् ।

रक्तपित्तकरं तीक्ष्णमचक्षुष्यं विदाहि च ॥११९॥

कुसुम्भ का तैल, विपाक में कटु, तीनों दोषों को कुपित करता है, रक्तपित्त—कारक, तीक्ष्ण आँखों के लिये अहितकर और विदाहि है ॥११९॥

किराततित्त्कातिमुक्तविभीतकनालिकेरकोलाक्षोड-
जीवनन्तीप्रियालकबुंदारसूर्यवल्लीत्रपुसर्वाहककार्कशुष्मा -
ण्डप्रभृतानां तैलानि मधुराणि मधुरविपाकानि वातपित्त-
प्रशमनानि शीतवीर्याण्यभिष्यन्दीनि सूक्ष्मज्रायनिसा-
द्वनानि चेति ॥१२०॥

किराततित्त्का ( चिरायता ), अतिमुक्त ( माधवी लता का फल), विभीतक (बहेड़ा), नालिकेर (नारियल), कोल (बैर) अक्षोड (अखरोट), जीवनन्ती (स्वर्ण जीवनन्ती फल), प्रियाल, कबुंदार (कचनार), सूर्यवल्ली (अर्कपुष्पी), त्रपुस (ककड़ी), एर्वाहक (खीरा), कार्का (वाडव-छोटा खीरा) कूष्माण्ड (पेठा)