सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
भूगोलाध्याय ७५१
समर्थन इस उदाहरण १ से करते हैं कि जैसे चलती हुई नाव पर बैठे हुए मनुष्य
को नाव स्थिर और किनारे के पेड़, घर आदि उलटी दिशा में चलते हुई दिखाई
पड़ते हैं इसी तरह नक्षत्र-चक्र अचल होने पर भी घूमनेवाली पृथ्वी पर के रहने
मनुष्यों को पच्छिम की तरफ घूमता हुआ देख पड़ता है परन्तु परम्परा विरुद्ध समझ
कर किसी ने नहीं माना और वराहमिहिर आदि ने ये तर्क उपस्थित किये थे ।
आचार्य वराहमिहिर का एक तर्क यह है कि यदि पृथिवी ही पूरब की ओर
घूमती है तो जो पक्षी अपने घोंसले छोड़ कर आकाश में उड़ जाते हैं वे फिर घोंसले
तक क्यों पहुँच जाते हैं क्योंकि पृथिवी के घूमने के कारण पृथिवी में लगा हुआ घोंसला
तो बहुत दूर पूरब में हो जाता और पक्षी आकाश में रह जाने से बहुत पीछे रह
जाता । दूसरा तर्क उन्होंने यह किया कि यदि पृथिवी पूरब की ओर घूमती तो पताका
झण्डा आदि सर्वदा पच्छिम की ओर उड़ते देख पड़ते क्योंकि यह साधारण
अनुभव की बात है कि यदि कोई मनुष्य रूमाल हाथ में लटका कर दौड़े तो उसके वेग
के कारण रूमाल पीछे की ओर उड़ने लगता है। और यदि यह कहा जाय कि
पृथिवी बहुत मंद गति से घूमती है इसलिये पताका आदि पच्छिम को उड़ते हुए नहीं
देख पड़ते तो इतनी मन्द चाल से पृथिवी दिन भर में एक चक्कर कैसे कर लेती है ।
चिड़ियों के अपने घोंसले तक पहुँच जाने का कारण यह है कि जब चिड़िया
आकाश में उड़ जाती है तब भी भूभ्रमण का जो वेग उस घोंसले में रहता है वह
उतना ही आकाश में भी बना रहता है, इसलिए जिस वेग से घोंसला पूर्व की ओर
घूमता जाता है उसी वेग से चिड़िया भी घूमती जाती है, हाँ उसको जान नहीं पड़ता ।
साथ ही साथ वह अपनी गति भी उत्पन्न कर सकती है जिससे वह घोंसले से दूर
जहाँ चाहे जाती है। जैसे रेलगाड़ी पर चढ़ा हुआ आदमी उस वेग का अनुभव
नहीं करता जिससे गाड़ी स्वयम् चल रही है, पर उसमें वह वेग वर्तमान रहता
अन्यच्च भवेद्भू मेरह्ना भ्रमरंहसा ध्वजादीनाम् ।
नित्यं पश्चात् प्रेरणमथाल्पगा स्यात्कथं भ्रमति ॥७॥
पंच सिद्धान्तिका अध्याय १३
प्राणेनैति कलां भूर्यदि तर्हि क तो ब्रजेत कमध्वानम् ।
आवर्त्तनमुर्ध्याश्चेन्न पतन्ति समुच्छ्रयाः कस्मात् ॥१७॥
ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त, तन्त्र परीक्षाध्याय
१. अनुलोम गतिर्नौस्थः पश्यत्यचलं विलोमगं यद्वत् ।
अचलानिभानि तद्वत्सम पश्चिमगानि लङ्कायाम् ॥६॥
आर्यभटीय, गोलपाद
७५२ सूर्य-सिद्धान्त
है। इस वेग के रहते हुए भी वह अपनी इच्छा-शक्ति से डब्बे में इधर-उधर चल
फिर सकता है, उछल कूद सकता है, गेंद खेल सकता है। क्योंकि गाड़ी में रखी हुई
जितनी वस्तुएँ हैं सबमें गाड़ी का वेग वर्तमान रहता है इसलिए यह वेग सबमें
समान रूप से रहने के कारण मालूम नहीं होता। इसका पता भी सहज ही लगाया
जा सकता है। यदि बहुत तीव्र चलती हुई गाड़ी में बैठ कर एक कंकड़ बाहर की
ओर सीधा फेंका जाय तो जब तक वह पृथ्वी को नहीं छू लेता तब तक गाड़ी के
साथ ही साथ आगे बढ़ता हुआ देख पड़ता है। यह बात उस समय और भी स्पष्ट
देख पड़ती है जब कंकड़ उस समय फेंका जाय जिस समय गाड़ी किसी नदी के पुल
पर चलने लगे क्योंकि ऐसी दशा में कंकड़ को धरातल तक पहुँचने में कुछ देर लगेगी
इसलिए वह देर तक गाड़ी के साथ आगे बढ़ता हुआ देख पड़ेगा और उस जगह
नहीं गिरेगा जिस जगह लक्ष्य करके फेंका जाय वरन् आगे बढ़ कर ठीक अपने ही
सीध में गिरेगा। इससे जाना जा सकता है कि जब कोई वस्तु किसी वेग से चलती
हुई गाड़ी, वायुयान आदि से अलग होती है तब भी उसमें वह वेग वर्तमान रहता
जो गाड़ी में था और जब तक वह वस्तु किसी दूसरे वस्तु पर ठहर नहीं जाती तब
तक उसका वेग नष्ट नहीं होता, इसी कारण यदि चलती हुई गाड़ी से कोई कूदता
है तो वह गाड़ी के वेग के कारण आगे बढ़ कर गिर जाता है।
इस बात की दूसरी परीक्षा इस प्रकार की जा सकती है। यह तो सभी को
मालूम है कि यदि कोई गरुई चीज़ कुछ ऊँचाई से छोड़ दी जाय तो वह अपने ठीक
नीचे पृथ्वी पर गिरती है। बड़ी रेलगाड़ी के डब्बे की ऊँचाई फ़र्श से १० फुट के
लगभग होती है। इसलिए यदि छत के पास से पत्थर का टुकड़ा नीचे गिराया जाय
तो फ़र्श पर पहुँचने में उसे ६, १० फुट चलना पड़ेगा और इसमें उसे पौन सेकंड
के लगभग लगेगा। इतनी देर में यदि गाड़ी ३० मील प्रति घंटे की चाल से चलती
हो तो ३३ फुट आगे बढ़ जाती है। इसलिए यदि वराहमिहिर का तर्क ठीक हो तो
पत्थर के उस स्थान पर नहीं गिरना चाहिये जो उस स्थान से ठीक नीचे है जहाँ से
पत्थर गिराया जाता है वरन् ३३ फुट पीछे गिरना चाहिये। परन्तु ऐसा देख नहीं पड़ता।
देखने में वह वहीं गिरता है जिसके ठीक ऊपर से गिराया जाता है। इसका कारण
