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सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 187

अ० ३८ ]

सूत्रस्थानम्

१३६

लिये हितकारी, छवि, कण्ठ, विष को नाश करता है ॥ ३३, ३४ ॥
काकोलीक्षीरकाकोलीजीवकर्षकमृदुगपर्णमाषपर्णी-
मेदासहमेदाच्छित्तरूहाकर्कटशृङ्गीतुगाक्षीरोपद्मकप्रपौण्ड-
रीकधिष्टुष्टुदीकाजीवन्त्यो मधुकं चेति ॥ ३५ ॥

काकोल्यादिर्यं पित्तशोणितानिलनाशनः ।

जीवनो बृंहणो वृष्यः स्तन्यश्छेदमकरस्तथा ॥ ३६ ॥

काकोल्यादिग-काकोली, क्षीरकाकोली, जीवक, ऋषभक,
मुदुगपर्णी, माषपर्णी, मेदा, महामेदा, छिन्नरूहा ( गिलोय ),
कर्कटशृङ्गी ( काकड़ाशृङ्गी ), तुगाक्षीरी ( बंशलोचन ), पद्मक
( पद्माल ), प्रपौण्डरीक, ( श्वेतकमल ), ऋद्धि, वृद्धि, मृदुका
( द्राक्षा ), जीवन्ती ( स्वर्णजीवन्ती ) और मधुक ( मुलहठी ),
यह काकोल्यादिगण पित्त रक्त-वायु का नाशक है । जीवन,
बृंहण, वृष्य है, दूध एवं कफ का वर्धक है ॥ ३५, ३६ ॥

ऊपकसंन्धवशिलाजतुकासीसद्वयहिङ्कुतुथकं चेति ३७

ऊपकादिः कफं हन्ति गणो मेदोविशेषणः ।

अश्मरीशर्करामूत्रकृच्छ्रगुल्मप्रणाशनः ॥ ३८ ॥

ऊपक ( क्षारमृत्तिका ), सैन्धव—सैन्धानमक, शिलाजतु
( शिलाजीत ), कासीसद्वय ( हरा एवं पीला कासीस ), हींग,
तुथक ( नीला थोथा )—यह ऊपकादिगण कफ, मेद का
नाशक है, अश्मरी, शर्करा, मूत्रकृच्छ्र, शूल एवं गुल्म का
नाशक है ॥ ३७, ३८ ॥

सारिबामधुकचन्दनकुचन्दनपद्मककाश्मरीफलमधूक-
पुष्पाण्युगीरं चेति ॥ ३९ ॥

सारिवादिः पिपासाद्यो रक्तपित्तहरो गणः ।

पित्तज्वरप्रशमनो विशेषाद्वाहनाशनः ॥ ४० ॥

सारिवा ( अनन्तमूल ), मधुक ( मुलहठी ), चन्दन
( श्वेत ), कुचन्दन ( लालचन्दन ), पद्मक ( पद्माल ),
काश्मरी फल ( गम्भारी फल ), मधुकपुष्प ( महुवे के फूल ),
और उशीर—यह सारिवादिगण पिपासा तथा रक्तपित्त कफ-
नाशक है । पित्त ज्वर को शान्त करता है, खासकर दाह को
नष्ट करता है ॥ ३९, ४० ॥

अञ्जनरसाञ्जननागपुष्पप्रियकुन्तीलोत्पलनलदनलिनके-
शराणि मधुकं चेति ॥ ४१ ॥

अञ्जनादगणो ह्यपि रक्तपित्तनिवर्हणः ।

विषोपगमनो दाहं तिहन्त्याभ्यन्तर भृगम् ॥ ४२ ॥

अञ्जन ( छोताञ्जन ), रसांजन ( रसौत ) नागपुष्प
( नागकेशर ), प्रियगु ( फूलप्रियगु ) नीलोत्पल ( नीलाकमल ),
नलद ( उशीर ), नलिनकेशर ( पद्मकेशर ) और मुलहठी—
यह अञ्जनादिगण रक्त-पित्त का नाशक, एवं खासकर शरीर के
अन्दर के दाह को नष्ट करता है ॥ ४१, ४२ ॥

