सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
६४२ सूर्य-सिद्धान्त
है जिसमें बहुत से छोटे-छोटे तारे चमक रहे हैं। क्षितिज के पास ही मूल नक्षत्र के
तारे भी पास ही पास देख पड़ते हैं। कुछ पूरब की ओर परन्तु क्षितिज के पास ही
पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के तारे देख पड़ते हैं। मूल और पूर्वाषाढ़ के तारे धनुराशि में हैं जो
पूरा उदय नहीं हुआ है। पूर्वाषाढ़ के ऊपर चित्र में मङ्गल ग्रह के दो स्थान दिखलाये
गये हैं परन्तु अब वह यहाँ नहीं देख पड़ेगा। अनुराधा के ऊपर विशाखा नक्षत्र के
दो तारे दहने बायें फैले हुए देख पड़ते हैं। ये बहुत चमकीले नहीं हैं परन्तु बड़े
महत्व के हैं।
दक्षिण—इस दिशा में क्षितिज के पास ही सेन्टोरी पुंज के दो तीन तारे
प्रथम श्रेणी के हैं। ये इतने दक्खिन हैं कि हम काशी, प्रयाग निवासियों को एक
घण्टे से अधिक नहीं दिखाई पड़ते। लखनऊ वालों को इससे भी कम समय तक देख
पड़ते हैं। अलीगढ़, बरेली वालों को कठिनाई से देख पड़ेंगे और इससे भी उत्तर
रहने वालों को नहीं देख पड़ेंगे। कुछ पच्छिम की ओर क्षितिज के पास ही दूसरी
श्रेणी के चार तारे पास ही पास देख पड़ते हैं। यह भी एक घण्टे से अधिक नहीं
देख पड़ते।
खस्वस्तिक और दक्षिण क्षितिज के मध्य से कुछ और ऊपर प्रथम श्रेणी का
चित्रा तारा है जो अपनी स्थिति के कारण बड़े महत्व का है। यह प्रायः क्रान्तिवृत्त
पर है। आज से कोई सवा सोलह सौ वर्ष पहले शरद सम्पात इसी तारे के पास
होता था अर्थात् जब सूर्य यहाँ पहुँचता था तब वह दक्षिण गोल में जाता था।
आजकल शरद सम्पात इस तारे से २२ अंश ५० कला के लगभग पच्छिम हो गया
है और उस जगह है जहाँ १२ वें नक्षत्र के पास श अक्षर लिखा हुआ है। महाराष्ट्र
प्रान्त में इसी तारे के सम्बन्ध में बड़ा वाद-विवाद चल रहा है। जो लोग कहते हैं
कि अश्विनी नक्षत्र अथवा मेष राशि का आरम्भ उस बिन्दु से माना जाना चाहिए
जिससे चित्रा तारा ठीक १८० अंश दूर है वे लोग चैत्र पक्ष के कहलाते हैं। इस
पक्ष के समर्थक आचार्य वेंकटेश बापू जी केतकर तथा अन्यान्य सज्जन हैं। इनके
विरुद्ध एक दूसरा पक्ष है जिसके समर्थक लोकमान्य तिलक भी थे। इनका मत है कि
अश्विनी का आरम्भ स्थान वह बिन्दु है जिससे चित्रा तारा १८४, अंश के लगभग
दूर है। यह विन्दु रेवती नक्षत्र में है (देखो भाद्रपद मास का चित्र) । इसीलिए इस
पक्ष को रैवत पक्ष कहते हैं।
चित्रा से पच्छिम कुछ नीचे की ओर हस्त नक्षत्र के ५ तारे हाथ की अंगुलियों
की तरह फैले हुए देख पड़ते हैं। हस्त के ऊपर कन्या राशि के कई मन्द-मन्द तारे
देख पड़ते हैं। नीचे की ओर के दो-तीन तारे जो प्रायः सीधी रेखा में हैं क्रान्तिवृत्त
के पास ही प्रायः उसी के समानान्तर देख पड़ते हैं। इस रेखा के पच्छिम सिरे पर
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६४३
जो तारा है उसी के पास आजकल शरद सम्पात बिन्दु है, इसलिये जब सूर्य यहां आता
है तब वह दक्षिण गोल में जाता है । इसी से चित्रा तारा २३ अंश के लगभग
दूर है।
दक्षिण पच्छिम—इस दिशा के आकाश में कोई महत्व के तारे नहीं हैं ।
बहुत मन्द-मन्द तारों की एक वक्र रेखा चित्रा और हस्त नक्षत्रों के नीचे से होती
