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सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 176

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‘मुश्रुतसंहिता’

[ अ० ३५ ]

तत्र सोपद्रवमन्योन्याविरोधेनोपक्रमेत, बलवन्तमुपद्रव वा; प्राक्केवलं यथास्वं प्रतिकुर्वीत; अन्यलक्षणं त्वादिन्याधी प्रयतेत ॥ १८ ॥

व्याधिसमुद्देशीय अध्याय में रोगों के विषय में प्रथम कह चुके हैं कि सब रोग तीन प्रकार के हैं, यथा-साध्य, याप्य और प्रत्याख्येय (असाध्य), इन तीनों की फिर तीन प्रकार से परीक्षा करनी चाहिये। क्या यह रोग उपसर्ग-(उपद्रव) जन्म है, अथवा प्राक्केवल है, या अन्य लक्षण (किसी भावि रोगों का लक्षण रूप है) इनमें औपसर्गिक रोग-पूर्व उत्पन्न रोग के साथ में पीछे से दूसरा रोग उत्पन्न होकर प्रथमरोग के साथ मिल जाता है। उस दूसरे रोग को ‘औपसर्गिक रोग’ या उपद्रव कहते हैं। और जो रोग पूर्व ही उत्पन्न हो जाता है, एवं पूर्वरूप (भावि रोग के लक्षणों से) रहित तथा उपद्रवों से रहित होता है, उसे ‘प्राक्केवल’ व्याधि कहते हैं। और जो लक्षण भावि में उत्पन्न होनेवाले रोग के लक्षणों को वतलाता है, उनको ‘पूर्वरूप’ कहते हैं, (ज्वर आदि रोग अपने पूर्वरूप लक्षणों से युक्त होते हैं)।

इनमें उपद्रवों से युक्त मूलव्याधि को दोनों के विरोधी चिकित्सा द्वारा शान्त करना चाहिये। अथवा-बलवान् उपद्रव की प्रथम चिकित्सा करनी चाहिए। प्राक्केवल रोग की आत्मीय चिकित्सा करनी चाहिए। पूर्वरूप व्याधि में, प्रथम से ही (ज्वर के पूर्वरूप स्पष्ट होने पर घृत का पान), पूर्वरूप अवस्था में ही चिकित्सा करनी चाहिये।

वि० मन्तव्य—प्राक्केवल व्याधि को ‘मुख्यव्याधि’ प्रधान व्याधि, अनुवन्ध्य कहते हैं। यह रोग वह अवस्था है जब पूर्वरूप नामक लक्षण समाप्त हो जाते हैं और कोई उपद्रव नामक लक्षण उत्पन्न नहीं हुए होते हैं, केवल मुख्य रोग ही विद्यमान होता है। इसे स्वतन्त्र व्याधि, मूलव्याधि तथा लघु व्याधि भी कहते हैं। पूर्वरूप-मुख्य व्याधि के पूर्व उत्पन्न होते हैं, उनमें से कुछ व्याधि के व्यक्त हो जानेपर शान्त हो जाते हैं और कुछ रह जाते हैं अथवा तीव्र हो जाते हैं और उपद्रव मुख्य व्याधि की विद्यमानता में अथवा उसके शान्त हो जाने पर उत्पन्न हो जाते हैं ॥ १८ ॥

भवति चात्र—

नास्ति रोगो विना दोषैर्यस्मात्तस्माद्विचक्षणः।

अनुक्तमपि दोषाणां लिङ्गैर्याधिसुपाचरेत् ॥ १९ ॥

कहा भी है—

चूंकि दोषों के बिना (वातादि के बिना) कोई रोग उत्पन्न नहीं होता, इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि न कहे हुए रोग की भी दोषों के लक्षणों से चिकित्सा करे।

वि० मन्तव्य—यदि रोग का शास्त्रानुसार नामकरण न कर

सको तो केवल दोषों के लक्षणों के अनुसार चिकित्सा करते रहो। क्योंकि-चरक के शब्दों में-विकारनामाऽकुशलो न जिह्वीयात् कदाचन। नहि सर्वविकाराणां नामतोऽस्ति श्रुवा स्थितिः ॥ च० सू० अ० १८ श्लो० ५१। वही बात आदि दोष-कारण भेद से तथा स्थानविशेष में जाने से भिन्न २ रोगों को उत्पन्न करते हैं, अतः रोग के कारण एवं स्थान आदि का विचार करके उचित चिकित्सा करे ॥ १९ ॥

प्रागभिहिता श्रुतवः ॥ २० ॥

ऋतु-परीक्षा प्रथम कह चुके हैं ॥ २० ॥

शीते शीतप्रतीकारमुष्णे चोष्णनिवारणम्।

कृत्वा कुर्यात् क्रियां प्राप्तां क्रियाकालं न हापयेत् ॥ २१ ॥

शीत ऋतु में—शीत के विपरीत उष्णवस्था को उत्पन्न करके, उष्णकाल में—उष्णवस्था के विपरीत शीतवस्था उत्पन्न करके (एवं वृष्टिकाल में वृष्टि के विपरीत अवस्था उत्पन्न करके) अग्निकर्म आदि क्रियायें करनी चाहिये। क्रियाकाल का उल्लंघन कभी भी नहीं करना चाहिए ॥ २१ ॥ अप्राप्ते वा क्रियाकाले प्राप्ते वा न कृता क्रिया।

क्रिया हीनाऽतिरिक्ता वा साध्येष्वपि न सिध्यति २२ क्रियाकाल के उपस्थित न होने पर (आमज्वर में औषध देना) क्रिया करने से, या क्रियाकाल के उपस्थित होने पर क्रिया न करने से साध्य रोग भी नष्ट नहीं होता। बहुदोष में हीन क्रिया व्यर्थ होती है, अल्पदोष में—अतिरिक्तक्रिया (तीव्र क्रिया) रोगी का नाश करती है, इसी प्रकार से मिथ्या क्रिया व्यर्थ है ॥ २२ ॥

या ह्युदोर्णं शमयति नान्यं व्याधिं करोति च।

सा क्रिया, न तु या व्याधिं हरत्यन्यमुदीरयेत् ॥ २३ ॥

जो क्रिया उत्कट रोग का शमन करती है, परन्तु अन्यरोग को उत्पन्न नहीं करती, उसका नाम क्रिया है। जो रोग का नाश करे, परन्तु दूसरे रोग को उत्पन्न कर देती है—(स्थौल्यापकर्षण में अपतर्पण से यक्ष्म—वातादि रोग) उसका नाम क्रिया नहीं है ॥ २३ ॥

प्रागभिहितोऽग्निरन्नस्य पाचकः। स चतुर्विधो भवति दोषानभिपन्नएकः, विक्रियामापन्नस्त्रि विधो भवति-विषमो वातेन, तीक्ष्णः पित्तेन, मन्दः श्लेष्मणा, चतुर्थः समः सर्वसाम्यादिति। तत्र, यो यथाकालमुपयुक्तमन्नं सम्यक् पचति स समः, समैदोषैः यः कदाचित् सम्यक् पचति, कदाचिदधमानशुलोदावर्तात्सिारजठरगौरवान्नक्रूजजनम् बाहणानि कृत्वा विषमः, यः प्रभूतमप्युपयुक्तमन्नमाशु पचति स तादृशः, स एवाभिर्वर्धमानोऽत्यनिरित्याभाष्यते; स सुदुर्मुह्यः प्रभूतमप्युपयुक्तमन्नमाशुतर पचति; पाकान्ते च गलतास्त्वोष्णोषाद्वाहसंतापाञ्जनयति, यस्तवल्पमप्यु-