यह है कि पत्थर जिस समय छत से गिराया जाता है उस समय उसमें गाड़ी की जो
गति वर्तमान रहती है वह गिरने के समय भी वर्तमान रहती है इसलिए चीज गिरते
रहने के साथ-साथ गाड़ी के साथ आगे भी बढ़ता जाता है और ठीक वहीं गिरता है
जिसके ऊपर से गिराया जाता है। सर्कस के खेल में दौड़ते हुए घोड़े की पीठ पर से
ऊपर से ऊपर उछल जाना और फिर उसी की पीठ पर आ जाना इसी नियम का
परिणाम है।
भूगोलाध्याय ७५३
अब रही ध्वजा की बात । ध्वजा के प्रत्येक कण में पृथ्वी का वेग रहता है ।
इसी तरह हवा में भी जो पृथ्वी का एक अंग ही है वह वेग वर्तमान रहता है इसीलिए
ध्वजा का कपड़ा पृथ्वी की गति के कारण पश्चिम की ओर उड़ता हुआ नहीं देख
पड़ता । गाड़ी, मोटर या रेलगाड़ी के बाहर ध्वजा लगी हुई हो तो वह पीछे की
ओर उड़ती हुई देख पड़ती है क्योंकि रेलगाड़ी या मोटर की गति से बाहर की हवा
का कोई लगाव नहीं रहता, यह तो हवा को चीरती हुई चलती है इसलिए यह पीछे
की ओर बढ़ती है और ध्वजा पताका इत्यादि को पीछे की ओर उड़ाती है । हां यदि
रेलगाड़ी या मोटर के सब द्वार बन्द कर दिये जाँय तो इसके भीतर की हवा का
सम्बन्ध बाहर की हवा से टूट जाता है और उसमें गाड़ी का वेग वर्तमान रहता है
इसलिए उसमें ध्वजा को पीछे उड़ाने की शक्ति नहीं रहती । इसी प्रकार पृथ्वी का
वातावरण भी ध्वजा को पीछे उड़ाने में असमर्थ होता है क्योंकि पृथ्वी वातावरण को
चीरती हुई नहीं चलती वरन् साथ लिए हुई चलती है इसलिए उसमें भी वही वेग
रहता है ।
आचार्य ब्रह्मगुप्त का यह तर्क कि पृथ्वी के घूमने से ऊँचे-ऊँचे घरों, पर्वतों
आदि कीचोटी कभी ऊपर और कभी नीचे हो जाती और जब नीचे हो जाती तो
यह अवश्य गिर पड़ते परन्तु ऐसा नहीं होता इसलिए पृथ्वी नहीं घूमती, बिल्कुल
पृथ्वी है । ऊँचाई और नीचाई की कल्पना पृथ्वी के ही विचार से की जाती है ।
पृथ्वी की ओर जो दिशा है वह नीचे की दिशा कही जाती है और इससे उल्टी
आकाश की ओर की दिशा को ऊँची दिशा कही जाती है और जो वस्तुएँ गिरती
हैं वे पृथ्वी की आकर्षण शक्ति के कारण ही पृथ्वी पर गिरती हैं इसलिए यदि कोई
गोला पृथ्वी के ऊपर हवा में घुमाया जाय और उसमें कोई ऐसी वस्तु चिपका दी जाय
तो पृथ्वी की ओर होने पर पृथ्वी पर गिर पड़े तो यह बिल्कुल ठीक है । परन्तु जहाँ
पृथ्वी के ही घूमने का प्रश्न है वहाँ इसके नीचे क्या है जिसके आकर्षण से भूपृष्ठ के
ऊँचे घर या पर्वत उस ओर गिर कर चले जायँ ? पृथ्वी के चारों ओर आकाश ही
आकाश है इसलिए वह चाहे जितनी घूमे उस पर के घरों और पर्वतों की चोटी
सदैव आकाश की ही ओर रहेगी और नींव पृथ्वी की ओर इसलिए वे गिर कर
कहाँ जा सकते हैं ।
यहाँ तक तो शंकाओं का समाधान किया गया । अब उदाहरण दे कर
गणितशास्त्र के आधार पर सिद्ध किया जायगा कि पृथ्वी में गति है ।
अर्वाचीन विज्ञान से पृथ्वी के अक्ष-भ्रमण के प्रमाण—
यह साधारण अनुभव की बात है कि पहिये का वह विन्दु जो धुरी से दूर
७५४ सूर्य-सिद्धान्त
है धुरी के पास वाले बिन्दु से अधिक चलता है और पहिये के किनारे पर जो
बिन्दु है उसमें उन सब बिन्दुओं से अधिक वेग रहता है जो बीच में होते हैं। यदि
पृथ्वी ऐसे अक्ष पर घूमती हुई मानी जाय जिसका एक सिरा उत्तरी ध्रुव पर और
दूसरा दक्षिणी ध्रुव पर हो तो यह स्पष्ट है कि किसी ऊँचे पेड़, मकान या मीनार
की चोटी उसके आधार की अपेक्षा पृथ्वी के अक्ष से अधिक दूरी पर है इसलिये चोटी
की गति उसके आधार की गति से अधिक होगी। इसलिए यदि कोई वस्तु किसी
ऊँचे मीनार की चोटी से गिरायी जाय तो वह अधिक वेग के कारण ठीक नीचे न
गिर कर कुछ पूरब की ओर बढ़कर गिरेगी क्योंकि उसके ठीक नीचे वाले विन्दु
चित्र नं० १२६
की चाल उससे मन्द है। मान लो स एक मीनार की चोटी है जहाँ से वस्तु नीचे
गिरायी जाती है और प मीनार का मूल है जो स के ठीक नीचे है इसलिये लम्ब
रेखा स प बढ़ाने पर पृथ्वी के केन्द्र क पर पहुँचेगी। यदि मान लिया जाय कि
जितनी देर में वस्तु पृथ्वी तल पर पहुँचती है मीनार की चोटी स से सा तक घूम
गयी तो मीनार का मूल प से पा तक पहुँचेगा क्योंकि चोटी और मूल को मिलाने
बाली रेखा पृथ्वी के केन्द्र को सदैव जायगी। यह स्पष्ट है कि प पा, स सा से कम
है। यह भी स्पष्ट है कि प की भ्रमण गति स की भ्रमण गति से कम है। परन्तु
जो वस्तु स बिन्दु से गिरायी जायगी उसकी गति स की गति के समान होगी इस-
लिये वह गिरते हुए भी अपनी ऊपर वाली गति को धारण किये रहेगी इसलिये
भूगोलाध्याय ७५५
वह पा पर न गिर कर पि पर गिरेगी जहां प पि, स सा के समान है अर्थात् वह
वस्तु लम्ब रेखा से कुछ पूरब की ओर बढ़कर गिरेगी ।
इसलिये यदि परीक्षा करके यह सिद्ध किया जाय के कि ऊपर से गिरी हुई
