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सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३५ ]

वैद्यो व्याध्युपसृष्टश्च भेषजं परिचारकः ।
एते पादाश्चिकित्सायाः कर्मसाधनहेतवः ॥ १५ ॥
गुणवद्भिः पादैश्चतुर्थो गुणवान् भिषक् ।
व्याधिसत्त्वेन कालेन महान्तमपि साधयेत् ॥ १६ ॥
चिकित्सा के चार पाद हैं—१—वैद्य, २—रोगी, ३—
औषध ( एवं उपकरण ) तथा ४—परिचारक । यह चारों
चिकित्सा की सफलता के हेतु ( कारण ) हैं ।

निम्नलिखित गुणों से युक्त रोगी, औषध तथा परिचारक
के साथ साथ निम्नलिखित गुणों से युक्त चौथा पाद अर्थात्
वैद्य बड़े से बड़े रोग को भी थोड़े समय में सिद्ध कर लेता है—
नष्ट कर देता है ॥ १५, १६ ॥

वैद्यहीनाश्चयः पादा गुणवन्तोऽप्यप्यर्थकाः ।

उद्गातृहोतृब्रह्मणो यथाऽध्वर्युं विनाऽध्वरे ॥ १७ ॥

वैद्य के बिना तीनों पाद गुणवान् होने पर भी निरर्थक
होते हैं, जिस प्रकार यज्ञ में यजुर्वेद-अध्यायी, अध्वर्यु उपाध्याय
के बिना-उद्गाता, ब्रह्मा और होता तीनों व्यर्थ होते हैं ॥ १७ ॥

वैद्यस्तु गुणवानेकस्तरायेदातुरं सदा ।

एवंप्रतिरैर्होति कर्णधार इवाम्भसि ॥ १८ ॥

एक गुणवान् वैद्य सदा रोगियों को रोगरूपी समुद्र के पार
पहुँचा देता है । जिस प्रकार नौका का नेता चप्टु चलानेवाले
पुरुषों के बिना भी नाव को समुद्र के किनारे ले जाता है ॥ १८ ॥

तत्त्वाधिगतआस्त्रार्थो दृष्टकर्मा स्वयंकृती ।

लघुहस्तः शुचिः शूरः सज्जोपस्करभेषजः ॥ १९ ॥

प्रत्युत्पन्नमतिर्धर्मान् व्यवसायी विशारदः ।

सत्यधर्मपरो यश्च स भिषक् पाद उच्यते ॥ २० ॥

वैद्य के गुण—ठीक प्रकार शास्त्र पढ़ा हुआ, एवं ठीक
प्रकार से शास्त्र का अर्थ समझा हुआ, छेदन स्नेहन आदि
कर्मों को देखा तथा स्वयं किया हुआ, छेदन आदि शस्त्र-
कार्यों में दक्ष हाथवाला, बाह्य एवं अन्दर से पवित्र ( रज्जु तम
रहित ), शूर ( विवाद रहित ), अग्रोपहरणीय अध्याय में
वर्णित साज-सामान सहित, प्रत्युत्पन्नमति ( उत्तम प्रतिभा-सक्ष
वाला ), बुद्धिमान् व्यवसायी ( उत्साही-न ध्वरानेवाला ),
विशारद ( पण्डित ), सत्यनिष्ठ, धर्मपरायण होना—ये वैद्य के
गुण हैं ॥ १९, २० ॥

आयुष्मान् सत्त्ववान् साध्यो द्रव्यवान् आत्मवानपि ।

आस्तिको वैद्यवाक्यस्थो व्याधितः पाद उच्यते ॥ २१ ॥

रोगी मनुष्य के गुण-आयुष्मान् ( दीर्घायु ), सत्त्ववान्
( क्लेश सहनेवाला ), साध्य ( साध्य रोग से पीड़ित ), द्रव्यवान्
( धनी ), आत्मवान् ( अलोकुप-जितेन्द्रिय ), आस्तिक ( पर-
लोक में, दान-यज्ञ में विश्वास रखनेवाला ), वैद्य के वचनों को
माननेवाला-रोगी उत्तम है ॥ २१ ॥