पलूषकद्राक्षाकटफलदण्डिमराजादनकतकफलशाकफ-
लानि त्रिफला चेति ॥ ४३ ॥

पलूषकादिरित्येष गणोऽनिलविनाशनः ।

मूत्रदोषहरो हृद्यः पिपासाद्यो रुचिप्रदः ॥ ४४ ॥

पलूषक ( फालसा ), द्राक्षा ( मुनक्का ), कटफल ( काय-
फल ), दण्डिम ( अनार ), राजादन ( पियालफल ), कतक-
फल ( निर्मली ), शाकफल ( शगुन का फल ) और त्रिफला
( हरड, बहेडा, आँवला ) । यह पलूषकादिगण वायु का नाशक,
मूत्र दोष को मिटानेवाला, हृदय के लिये प्रिय पिपासानाशक
है एवं रुचि उत्पन्न करता है ॥ ४३, ४४ ॥

प्रियङ्गुसमझाधातकीपुत्रागनागपुष्पचन्दनकुचन्दन -
मोचरसरसाञ्जनकुम्भीकस्रोतोञ्जनपद्मकेशरयोजनवल्लयो
दीर्घमूला चेति ॥ ४५ ॥

अम्बछाधातकीकुसुमसमंगकटवंगमधुकबिल्वपैशिका-
सावररोधपलाशनन्दीवृक्षाः पद्मकेशराणि चेति ॥ ४६ ॥

गणो प्रियग्वम्बछादी पक्वातीसारनाशनी ।

सन्धाननीयो द्वितौ पित्तं व्रणानां चापि रोपणौ ॥ ४७ ॥

प्रियगु, समझा ( मजीठा ), धातकी ( धाय ), पुत्राग
( तुङ्ग ), नागपुष्प ( नागकेशर ), चन्दन ( श्वेत ), कुचन्दन
( लालचन्दन ), मोचरस ( सिम्बल का गोंद ), रसाञ्जन
( रसौत ), कुम्भीक ( जलपर्णी-पाना ), स्रोतोञ्जन, पद्मकेशर,
योजनवल्लौ ( मजीठ-वराहकान्ता ), दीर्घमूला ( डुरालभा या
शालपर्णी ) ।

अम्बछा ( पाठा ), धातकीकुसुम ( धाय के फूल ), समंगा
( वराहकान्ता ), कटवङ्ग ( श्यानाक ), मधुक ( मुलहठी );
बिल्वपैशिका ( बाल बिल्वगिरी ), सावर-रोध ( पठानीलाच ),
पलाश ( ढाक ), नन्दीवृक्ष ( काश्मरी गम्भारी ), पद्मकेशर
( नागकेशर )—ये दोनों प्रियग्वदि एवं अम्बछादिगण पक्क-
अतिसार का नाश करनेवाले हैं । दोनों गण दूध अस्थियां को
जोड़नेवाले, पित्त में हितकारी और वणों का सराहण करने-
वाले हैं ॥ ४५-४७ ॥

न्यम्रोधोदुम्बरश्वत्थलक्ष्ममधुककपीतनककुभास्रको -
शास्रचोरकपत्रजम्बूद्वयप्रियालमधुकरोहणीवञ्जुकदम्ब -
बदरीतिन्दुकोसल्लकारोधसावरराधमझातकपलाशा नन्दी
वृक्षश्चेति ॥ ४८ ॥

न्यम्रोधादिगणो व्रणयः संप्राही भग्नसाधकः ।

रक्तपित्तहरो दाहमेदोद्यो योनिदोषहृतु ॥ ४९ ॥

न्यम्रोध ( बड़ ), उदुम्बर ( गूलर ), अश्वत्थ ( पोपल ),
लक्ष्म ( पिलखन ), मधुक ( महुवा ), कपीतन ( आमातक ),
ककुभ ( अर्जुन ), आम्र ( आम ), कोशाम्र ( काष् आम ),
चोरकपत्र ( चोर वृक्ष के पत्ते ), जम्बूद्वय ( जामुन और जिमाया ),
प्रियाल, मधुक ( मुलहठी ), रोहिणी ( कटुराहिणी ), वञ्जुक
( वेतस ), कदम्ब, बदरा ( बेर ), तिन्दुका, सल्लकी, राध, साव-
ररोध, मझातक ( मिलावा ), पलाश ( ढाक ), और नन्दीवृक्ष
( पार्श्वपीपल )—यह न्यम्रोधादिगण वण के लिये हितकारी,
संप्राही, भग्न को मिटानेवाला, रक्तपित्तनाशक, दाह-मेद को
तथा योनिरोगों को दूर करता है ॥ ४८, ४९ ॥