वस्तु पृथ्वी पर पहुँचते-पहुँचते यथार्थ में कुछ पूरब की ओर बढ़ जाती है तब यह
कल्पना भी ठीक मानी जा सकती है कि पृथ्वी पूरब की ओर भ्रमण करती है ।
परन्तु यह परीक्षा कठिन है क्योंकि इतना ऊँचा स्थान नहीं बनाया जा सकता कि
उसकी चोटी और मूल की भ्रमण गतियों में इतना अन्तर हो कि वह साफ साफ देख
पड़े क्योंकि पृथ्वी की त्रिज्या ४००० मील के लगभग है और मीनार की चोटी १०००
फुट भी नहीं हो सकती । बोलोन और हेमबर्ग में इस सम्बन्ध में जितनी परीक्षाएँ
की गयीं उनसे सिद्ध हुआ कि २५० फुट की ऊँचाई से गिरी हुई वस्तु लम्ब रेखा से
तिहाई इंच पूरब बढ़ जाती है । गणना करके यह देखा जा सकता है कि जितनी देर
में कोई वस्तु २५० फुट नीचे गिरती है उतनी देर में चोटी और मूल की अथवा
स और प बिन्दुओं की गतियों का अन्तर भी उतना ही होता है । इसलिये इससे सिद्ध
होता है कि पृथ्वी में भ्रमण गति है । इस प्रयोग की पूरी गणना यहाँ नहीं दी जा
सकती क्योंकि बिना उच्च गणित की जानकारी के वह समझ में आ नहीं सकता ।
इसलिये यहाँ केवल सारमात्र दिया गया है ।
इस प्रयोग की कल्पना पहले पहले न्यूटन ने की थी । पृष्ठ ७५४ पर जो चित्र
दिया गया है वह विषुवत् रेखा पर स्थित देशों के लिये उपयुक्त है । अन्य स्थानों के
लिये इसकी गणना में कुछ परिवर्तन करना पड़ता है क्योंकि विषुवत् रेखा से अन्य
स्थानों में गिरनेवाली वस्तु में दो गतियाँ हो जाती हैं जिनकी दिशाएँ भिन्न होती हैं ।
एक गति तो पृथ्वी के दैनिक भ्रमण की होती है जो गिरने वाली वस्तु को मीनार की
चोटी से प्राप्त होती है और पृथ्वी के अक्ष के समकोण तल पर होती है और दूसरी
गति पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण होती है जिससे वस्तु पृथ्वी के केन्द्र की ओर
गिरती है । इसलिये वस्तु लम्ब दिशा से पूरब की ओर तो बढ़ जाती है, साथ ही
साथ कुछ दक्षिण या उत्तर भी हो जाती है । गिरते समय वस्तु पर हवा की रगड़
का भी कुछ प्रभाव पड़ता है परन्तु इन सब बातों के होते हुए भी मूल सिद्धान्त में
कोई अन्तर नहीं होता ।
यह प्रयोग कोयले की गहरी खानों में भी किया जाता है क्योंकि यहाँ गिरने
के लिये गहराई अधिक मिल सकती है । ५०० फुट की ऊँचाई से गिरायी हुई वस्तु
लम्ब दिशा से १ इञ्च के लगभग पूरब बढ़ जाती है । यह कई प्रयोगों का मध्यमान
है, गणना से भी यही बात सिद्ध होती है ।
७५६ सूर्य-सिद्धान्त
(२) परन्तु इससे भी सहज और स्पष्ट प्रयोग फूको (Foucault) का लोलक-
प्रयोग (Pendulum experiment) है । गणित शास्त्र से यह सिद्ध है कि यदि कोई
लोलक केवल गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव के स्पन्दन करे या झूले तो इसका स्पन्दन तल
(झूलने की दिशा) वही बना रहेगा और इस तल की दिशा पर लोलक के आधार की
गति का प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि ऐसी दूसरी कोई शक्ति नहीं है जो इसे इस तल
से विचलित कर सके । यह सहज ही देखा जा सकता है कि यदि एक भारी लोलक
एक पतले तार से लटका कर घड़ियों के लोलक की तरह झुलाया जाय और यदि
वह आधार जिसमें लोलक लटकाया जाता है घुमाया जाय तो इसके घूमने से लोलक
के स्पन्दन-तल में कोई अन्तर नहीं पड़ता क्योंकि जिस तार या डोरे में लोलक बंधा
रहता है उसका जरा सा ऐंठ जाना अधिक सहज है न कि भारी लोलक का ही अपने
स्पन्दन तल को बदलना जब कि वह पहले ही से एक तल में झूल रहा है । इसलिये
यह सिद्ध है कि यदि पृथ्वी अचल हो तो लोलक के स्पन्दन की दिशा भी आसपास
की वस्तुओं तथा आधार के विचार से अचल रहेगी और यदि इसमें भ्रमणगति होगी
तो लोलक के स्पन्दन तल की अपेक्षा भूतल की दिशाओं में परिवर्तन हो जायगा और
लोलक का स्पन्दन तल ही बदलता हुआ देख पड़ेगा । इसलिये इस लोलक-प्रयोग से
पृथ्वी की भ्रमण गति का ही पता नहीं लगेगा वरन् इसकी दिशा का भी पता लगेगा ।
फूको ने यह प्रयोग सन् १८५१ ई० या १६०८ वि० में पेरिस में किया था ।
उसने अपने लोलक को पैन्थियन नामक विशाल भवन के गुम्बज से लटकाया ।
इसका तार २०० फुट लम्बा था और गोले की तोल १ मन के लगभग (८० पौंड)
थी । जिस समय लोलक झूलता था गोले के नीचे निकली हुई सुई अपने झूलने का
चिह्न बालू तल पर बनाती जाती थी और यह देख पड़ता था कि बालू का तल
अपसव्य दिशा में अर्थात् दहिने से बायें पच्छिम से पूरब घूमता जाता था ।
इस प्रयोग में दो बातों की बड़ी सावधानी रखनी पड़ती है । लोलक का तार
जितना ही लम्बा हो उतनी ही अधिक देर तक यह झूलता रहेगा नहीं तो अपनी
तीव्र गति से हवा की रगड़ खा कर जल्द रुक जायगा । दूसरे इसका गोला जितना
ही भारी हो अच्छा है क्योंकि इससे लटकाने के दोषों का तथा हवा की रगड़ का