प्रग्रस्तदेगसंभूतं प्रग्रस्तेऽहनि चोद्भुतम् ।

युक्तमात्रं मनस्कान्तं गन्धवर्णरसान्वितम् ॥ २२ ॥

दोषघ्नमग्गलानिकरमडिकारि विपर्यये ।

समीक्ष्य दत्तं काले च भेषजं पाद उच्यते ॥ २३ ॥

भेषज के गुण—उत्तम देश में उत्पन्न, प्रशस्त दिन में
उखाड़ी गई, युक्तमात्र ( युक्तप्रमाण ), मन के प्रिय, गन्ध-वर्ण-
रस से युक्त, दोषों को नष्ट करनेवाली, ग्लानि न उत्पन्न करने-
वाली, विपरीत पड़ने पर भी स्वरूप विकार करनेवाली या विकार
न करनेवाली, देशकाल आदि की विवेचना करके रोगी को
समय पर दी गई औषध गुणकारी होती है ॥ २२, २३ ॥

स्निग्धोऽजुगुप्तुर्बलवान् युक्तो व्याधितरक्षणे ।

वैद्यवाच्यकृदश्रान्तः पादः परिचरः स्मृतः ॥ २४ ॥

परिचारक के गुण—स्निग्ध ( प्रीतियुक्त ), अजुगुप्तु
( लोभ एवं निन्दा रहित ), बलवान्, रोगी की रक्षा करने में
संलग्न, वैद्य के वचन को बिना किसी ऊहापोह के माननेवाला,
खेदरहित परिचारक प्रशस्त हैं ॥ २४ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने युक्तसेनीयो नाम

चतुर्लिशत्तमोऽध्यायः ॥ २४ ॥

पञ्चत्रिंशत्तमोऽध्यायः

अथात आतुरोपक्रमणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

इसके आगे 'आतुरोपक्रमणीय' नामक अध्याय की व्याख्या
करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये
कहा था ॥ १, २ ॥

आतुरोपक्रममाणेन भिषजाऽऽयुरादिवैव परीक्षित-
व्यम ; सत्यायुषि व्याध्यूत्वनितवयोदेहबलसत्त्वसात्त्व-
प्रकृतिभेषजदेशान् परीक्षेत् ॥ ३ ॥

रोगी की चिकित्सा करने से पूर्व वैद्य को रोगी की आयु
की परीक्षा करनी चाहिये । आयु के शेष होने पर तो, व्याधि
( साथ असाध्य भेद से ), मृत्यु, अग्नि, वय, देह, बल, सत्त्व,
सात्त्व, प्रकृति, भेषज, देश आदि की परीक्षा करनी चाहिये ॥

तत्र महापाणिपादपाश्चैपृष्ठस्तनाप्रदर्शनवदनस्कन्ध-
ललाटं दीर्घाङ्कुलिपर्वोङ्गासप्रेक्षणबाहुं, विस्तीर्णभ्रस्तानन्त-
रोरस्कं हृत्स्वजघामेद्वयोर्व, गम्भीरसत्त्वस्वरनाभिम्, अनु-
चैर्बद्धस्तनम्, उपचितमहारोमशकर्णं, पश्चान्मस्तिकं,
स्नातानुलिप्तं मूर्धातुपूर्वं विशुद्ध्यमाणशरीरं पश्चात्
विशुद्ध्यमाणहृदयं पुरुषं जानीयाद्दीर्घायुः खल्वयमिति ।
तमेकान्तेनोपक्रमेत् । एभिर्लक्षणैर्विपरितैरत्यायुः, मिश्रैर्भ-
ध्यमायुरिति ॥ ४ ॥

निम्न लक्षणोंवाला पुरुष दीर्घायु होता है—विशाल
हाथ-पाँववाला, विशाल पाश्ववाला, विशाल पीठ वाला,