हुई पच्छिम दिशा तक फैली हुई है जिसके पच्छिमी सिरे पर एक तारा कुछ
चमकीला है ।
पच्छिम—क्षितिज के पास प्रश्वा नामक तारा देख पड़ता है । इससे उत्तर
की ओर कई मन्द-मन्द तारे एक वक्र रेखा में देख पड़ते हैं जिसके उत्तरी छोर पर
दो प्रथम श्रेणी के तारे हैं । यही पुनर्वसु नक्षत्र के दो तारे हैं । प्रश्वा से पुनर्वसु तक
मन्द-मन्द तारों की जो वक्र रेखा बन जाती है वह मिथुन राशि है । प्रश्वा के ऊपर
बहुत मन्द-मन्द तारों का एक वक्र है जिसे कर्क राशि कहते हैं। यह ठीक पच्छिम
की ओर देख पड़ता है । इससे ऊपर कुछ ही पच्छिम की ओर हटकर खस्वस्तिक और
क्षितिज के बीचोबीच सिंह राशि के तारे अपनी अपूर्व छटा दिखा रहे हैं। सिंह की
गर्दन नीचे की ओर लटकी हुई है जिसमें ६, ७ तारे सहज ही देखे जा सकते हैं
जिनका आकार हँसिया की तरह जान पड़ता है। दक्खिन वाला अथवा बायीं ओर
वाला तारा कुछ कुछ लाल है और प्रथम श्रेणी का है। इसी को मघा का योग तारा
या केवल मघा तारा कहते हैं। यह प्रायः क्रान्तिवृत्त पर है इसलिए बड़े महत्व का
है । इससे दाहिने उत्तर की ओर एक और तारा है जो चमक में मघा से कुछ कम है
परन्तु इतना चमकीला अवश्य है कि पूर्णमासी की रात में भी देखा जा सकता है !
मघा के ऊपर दो तारे दाहिने बायें चमकते हुए देख पड़ते हैं । ये पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र
के तारे हैं और सिंहराशि की कमर में हैं। सिंह राशि की पूंछ में पूर्वाफाल्गुनी के कुछ
और ऊपर उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का अकेला तारा है । इस प्रकार यह प्रकट है कि
पच्छिम दिशा में दो राशियों के तारे अपनी चमक से सहज ही लोगों को आकर्षित
कर सकते हैं; केवल कर्कराशि के तारों को मिथुन और सिंहराशियों के बीच कुछ
दक्खिन की ओर ध्यान से देखना पड़ता है ।
उत्तर पच्छिम — इस दिशा में क्षितिज के पास प्रजापति मण्डल के केवल
प्रजापति नाम का तारा देख पड़ता है । ब्रह्महृदय तारा कुछ पहले अस्त हो गया है ।
इसके सिवा क्षितिज के पास कोई चमकीला तारा अथवा तारासमूह नहीं है । बहुत
ऊपर पहले बतलाये हुए सप्तर्षिमण्डल के तारे देख पड़ते हैं । सप्तर्षिमण्डल के दो ध्रुव-
सूचक तारों क्रतु और पुलहकी रेखा में दक्खिन की ओर एक तारा है। इससे और
दक्खिन परन्तु पूर्वाफाल्गुनी के उत्तर दोनों के बीच में बहुत मन्द-मन्द तारे सर्पाकार
६४४ सूर्य-सिद्धान्त
देख पड़ते हैं और पुराणों में प्रसिद्ध नहुष राजा की याद दिलाते हैं जो अगस्त ऋषि
के शाप से सर्प बन गया था ।
इस प्रकार ज्येष्ठमास के आकाश चित्र का वर्णन पूरा हुआ ।
भाद्रपद मास का आकाश चित्र
सिर के ऊपर--इस समय तीन प्रसिद्ध नक्षत्रमण्डल खस्वस्तिक के आस-
पास देख पड़ते हैं । श्रवणमण्डल के तीन तारे प्रायः यामोत्तरवृत्त पर खस्वस्तिक से
कुछ दखिन हटे हुए देख पड़ते हैं । इसी के पास धनिष्ठा नक्षत्र के चार तारे बहुत
पास-पास परन्तु मन्द ज्योति के हैं । यह नक्षत्र ऐतिहासिक दृष्टि से बड़े महत्व का
है । वेदांग-ज्योतिष-काल में जब सूर्य यहाँ पहुँचता था तभी उत्तरायण का आरम्भ
होता था ।
खस्वस्तिक के पास ही एक मन्द तारा है जो हंस की पूंछ का अन्तिम तारा