प्रभाव बहुत कम पड़ जाता है ।
इस प्रयोग को बहुत सफलतापूर्वक करने का उद्योग अमेरिका के एक
विज्ञानवेत्ता रसेल डेबलू फोर्टर ने १ किया है । इन्होंने पियानो बाजा के लगभग १२
१. देखो जुलाई सन् १६२८ ई० के सायंरिफिक अमेरिकन Scientific
American पृष्ठ १४, १५ ।
भूगोलाध्याय ७५७
चित्र नं० १३०
फुट लम्बे तार से ढलवे लोहे का कोई ४० पौंड या २० सेर का गोला छत की धरन
से लटकाया । यह देखा गया है कि लोलक की गति धीरे धीरे मंद पड़ जाती है परन्तु
यदि इनका लोलक लम्ब दिशा से तीन फुट तक खींच कर झुलाया जाय तो आधे
घंटे के बाद भी वह लम्ब रेखा से २ फुट इधर उधर झूलता रहता है ।
७५८ सूर्य्य-सिद्धान्त
हां, इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि जिस छत में लोलक लटकाया
जाय उसमें किसी प्रकार का स्पन्दन न हो और कमरे की हवा में किसी प्रकार का
झोंका न हो । लोलक लटकने पर प्रायः घूमता रहता है जिससे डोरे या तार में
ऐंठन पड़ जाती है । इससे लोलक में एक दूसरी गति उत्पन्न हो जाती है । इसलिये
इसे रोकने के लिये इन्होंने तार को एक पीतल के हुक में लटकाया जिसका आकार
प्रश्नवाचक चिह्न की तरह था और हुक की नोक एक छिछली प्याली में थांभ दी
गयी जो धरन पर अच्छी तरह कसी हुई थी । प्याली का नतोदर तल अच्छी तरह
चिकना कर दिया था ।
लोलक को झुलाने के पहले बिल्कुल निश्चल रखना चाहिये । इसलिये गोले
में एक डोरा बांध कर डोरे को इतना खींच कर दीवाल में बांध देना चाहिये कि गोला
धरण-बिन्दु की लम्ब रेखा से २, ३ फुट हट जाय । अब यदि डोरे को जला दिया
जाय तो गोला हिलने लगेगा और बराबर एक ही तल में झूलता रहेगा । यदि ऐसा
न किया जाय तो गोला एक लम्बे दीर्घवृत्त में झूलने लगता है और यदि आरंभ में
जरा सी भी गड़बड़ हो तो कुछ देर में बहुत बड़ा रूप धारण कर लेता है ।
लोलक के झूलने की दिशा चाहे जो हो परन्तु यदि आरम्भ उत्तर दक्षिण
दिशा से किया जाय तो अच्छा है । गोले के नीचे जो सुई निकली हुई हो वह मेज के
इतने पास हो कि उस पर रखी हुई कागज की तख्ती के छूने से तनिक ही बची
रहे । गोला झुलाने के बाद कागज की तख्ती पर एक सीधी रेखा पेंसिल से खींच
कर तख्ती को मेज पर इस प्रकार सरका दो कि सुई छू न जाय और खींची हुई
रेखा सुई के झूलने के तल से ठीक मिल जाय । अब तख्ती की रेखा के दक्षिणी
किनारे को ध्यान से देखना चाहिये । दो ही तीन मिनट में तख्ती की रेखा का
दक्षिणी सिरा पच्छिम से पूरब को अर्थात् अपसव्य दिशा में या घड़ी की विरुद्ध दिशा
में घूमता हुआ देख पड़ेगा । कारण यह कि तख्ती पृथ्वी के साथ पच्छिम से पूरब
को घूमती रहती है । यह प्रयोग यदि विषुवत् रेखा से दक्षिण के देशों में किया जाय
तो तख्ती की रेखा घड़ी की अनुकूल दिशा में घूमती हुई देख पड़ेगी ।
अब देखना है कि प्रयोग का परिणाम गणना से कहाँ तक मिलता है ।
यदि किसी प्रकार यह सम्भव हो कि लोलक उत्तरी ध्रुव पर लटकाया जाय
तो लोलक की लम्ब-रेखा और पृथ्वी का अक्ष एक ही दिशा में होंगे । इसलिए जैसे-
जैसे पृथ्वी पच्छिम से पूरब की ओर घूमती जायगी इसके साथ दर्शक के खड़ा
होने का तल भी पच्छिम से पूरब को घूमेगा और लोलक का स्पन्दन तल पूरब से
पच्छिम की ओर हटता हुआ जान पड़ेगा क्योंकि दर्शक पृथ्वी के घूमने को नहीं देख
भूगोलाध्याय ७५६
सकता । इसलिए लोलक का स्पन्दन-तल उलटी दिशा में २३ घंटे ५६ मिनट ४
सेंकेड में एक चक्कर लगा लेने की गति से घूमता हुआ देख पड़ेगा ।
( चित्र नं० १३१ )
७६० सूर्य-सिद्धान्त
यह सम्भव नहीं कि एक बार का झुलाया हुआ लोलक लगातार २४ घंटे
तक झूलता रहे । परन्तु जितनी देर तक वह झूलता रहेगा उतनी ही देर में इसका
स्पन्दन-तल इतना घूमा हुआ देख पड़ेगा कि उससे अनुपात द्वारा सहज ही जाना जा
सकता है कि एक चक्कर लगाने का समय क्या हो सकता है ।
पोर्टर ने अपने लोलक को इस प्रकार लटकाया था । एक पीतल का हुक
जिसकी मोटाई दे इञ्च थी एक फौलाद की प्याली में रखा गया है जिसमें
ऐंठन न पड़े । (देखो चित्र १३१)
यदि विषुवत् रेखा पर लोलक झुलाया जाय तो इसकी नोक से बनी हुई
लकीर एक दूसरे के ऊपर होगी क्योंकि यहाँ इसके दोनों किनारों की पच्छिम से
पूरब वाली गति समान है इसलिए लोलक का स्पन्दन-तल घूमता हुआ नहीं देख
पड़ेगा वरन् एक ही लकीर पर चलता रहेगा ।
परन्तु विषुवत् रेखा से भिन्न स्थानों में यह बात नहीं होगी क्योंकि लोलक के
ठीक नीचे के धरातल के उस भाग में जो विषुवत् रेखा के पास है पृथ्वी के घूमने
की गति उससे अधिक है जो ध्रुव के पास है इसलिए इसका परिणाम यह होगा कि
लोलक की नोक से जो लकीर बालू पर बनेगी उसका वह किनारा जो विषुवत् रेखा
की ओर है ध्रुव की ओर वाले किनारे से अधिक वेग से घूमने के कारण पूरब की
