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सर्वकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 154

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मुश्रतसंहिता

[ अ० २७ ]

आग से जलाने योग्य को जलाकर, अस्वेद्य एवं रक्तरहित व्रण पर घी मधु का लेप लगाकर पट्टी बाँधकर—आहार-विहार का उपदेश कर देना चाहिए। (सिरा-स्नायु में फँसे शल्य को उपदेश कर देना चाहिए।) (सिरा-स्नायु में फँसे शल्य को शलाका आदि द्वारा पृथक् करके निकालना चाहिये। हाथ से ग्रहण करने योग्य शल्यको, सूजन को दबाकर, बाहर निकालना चाहिये। और जो शल्य से ग्रहण करने योग्य न हो, निर्बल हो—उसको कुशादि से बाँधकर बाहर करना चाहिये।)

वि० मन्तव्य—शल्य के गात्र का नाम “वारङ्ग” है। यदि शोथ—सूजन से वारङ्ग आच्छादित हो गया हो अर्थात् टंक गया हो तो शोथ को दवाकर उसे नगा कर लो और फिर पकड़कर निकाल लो। यदि खींचने में वारङ्ग के टूट जाने का भय हो तो उसे डोरा से बाँधकर निकालो ॥१२॥

हृन्मयमितो वर्तमानं शल्यं जीतजलादिभिरुद्देजितस्यापहरेद्यथामार्गः, दुरुपहरमन्यतोऽपबाध्यमानं पाटयित्वोद्दरेत् ॥१३॥

उद्दिग्ध हृदयवाले पुरुष के हृदय के समीप स्थित शल्यको निकलते समय—रोगी को शीतल जल से सान्त्वना देकर—शल्य को प्रवेश मार्ग द्वारा बाहर निकालना चाहिये ॥१३॥

अस्थिविवरप्रविष्टमस्थिविदृष्टं वाऽवगृह्य पादाभ्यां यन्त्रेणापहरेत्, अगक्यमेवं या बलवद्भिः सुपरिगृहीतस्य यन्त्रेण ग्राह्यित्वा शल्यवारङ्गं प्रविभज्य धनुगुणैर्बद्धैर्वकत्रकांषके बन्धीयात्, अथैतं कशया ताडयेद्यथोन्नामयन् शिरोवेगेन शल्यमुद्दरति, तदा वा वृक्षशाखामवनम्य तस्यां पूर्ववद्बद्धोद्दरेत् ॥ १४ ॥

अस्थिच्छिद्र में प्रविष्ट या अस्थि में जोर से आसक्त शल्य को निकालने के लिये रोगी को पाँव से थामकर यन्त्र द्वारा निकालना चाहिए। यदि इस प्रकार से शल्य बाहर न आये तो रोगी को बलवान् पुरुषों द्वारा पकड़वाकर, यन्त्र द्वारा शल्य के ग्रहण करने योग्य भाग को पकड़कर, टेढ़ा करके मौर्ची (तांत) या घागे से एक पार्श्व में बाँधकर, धागों के दूसरे प्रान्त को पन्चाङ्गी१ बन्धन से बँधे घोड़े के मुख में लगाम लगाकर उसमें बाँध देना चाहिये। अब घोड़े को चाबुक से मारना चाहिये। जिससे कि घोड़ा सिर को जोर से ऊँचा उठाये।

१ पन्चाङ्गी कालक्षण—(१) पञ्चानामङ्गानां चतुर्णां पादानां मुखसमाहितानां समाहारः पन्चाङ्गी-बन्धविशेषः ॥

(२) त्वकपत्रकुसुमं मूलं फलमेकस्य शाखिनः।

एकत्र मिलितवन्चेतत् पन्चाङ्गमिति संज्ञितम् ॥

इन पाँचों अङ्गों का समाहार—पन्चाङ्गी—इतने बाँधना चाहिये। हाराणचन्द्रजी ने इसका सम्बन्ध मनुष्य के साथ किया है।

इस प्रकार करने से शल्य बाहर निकल आता है। अथवा वृक्ष की मजबूत शाखा को झुकाकर धागों का एक पार्श्व इसमें बाँध देना चाहिये और शाखा को छोड़ देना चाहिये। शाखा ऊपर जायेगी, उसके झटके से शल्य बाहर आ जायेगा।

वि० मन्तव्य—भीमसेन जैसे अस्थिसार मानवों तथा हस्ती आदि की अस्थि में घँसे—खुमे शल्य को यदि मानव के हाथ न निकाल सकें तो उक्त विधियों का उपयोग किया जाता है॥

अदेशोत्तुण्डितमष्टीलाइममुद्गराणामन्यतमस्य प्रहारेण विचाल्य यथामार्गमेव यन्त्रेण ॥१५॥

कुष्ठि आदि अच्छेदनीय प्रदेशों में अस्थि के अन्दर प्रविष्ट उत्तुण्डित शल्य को निकालने के लिये पत्थर अष्टीला (शिला), मुद्गर इनमें से किसी एक द्वारा चोट लगाकर हिलाना चाहिये, फिर यन्त्र से पकड़कर यथामार्ग (उचित रास्ते) से बाहर कर लेना चाहिये।

वि० मन्तव्य—तुण्ड अर्थात् मुख (शल्य का मुख)—अग्रभाग—यदि उत्तु—उधर—पार चला गया हो और वह अदेश—अमार्ग (वामभट्ट सू० अ० २८ श्लो० ४३ देखिये) क्षोतमय देश (कुष्ठि वक्षस् आदि) से भिन्न देश में अर्थात् सक्रिय बाहु आदि अवयव में स्थित हो तो उस शल्य को पत्थर आदि के प्रहार से ठोककर जिधर से घँसा है उधर से निकालो। उत्तुण्डित शल्य वह है जिसका तुण्ड पार चला गया हो। इसके मुखपर एकमुखी लोह नाली रखकर प्रहार करे, अन्यथा तीखा मुख मुड़ जाता है और उस ओर से निकलने में कठिनाई—कष्ट होता है, यह वामभट्ट की सम्मति है। उक्त अ० २८ श्लो० ४१ देखिये ॥१५॥

विमुदितकर्णानि कर्णवन्त्यनाबाधकरदेशोत्तुण्डितानि पुरस्तादेव ॥१६॥

कर्णवाले शल्य जो कि पीड़ा न करनेवाले प्रदेशों में लगे हों, उनके कर्ण को रगड़ करके, प्रवेश मार्ग से (प्रतिलोम) बाहर निकालना चाहिये।

वि० मन्तव्य—कर्णवन्ति—कर्ण—कानवाले या पक्षवाले शरशल्य कर्णवान् कह जाते हैं। यदि कर्णवान् शर उस पार निकल गया हो तो उन कर्णों को रेती से रगड़ दो, साफ हो जाने पर प्रवेश मार्ग से निकाल दो ॥१६॥

जातुपे कण्ठासक्ते कण्ठे नाडीं प्रवेश्यामितिमां च गलाकां, तथाऽवगृह्य जीताभिरग्निः परिपिच्छ्य स्थिरीमु शल्यमुद्दरेत् ॥१७॥

जिस समय लाख आदि वस्तु गले में फँस जाये, उस समय गले में एक नलिका को डालकर उसमें ताम्बे