है । इससे उत्तर पूर्व दिशा में एक ही रेखा में दो और तारे हैं जो इससे अधिक
चमकीले हैं परन्तु उत्तर वाला इनमें सबसे अधिक चमकीला है । बीच वाले तारे के
अगल-बगल पहली रेखा से समकोण बनाते हुए प्रायः एक ही रेखा में दो-तीन तारे
और देख पड़ते हैं जो हंस के पंख की तरह जान पड़ते हैं। यह हंस आकाशगंगा में
पंख फैलाये तैरता हुआ जान पड़ता है । हंस के पच्छिम अभिजित नक्षत्र है जिसका
सबसे चमकीला तारा भी अभिजित नाम से प्रसिद्ध है । यह आकाशगङ्गा से बाहर
पच्छिम की ओर है । चमक में इस तारे का स्थान तीसरा है ।
आकाशगङ्गा—यह चित्र में नहीं दिखलाई गई है परन्तु इस समय इसका
दृश्य बहुत ही मनोरम है । इस समय यह उत्तर-पूर्व क्षितिज से दक्षिण-पच्छिम क्षितिज
तक फैली हुई है। उत्तर-पूर्व दिशा में इस समय परशु या पारसीक मण्डल उदय हो
रहा है। वहीं से आकाशगङ्गा का भी आरम्भ देख पड़ता है जो राह में काश्यप
मण्डल को नहलाती हुई सिफियस के बगल से होती हुई हंस को अच्छी तरह शराबोर
कर देती है । हंस के उत्तर वाले तारे से ही इसकी दो शाखायें हो जाती हैं जो प्रायः
समानान्तर दिशा में आगे बढ़ती हुई दक्षिणपच्छिम क्षितिज के पास फिर मिलती
हुई जान पड़ती हैं । पूर्ववाली शाखा श्रवण नक्षत्र को परिप्लावित करती हुई धनु-
राशि के मूल और पूर्वाषाढ़ नक्षत्रों को लीन करती हुई क्षितिज में गुप्त हो जाती है ।
पच्छिमवाली शाखा में चमकीले तारे बहुत कम हैं । दक्षिण-पच्छिम क्षितिज के पास
वृश्चिक के डंक के तारों को डुबाती हुई यह भी गुप्त हो जाती है । ज्येष्ठा नक्षत्र इस
शाखा के पच्छिमी तट पर देख पड़ता है ।
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६४५
उत्तर—लघु सप्तर्षि के तारे ध्रुव से पच्छिम की ओर फैले हुए हैं। लघु
सप्तर्षि के कुछ और पच्छिम अजगर लटका हुआ देख पड़ता है जिसके मुख के चार
तारे अभिजित के पास तक फैले हुए देख पड़ते हैं। अजगर की पूंछ के पास सप्तर्षि
मण्डल के ध्रुव-सूचक तारे उत्तर और उत्तर-पच्छिम दिशाओं के बीच क्षितिज के
पास ही देख पड़ते हैं। इस सप्तर्षि मण्डल के अन्य तारे उत्तर-पच्छिम दिशा में देख
पड़ते हैं।
ध्रुवतारा के पूरब कुछ ऊपर की ओर सिफियस के ४ मंद तारे हैं जिसके
और पूरब काश्यप मण्डल के तारे अंग्रेजी के डब्लू (W) अक्षर का आधार बनाते
हुए देख पड़ते हैं। काश्यप मण्डल से नीचे उत्तर-पूर्व दिशा में परशु या पारसीक
मण्डल के तारे क्षितिज के पास ही हैं।
पूर्व—पूर्वं और उत्तर-पूर्व दिशाओं के बीच क्षितिज के पास ही अश्विनी
नक्षत्र के तीन तारे उदय होते हुए देख पड़ते हैं। इसके ऊपर अंतरमदा (Andro-
meda) का वक्र देख पड़ता है जिसका आरम्भ पारसीक मण्डल के पास से होता है।
इस वक्र पर पूर्वाभाद्रपद और उत्तरभाद्रपद नक्षत्रों के उत्तरवाले तारे हैं। इन दो
नक्षत्रों के दो-दो तारे मिलकर एक वर्गाकार बनाते हैं जिसे भाद्रपदावर्ग अथवा
(square of Pegasus) कहते हैं। वर्ग के नीचे वाले दो तारे उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में
हैं और ऊपर वाले तारे पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में हैं। उत्तराभाद्रपद के तारों की रेखा की
सीध में दक्खिन की ओर बढ़ने पर प्रायः उतनी ही दूरी पर जितनी दूरी पर ये दो