वि
स
अ
९०-अ
धा ध
क
प
वी
( चित्र नं० १३२ )
भूगोलाध्याय ७६१
ओर हटता हुआ और ध्रुव की ओर वाले किनारे का चक्कर लगाता हुआ देख पड़ेगा
परन्तु यह चक्कर २३ घंटे ५६ मिनट ४ सेंकेड से अधिक समय में पूरा होगा जैसा
कि नीचे की गणना से सिद्ध है ।
कल्पना करो कि परीक्षा के स्थान स का उत्तरी अक्षांश अ है । वि वी विषुवत्
रेखा, क पृथ्वी का केन्द्र, ध धा पृथ्वी का अक्ष और ध उत्तरी ध्रुव है। ध धा
अक्ष पर घूमने वाला पृथ्वी का कोणीय वेग व गति-विज्ञान के अनुसार दो भागों में
बाँटा जा सकता है, जिसका एक भाग क स पर और दूसरा भाग क प पर घूमता
हुआ समझा जा सकता है ।
वेग का यह भाग जो क स पर है व कोटिज्या (६०°-अ) अथवा व ज्या अ
के समान होगा और जो भाग कप पर है वह व कोज्या अ के समान होगा ।
परन्तु कप पर घूमने वाला वेग क स के समानान्तर होगा इसलिए इसका प्रभाव
लोलक पर वैसा ही पड़ेगा जैसा विषुवत् रेखा पर पड़ता है अर्थात् इसके कारण
लोलक से बनने वाली लकीर की दिशा में कोई परिवर्तन नहीं होगा परन्तु क स पर
घूमने वाला वेग झूलते हुए लोलक की सुई से बनी हुई लकोर की दिशा में परिवर्तन
करेगा जिससे लकीर का दक्षिणी सिरा पच्छिम से पूरब की ओर खसकता हुआ
देख पड़ेगा और जान पड़ेगा मानों लोलक का स्पन्दन तल ही पूरब से पच्छिम की
ओर घूम रहा है क्योंकि पहली लकीर से दूसरी लकीर पच्छिम की ओर बनती चली
जायगी।
अब यह देखना है कि कितनी देर में लोलक का स्पन्दनतल यदि लगातार
झूलता रहा तो एक चक्कर लगा लेगा। यह मान लिया गया है कि पृथ्वी के अक्ष पर
घूमता हुआ वेग व है और स स्थान पर इसका खण्ड वेग व ज्या अ है इसलिए यह
जानना सहज है कि जब व वेग से एक चक्कर २४ घंटे में पूरा होता है तब व ज्या अ
वेग से एक चक्कर अधिक समय में पूरा होगा इसलिए लोलक से बनी हुई लकीरों
का पूरा चक्कर $\frac{व\times २४ घंटा}{व ज्या अ} = \frac{२४ घंटा}{ज्या अ}$ समय में पूरा होगा। जहाँ अ स्थान का
अक्षांश है। यदि प्रयाग में यह प्रयोग किया जाय तो एक चक्कर $\frac{२४ घंटा}{ज्या २५^\circ २५'} =$
$\frac{२४ घंटा}{.४२६२} =$ ५५ घंटा ५५ मिनट या मोटे हिसाब से ५६ घंटे में होगा । इसलिये
यदि आधे घंटे भी लोलक झूलता रहे तो स्पन्दनतल की दिशा में पर्याप्त परिवर्तन
देख पड़ेगा क्योंकि जब ५६ घण्टे में पूरा चक्कर होता है तब आधे घण्टे में
$\frac{१}{२} \times ३६० \times \frac{१}{५६}अंश = \frac{४५}{१४} = ३ अंश १३कला के लगभग परिवर्तन हो जायगा ।$
२१
७६२ सूर्य-सिद्धान्त
जो सहज ही देखा जा सकता है क्योंकि यदि लोलक लम्ब से २ फुट भी हटा कर
झुलाया जाय तो ३ अंश के परिवर्तन में लोलक १ इञ्च से अधिक दूर हट जायगा ।
इस प्रकार के प्रयोग भिन्न-भिन्न अक्षांशों पर भिन्न-भिन्न विज्ञानवेत्ताओं ने
किये और सबके प्रयोगों से यही बात सिद्ध होती है कि लोलक से बनी हुई रेखा
के पूरा घूम जाने का समय = २४ घण्टा / ज्या अक्षांश और एक घण्टे में घूमने का परिमाण
इस प्रकार निकलेगा (२४ घण्टा / ज्या अक्षांश) : १ घण्टा : : ३६० अंश : इष्ट परिमाण
∵ इष्ट परिमाण = (३६० ✕ ज्या अक्षांश) / २४ = १५ ज्या अक्षांश
अगले पृष्ठ की सारिणी में १ भिन्न-भिन्न प्रयोगों का परिणाम दिया जाता है—
इस सारणी से प्रत्यक्ष हो जाता है कि लोलक के स्पन्दन तल की दिशा का
परिवर्तन पृथ्वी की ही भ्रमण गति से होता है । यह सब प्रयोग विषुवत् रेखा से
उत्तर के देशों के लिए है । विषुवत् रेखा से दक्षिण के देशों में भी परिवर्तन इसी
नियम से होता है ।
(३) पृथ्वी की भ्रमणगति सिद्ध करने के लिए एक तीसरी रीति भी है,
जिसे फूको ने ही निकाली थी । यदि किसी चक्र का किनारा बहुत भारी हो और
उसका अक्ष उसके केन्द्र से जाता हुआ उसके धरातल से समकोण बनाता हो वह
चक्र अपने अक्ष पर बहुत वेग से घूम सकता हो तो ऐसे चक्र को घुमना पहिया
(gyrostat) कहते हैं । यदि इसके साथ इसका आधार भी हो जिससे यह थमा रहता
है तो इसका नाम घुमनाचक्र (gyroscope) हो जाता है । एक साधारण घुमना चक्र
का चित्र १३३ है—
क ख चक्र सम धरातल अक्ष ग घ पर घूम सकता है और जिस चक्र पर
ग घ अक्ष है वह च छ सम धरातल अक्ष पर घूम सकता है (छ अक्षर चित्र में
स्पष्ट नहीं है । यह घ के पास और यंत्र के कुछ पीछे है) । च छ अक्ष कुल को लेता
हुआ ज म लम्ब अक्ष पर घूम सकता है । यह यंत्र ऐसा बनाना चाहिये कि इसके
घूमते समय रगड़ कम से कम हो । ये तीनों अक्ष एक दूसरे से समकोण पर होने हैं,
ग, घ और च छ अक्ष समधरातल में और ज म अक्ष लम्ब दिशा में । यदि रगड़
१. उर्दू के वैज्ञानिक मासिक पत्र 'रोशनी' अप्रैल १६१६ ई० पृष्ठ २८०-८१
के आधार पर जो Movements of the earth by Norman Lockyer F.R.S.
से लिया गया है ।
भूगोलाध्याय ७६३
| प्रयोग का स्थान | अक्षांश (अंश / कला) | १ घंटे में स्पन्दन तल की दिशा में परिवर्तन प्रयोग से (अंश) | १ घंटे में स्पन्दन तल की दिशा में परिवर्तन गणना से (अंश) | प्रयोगकर्ता का नाम |
|---|---|---|---|---|
| सीलोन | ६ | ५६ | १.८७० अंश | १.८१५ अंश |
| न्यूयार्क | ४० | ४४ | ६.७३३ | ६.८१४ |
| Provinces R. I. | ४० | ४६.५ | ६.६५५ | ६.८३३ |
| न्यूहेवन | ४१ | १८.५ | ६.६७० | ६.६२७ |
| जेनेवा | ४६ | १२ | १०.५२२ | १०.८५६ |
| पेरिस | ४८ | ५० | ११.५०० | ११.३२३ |
| ब्रिस्टल | ५१ | २७ | ११.७८८ | ११.७६३ |
| डबलिन | ५३ | २० | ११.६१५ | १२.०६५ |
| एवरडीन | ५७ | ६ | १२.७०० | १२.६२८ |
७६४ सूर्य-सिद्धान्त
(चित्र नं० १३३)
बहुत कम हो जिससे प्रत्येक अक्ष की गति पूरी तरह स्वतन्त्र हो तो घुमने-यंत्र में
अनेक अद्भुत गुण पाये जाते हैं जब कि क ख चक्र खूब तेज़ी से घूम रहा हो ।
एक महत्व का गुण यह है कि यदि क ख चक्र तेज़ी से चला दिया जाय तो ग घ
अक्ष की दिशा सर्वदा एक ही बनी रहती है जब कि घुमना-चक्र एक जगह से दूसरी
जगह ज म को पकड़ कर हटाया जाता है । जब घुमना-चक्र के अक्ष की दिशा पृथ्वी
के अक्ष के समानान्तर रखी जाती है तब तो इसकी दिशा आस पास की वस्तुओं
की दृष्टि से स्थिर रहती है परन्तु यदि इसका अक्ष किसी अन्य दिशा में करके यह
घुमाया जाय तो अक्ष उसी प्रकार दिशा बदलता है जैसे तारे । यदि अक्ष किसी
विशेष तारे की दिशा में करके चक्र घुमाया जाय तो जब तक वह चक्र घूमता रहेगा
अक्ष सदा उसी तारे की दिशा में रहेगा। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि तारों की
भूगोलाध्याय ७६५
दिशा स्थिर है और उनका प्रतिदिन का पूरब से पच्छिम को घूमना पृथ्वी की दैनिक
गति के कारण है ।
इन प्रयोगों के सिवा बहुत सी घटनाएँ ऐसी हैं जिनसे पृथ्वी का अक्ष भ्रमण
सिद्ध होता है। उत्तर गोल में लोलक की नोक से बनी हुई रेखा घड़ी की प्रतिकूल
दिशा में घूमती है वैसे ही यहाँ बवंडरों के घूमने की दिशा भी होती है । परन्तु
दक्षिण गोल में लोलक की नोक से बनी हुई रेखा तथा बवंडरों की दिशा घड़ी की
अनुकूल दिशा में घूमती हैं। जो हवाएँ विषुवत् रेखा से ध्रुव की ओर चलती हैं वे
उत्तर गोल में पूरब की ओर अर्थात् दाहिने और दक्षिण गोल में भी पूरब की ओर
अर्थात् अपने बायें मुड़ जाती हैं। इसका कारण सिवा इसके और क्या हो सकता
उत्तर गोल में बवंडरों की दिशा
दक्षिण गोल में बवंडरों की दिशा
(चित्र १३४)
७६६ सूर्य-सिद्धान्त
है कि जब विषुवत् रेखा के ऊपर की हवा गरम होकर हलकी होती है तब यह ऊपर
उठती है इसलिए इसकी जगह भरने के लिए ध्रुवों के पास की ठंडी हवा विषुवत्
रेखा की ओर चलती है । परन्तु विषुवत् रेखा पर पृथ्वी की गति पूर्व की ओर
अत्यन्त तीव्र होती है और ज्यों-ज्यों ध्रुवों की ओर जाओ त्यों-त्यों यह गति मन्द
पड़ती जाती है इसलिए जो हवा विषुवत् रेखा से चलती है उसकी भी पूर्व की
ओर गति तीव्र रहती है इसलिए यह ध्रुवों की ओर के देशों में पहुँचती है जिनकी
पूर्वी गति मन्द रहती है । तब यह पूर्व की ओर मुड़ जाती है । इसी प्रकार जो हवा
ध्रुवों से विषुवत् रेखा की ओर चलती है वह पच्छिम की ओर को मुड़ जाती है ।
समुद्र की धाराओं की दिशा भी इसी प्रकार की होती है । मेक्सिको की
खाड़ी से जो विषुवत् रेखा के पास है जो गरम जलधारा अटलांटिक महासागर में
उत्तर की ओर चलती है वह आगे चलकर पूरब की ओर मुड़ जाती है और उत्तर
पूरब दिशा में चलती हुई अटलांटिक महासागर की दूसरी ओर फ्रांस, इंग्लैंड, नारवे
आदि देशों में पहुँचती है तथा उत्तर की ठंडी धारा ग्रीनलैंड से उत्तरा अमेरिका
की ओर जाती है । इसी का फल फल है कि नारवे का हैमरफैस्ट का बन्दरगाह
जो ७० १/२ उत्तरी अक्षांश पर है बारहों महीने बर्फ से मुक्त रहता है जब कि उत्तरी
अमेरिका का पूरबी किनारा ४० अक्षांश तक जाड़ा भर और गरमी के भी अधिक
भाग तक बर्फ से ढका रहता है ।
इसी प्रकार हिन्द महासागर के द्वीपसमूह से जो गरम जल धारा उत्तर
की ओर को चलती है वह पूरब की ओर को मुड़ कर जापान के पूरबी भाग को
गरम रखती है और उत्तर से ठंडी जलधारा जापान के पच्छिमी किनारे से होती
हुई चीन सागर में ठीक उलटी दिशा में आती है ।
यह संक्षेप में बतलाया गया है कि पृथ्वी की दैनिक गति के कारण हवाओं
और धाराओं की दिशाओं में क्या परिवर्तन हो जाता है । यदि इस विषय पर अधिक