तारे आपस में हैं वसंत-संपात विन्दु है जहाँ क्रान्तिवृत्त और विषुवद्वृत्त एक दूसरे को
काटते हुए जान पड़ते हैं। जब सूर्य यहाँ देख पड़ता है तभी वसंत ऋतु का आरम्भ
होता है और सूर्य उत्तर गोल में आता है। इसी दिन दिन रात समान होते हैं और
इसी समय से दिन बड़ा और रात छोटी होने लगती है।
पूर्व-दक्षिण - इस दिशा में चमकीले तारे बहुत कम हैं। ज्येष्ठ के महीने में
इस दिशा में जितने तारे थे वे सब इस महीने में दक्षिण-पच्छिम दिशा में हो
गये हैं। क्षितिज के पास एक प्रथम-श्रेणी का तारा (Fomalhaut) अवश्य देख
पड़ता है जिसे हिन्दी में कुम्भज कहना उचित प्रतीत होता है यद्यपि कुम्भज का पर्याय
अगस्त्य तारा इससे बहुत भिन्न है। इसका नाम कुम्भज मैंने दो कारणों से रखा
है। एक कारण तो यह है कि यह कुम्भ राशि के पास है, दूसरा कारण यह है कि
यह ७,८ बजे संध्या के समय प्रायः आश्विन के महीने में दिखाई देने लगता है जब
वर्षा ऋतु का अन्त होता है। जबकि अगस्त्य नामक तारे का उदय वर्षा ऋतु के ठीक
मध्य में होता है और प्रातःकाल केवल थोड़ी देर तक देख पड़ता है। कुम्भज से कुछ
६४६ सूर्य-सिद्धान्त
और दक्षिण की ओर तीन तारे समकोण त्रिभुज के तीन कोण विन्दु बनाते हुए देख
पड़ते हैं। इनका नाम सारस रखा गया है क्योंकि अंग्रेजी में इन्हें Crane कहते हैं।
कुम्भज के ऊपर कुछ पूरब की ओर हटे हुए कुम्भराशि के मन्द मन्द तारे
हैं। सारस के ऊपर और श्रवण नक्षत्र के नीचे दोनों के बीच में मकरराशि के मन्द
तारे हैं।
दक्षिण—इस दिशा में इस समय क्षितिज के पास कोई चमकीले तारे नहीं
हैं। श्रवण नक्षत्र बहुत ऊपर खस्वस्तिक के पास देख पड़ता है।
दक्षिण-पच्छिम—जैसे ज्येष्ठ के महीने में दक्षिण-पूर्व दिशा वृश्चिक और
धनु राशियों के तारों से शोभायमान होती है इसी तरह इस महीने में दक्षिण-पच्छिम
दिशा इन्हीं दो राशियों के तारों से जगमगा रही है। यहाँ विशेषता यह है कि इस
समय धनुराशि के सभी तारे, तथा पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़ नक्षत्रों के भी तारे
दिखाई पड़ रहे हैं। बिच्छू के और पच्छिम क्षितिज के पास विशाखा नक्षत्र के तारे
भी दिखाई देते हैं।
पच्छिम—इस दिशा में इस समय कोई तारे विशेष महत्व के नहीं हैं।
विशाखा के तारे कुछ दक्खिन हट कर हैं। स्वाती का तारा कुछ उत्तर की ओर हटा
हुआ है परन्तु यह कहा जा सकता है कि प्रायः इसी दिशा में स्वाती का तारा
है। स्वाती मण्डल के ऊपर मुकुट और मुकुट के ऊपर हरिकुलेश मण्डल के मन्द मन्द
तारे हैं जिनकी चर्चा ज्येष्ठ मास के आकाश चित्र के पूरब दिशा के वर्णन में अच्छी
तरह की जा चुकी है।
मार्गशीर्ष मास का आकाश चित्र
इस मास में आकाश बहुत स्वच्छ रहता है। वैशाख, जेठ महीनों की धूल और
सावन भादों के बादल कहीं देख नहीं पड़ते और न माघ, फागुन के कुहरा से ही
दृष्टि को बाधा पहुँचती है। इसलिए इस महीने के आकाश-चित्र से ज्ञान और मनो-
रंजन दोनों होते हैं। इस महीने के आकाश में पूरब दिशा में बहुत से नये तारे और
तारा समूह देख पड़ते हैं जिनकी चर्चा प्राचीन साहित्य में भी अनेक स्थलों पर की
गयी है।
उत्तर—क्षितिज के पास लघु सप्तर्षि के तारे लटके हुए देख पड़ते हैं। इस