जानना हो तो भूगोल की अच्छी पुस्तकों से काम लेना चाहिए ।
इस अक्ष भ्रमण के सिवा पृथ्वी में एक दूसरी गति भी होती है जिससे यह
वर्ष में भर सूर्य की परिक्रमा कर लेती है परन्तु जान पड़ता है मानों सूर्य ही पृथ्वी
की परिक्रमा करता है । पृथ्वी की इस गति का प्रमाण और भी सूक्ष्म है जिसका
विचार आगे कहीं किया जायगा । इस समय केवल इतना स्मरण करा देना पर्याप्त
होगा कि पृथ्वी की इस गति के ही कारण ग्रहों में आठ प्रकार की गतियाँ देख
पड़ती हैं (देखो स्पष्टाधिकार पृष्ठ ८४-९४, ९७-१०५) ।
७३ श्लोक के उत्तरार्ध में बतलाया गया है कि ग्रह कक्षाएँ भी भचक्र में
भूगोलाध्याय ७६७
बंधी हुई पूरब से पच्छिम को जा रही हैं। परन्तु इन सब गतियों का कारण पृथ्वी
की दैनिक गति ही है।
उ
व विषुवत रेखा व
द
(चित्र १३५)
उ = उत्तर ध्रुव द = दक्षिण ध्रुव व वि = विषुवत् रेखा
सकृदुद्गतमब्दार्धं पश्यन्त्यर्कं सुरासुराः ।
पितरः शशिगाः पक्षं स्वदिनं च नराभुवि ॥७४॥
अनुवाद—सुर और असुर एक बार के उदय हुए सूर्य को लगातार आधे
वर्ष तक देखते रहते हैं, चन्द्रलोक के निवासी पितृगण उसको एक पक्ष तक और
पृथ्वी के निवासी मनुष्य उसको अपने एक दिन तक देखते हैं ।
विज्ञान-भाष्य—इस श्लोक के पूर्वार्ध का अर्थ वही है जो ६७वें श्लोक में
बतलाया गया है। उत्तरार्ध के प्रथम पद के अर्थ में ही कुछ विशेषता है जिसे
समझाने की आवश्यकता है। सनातनधर्मी हिन्दुओं का विश्वास है कि चन्द्रगोल के
ऊर्ध्व भाग में पितृगण निवास करते हैं। यह भाग पृथ्वी के सन्मुख नहीं होता ।
पाश्चात्य ज्योतिषी भी कहते हैं कि चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा इस प्रकार करता है
कि इसका अधोभाग ही पृथ्वी के सन्मुख रहता है और ऊर्ध्व भाग सदैव पीछे रहता
७६८ सूर्य-सिद्धान्त
है। इसलिए चन्द्रमा अपने अक्ष पर एक भ्रमण उतने ही दिनों में करता है जितने
दिन में वह पृथ्वी की परिक्रमा करता है। इसका प्रमाण कठिन नहीं है। चन्द्र बिम्ब
को ध्यान से देखने पर ज्ञात होता है कि उसके काले धब्बे बिम्ब के किनारे से सदैव
एक ही स्थिति में देख पड़ते हैं जिससे प्रकट होता है कि चन्द्र बिम्ब का वह भाग
जो पृथ्वी के सन्मुख है सदैव उसी दशा में रहता है अर्थात् चन्द्रमा का अक्ष-भ्रमण-
काल उसके परिक्रमा काल के समान ही होता है। इस पर यह कहा जा सकता है
कि चन्द्रमा में अक्ष-भ्रमण होता ही नहीं। परन्तु यह ठीक नहीं है। यह एक
उदाहरण से स्पष्ट हो जायगा। एक दीपक बीच में रख दीजिये और उसकी ओर
देखिए। मान लीजिए कि दीपक आपके उत्तर की ओर है। अब दीपक को देखते
हुए आप उसके चारों ओर घड़ी की अनुकूल दिशा में घूमिए। जब आप चौथाई
चक्कर कर लेंगे तब दीपक आपके पूरब हो जायगा। आधा चक्कर कर लेने पर
दीपक आपके दक्षिण हो जायगा, तीन चौथाई चक्कर करने पर वह आपके पच्छिम
हो जायगा और पूरा चक्कर करके उसी स्थान पर आ जाने पर जहाँ से चक्कर
लगाना आरम्भ किया था वह दीपक फिर आपके उत्तर हो जायगा। इससे यह
सिद्ध हो जाता है कि इस प्रकार के एक चक्कर में आपका मुख सदैव दीपक की ओर
रहता है और पीठ सदैव उसके पीछे। साथ ही साथ आपका शरीर भी एक बार
घूम जाता है क्योंकि घूमने में भी तो आपका मुख उत्तर, पूरब, दक्षिण और पच्छिम
की ओर होता रहता है।
जब चन्द्रमा का ऊर्ध्व भाग सदा पृथ्वी से विमुख रहता है तब उसका सम्बन्ध
सूर्य से किस प्रकार रहता है ? अमावस्या के दिन सूर्य और पृथ्वी के बीच में चन्द्रमा
रहता है इसलिए इसका ऊर्ध्व भाग सूर्य के ठीक सामने रहता है। ऊर्ध्व भाग में
पितृलोग निवास करते हैं इसलिए अमावस्या के दिन सूर्य पितरों के ठीक सिर पर
रहता है अर्थात् इस दिन उनका मध्याह्न होता है। इसीलिए अमावस्या के मध्याह्न
काल में पितरों के लिए श्राद्ध तर्पण आदि किये जाते हैं। पूर्णमासी के दिन इनकी
मध्यरात्रि होती है। कृष्ण पक्ष का आधा भाग बीतने पर सूर्य पितरों को उदय होता
हुआ देख पड़ता है और शुक्ल पक्ष के आधे भाग तक वह बराबर उनको देख पड़ता
है अर्थात् पितरों का प्रातःकाल कृष्ण पक्ष की अष्टमी को होता है और सायंकाल
शुक्ल पक्ष की अष्टमी को।
ग्रह कक्षा और ग्रह गतियों का सम्बन्ध -
उपरिस्थस्य महती कक्षाऽल्पाधः स्थितस्यच ।
महत्याकक्षया भागा महान्तोऽल्पास्तथल्पया ॥७५॥
भूगोलाध्याय ७६६
कालेनाल्पेन भगणं भुङ्क्तेऽल्प भ्रमणाधितः ।
ग्रहः कालेन महता मण्डले महति भ्रमन ॥७६॥
स्वल्पयातो बहून भुङ्क्ते भगणांश्छीतदीधितिः ।
महत्या कक्षया गच्छंस्ततः स्वल्पं शनैश्चरः ॥७७॥
अनुवाद—(७५) जो ग्रह कक्षा ऊपर है अर्थात् पृथ्वी से दूर है उसका
परिमाण अधिक है और जो ग्रह कक्षा नीचे है अर्थात् पृथ्वी से निकट है उसका
परिमाण कम है । बड़ी कक्षा के अंश बड़े और छोटी कक्षा के अंश छोटे होते हैं ।
(७६) छोटी कक्षा पर चलने वाले ग्रह अल्प काल में अपना भगण अर्थात् चक्कर पूरा
कर लेते हैं और बड़ी कक्षा पर चलने वाले ग्रह अधिक काल में अपना भगण पूरा
करते हैं । (७७) चन्द्र कक्षा बहुत छोटी है इसलिए चन्द्रमा अनेक भगण पूरा करता
है जब कि शनिश्चर बड़ी कक्षा में होने के कारण थोड़े ही भगण पूरा कर पाता है ।
विज्ञान-भाष्य—ग्रहों की कक्षाओं और उनकी गतियों के सम्बन्ध में
मध्यमाधिकार श्लोक २६, २७ तथा उसके विज्ञान भाष्य पृष्ठ १४-१७ में कुछ
बतलाया जा चुका है इसलिए यहाँ अधिक विस्तार की आवश्यकता नहीं है । बड़ी
कक्षा के अंश बड़े और छोटी कक्षा के अंश छोटे कैसे होते हैं इसका प्रमाण पृष्ठ १४
के चित्र १ से सहज ही मिल सकता है । बड़े वृत्त का २४ अंश जितना बड़ा है उतना
ही छोटे वृत्त का ३६ अंश है अर्थात् बड़े वृत्त का एक अंश छोटे वृत्त के एक अंश से
बड़ा है । यह भी स्पष्ट है कि जो ग्रह बड़ी कक्षा में भ्रमण करते हैं उनका भगण
काल बड़ा और जो ग्रह छोटी कक्षा में भ्रमण करते हैं उनका भगण काल छोटा
होता है । परन्तु ग्रह के भगण काल और उसकी दूरी में ऐसा सरल सम्बन्ध नहीं
जैसा कि भारतीय ज्योतिषी समझते थे और जैसा कि इसी अध्याय में आगे बतलाया
गया है । यह सम्बन्ध केपलर के तीसरे नियम के अनुसार है जो ग्रह गतियों और
उनकी दूरियों के सूक्ष्म विचार से निश्चित किया गया है (देखो पृष्ठ ८४-६१) ।
दिनपति, मासपति आदि जानने की रीति
मन्दादधः क्रमेण स्युश्चतुर्या दिवसाधिपः ।
वर्षाधिपतयस्तद्वत्तृतीयाश्चे प्रकीर्तिता ॥७८॥
ऊर्ध्वं क्रमेण शशिनो मासानमधिपाः स्मृताः ।
होरेशा सूर्यतनयादधोधः क्रमशःस्तथा ॥७६॥
अनुवाद - (७८) शनि से नीचे का चौथा ग्रह क्रमानुसार दिनपति और
तीसरा ग्रह वर्षपति होता है । (७६) चन्द्रमा से ऊपर के ग्रह क्रमशः मासपति तथा
शनि से नीचे ग्रह क्रमशः होरापति होते हैं ।
७७० सूर्य-सिद्धान्त
विज्ञान-भाष्य — इन दोनों श्लोकों की पूरी व्याख्या मध्यमाधिकार के पृष्ठ
४०-४५ में की गयी है इसलिये यहाँ अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है ।
नक्षत्र कक्षा, आकाश कक्षा तथा ग्रह की गतियों का सम्बन्ध—
भवेद्भकक्षा तिग्मांशोर्भ्रमणं षष्टि ताडितम् ।
सर्वोपरिष्टाद्भ्रमति योजनैस्तैर्भमण्डलम् ॥८०॥
कल्पोक्त चन्द्रभगणा गुणिताः शशिकक्षया ।
आकाशकक्षा सा ज्ञेया कर व्याप्तिस्तथा रखेः ॥८१॥
सैव यत्कल्पभगणैर्भक्ता तद्भ्रमणं भवेत् ।
कुवासरैर्विभाज्याह्नः सर्वेषां प्राग्गतिः स्मृता ॥८२॥
भुक्तियोजनजा संख्या सेन्दोर्भ्रमण संगुणा ।
स्वकक्षाप्तातु सा तस्य तिथ्याप्ता गति लिप्तिकाः ॥८३॥
अनुवाद — (८०) सूर्य-कक्षा के योजनों को ६० से गुणा करने पर नक्षत्र-
कक्षा के योजनों का मान आ जाता है। सब ग्रहों से ऊपर नक्षत्र मण्डल इतने ही
योजना में घूमता है । (८१) शशिकक्षा के योजनों को एक कल्प के चन्द्र भगणों की
संख्या से गुणा करने पर आकाश कक्षा का मान ज्ञात होता है । सूर्य की किरणें वहीं
तक जाती हैं । (८२) आकाश कक्षा के मान को जिस ग्रह के कल्प-भगणों की संख्या
से भाग दिया जायगा उसी ग्रह की कक्षा का मान योजनों में ज्ञात होगा । आकाश-
कक्षा को कल्प के सावन दिनों के भाग देने पर सब गृहों की दैनिकगति योजनों में
आ जाती है । (८३) इस योजनात्मक ग्रह गति को चन्द्र-कक्षा से गुणा करके जिस
ग्रह की कक्षा से भाग देकर लब्धि को १५ से भाग दें उस ग्रह की दैनिक गति
कलाओं में आ जायगी ।
विज्ञान-भाष्य — इन श्लोकों में जो कुछ बतलाया गया है उसकी चर्चा कई
जगह की गयी है (देखो पृ० १५-१७; ४५१-५३) । संक्षेप में इसका सार यह है :—
(१) नक्षत्र कक्षा = रवि कक्षा × ६०
(२) आकाश कक्षा = कल्प के चन्द्र भगण × चंद्र कक्षा
(३) $\frac{आकाशकक्षा}{कल्प में किसी ग्रह की भगण संख्या} =$ उस ग्रह की कक्षा
(४) $\frac{आकाश कक्षा}{कल्प के सावन दिन} =$ प्रत्येक ग्रह की दैनिक योजनात्मक गति
(५) $\frac{ग्रह की योजनात्मक गति\timesचंद्र कक्षा}{ग्रह कक्षा\times १५} =$ ग्रह की दैनिक कलात्मक गति