समय इनमें ध्रुव तारा सबसे ऊपर है। लघु सप्तर्षि के ऊपर सिफियस के तीन मन्द
तारे पच्छिम की ओर फैले हुए देख पड़ते हैं। क्षितिज से जितने ऊपर ध्रुव तारा है,
ध्रुवतारा से उतने ही ऊपर काश्यप मण्डल अंग्रेजी के एम् (M) अक्षर के आकार का
देख पड़ता है। इसके चार बड़े तारे यामोत्तर वृत्त को लांघकर पच्छिम की ओर
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६४७
चले गये हैं, केवल एक तारा यामोत्तरवृत्त से कुछ ही पूरब है । काश्यप मण्डल के
ऊपर अन्तरमदा का वक्र है जिसका केवल एक तारा अब यामोत्तर-वृत्त से पूरब है
और सब पच्छिम की ओर चले गये हैं ।
सिर के ऊपर—अश्विनी नक्षत्र बिलकुल सिर पर देख पड़ता है।
उत्तर पूरब—इस दिशा में कुछ पूरब की ओर और हटकर पुनर्वसु के दो
तारे उदय हो चुके हैं । इनके ऊपर ठीक उत्तर-पूर्व दिशा में प्रजापति मण्डल चमक
रहा है जिससे पाँच मुख्य तारे पंचभुज क्षेत्र बनाते हुए जान पड़ते हैं । इस मण्डल के
उत्तर वाले दो तारे बहुत तेजवान हैं और नीचे ऊपर देख पड़ते हैं । नीचे वाले तारे
प्रजापति और ऊपर वाले को ब्रह्महृदय कहते हैं। चमक में इसका स्थान चौथा है ।
आकाश में सबसे चमकीला तारा लुब्धक है जो इस समय पूर्व दिशा से कुछ दखिन
है और क्षितिज के पास ही देख पड़ता है । दूसरा तारा अगस्त्य है जो अभी क्षितिज
के ऊपर नहीं आया है । तीसरा तारा अभिजित है जो उत्तर-पच्छिम क्षितिज के पास
देख पड़ता है और चौथा तारा ब्रह्महृदय है । ब्रह्महृदय के सम्मुख पंचभुज क्षेत्र के
दखिन कोने पर अग्नि नामक तारा है ।
प्रजापति मण्डल के ऊपर पारसीक मण्डल या परशुमण्डल है जिसके दक्षिण
सिरे पर कृत्तिका नक्षत्र के ६ तारे पास ही पास देख पड़ते हैं । पारसीक मण्डल के
ऊपर प्रायः सिर पर अश्विनी नक्षत्र के तीन तारे हैं जिनमें दो बड़े हैं।
पूर्व —इस दिशा में प्रश्वा नामक प्रथम श्रेणी का तारा उदय हो चुका है
परन्तु क्षितिज के बिल्कुल पास है । इससे कुछ दक्षिण हटकर क्षितिज के पास ही
लुब्धक अपनी दिव्य ज्योति से चमक रहा है । लुब्धक और प्रश्वा के ऊपर प्रसिद्ध
आग्रहायण मण्डल (Orion) है जो अपनी दिव्य ज्योति, आकार और प्रसिद्धि के
कारण अत्यन्त प्राचीन काल से महत्वपूर्ण समझा जाता है। लोकमान्य तिलक ने इसी
के सूक्ष्म विचार से अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ओरायन (Orion) में सिद्ध किया है कि वेद के
जिस मंत्र में इसकी चर्चा की गयी है वह आज से कम से कम ६००० वर्ष पहले
प्रकाशित हुआ होगा । इसको कालपुरुष भी कहते हैं । इसकी चर्चा यूनानी और
पारसी साहित्य में बहुत आलंकारिक भाषा में की गयी है। इस मण्डल के बीच में
तीन चमकीले तारे प्रायः एक ही रेखा में पास ही पास देख पड़ते हैं जिन्हें इल्वक
कहते हैं। इनमें सबसे ऊपर वाला तारा प्रायः विषुवद्वृत्त पर है इसलिए क्षितिज के
जिस विन्दु पर यह तारा उदय होता है वही ठीक पूर्व दिशा है और जहाँ अस्त
होता है वही पच्छिम दिशा है । आग्रहायण के चारों कोनों पर चार तारे अपनी
अपूर्व छटा दिखलाते हैं । इनमें उत्तरवाला नीचे का तारा कुछ कुछ लाल रंग का
६४८ सूर्य-सिद्धान्त
देख पड़ता है। इसे ही आर्द्रा नक्षत्र का योग तारा कहते हैं। इसके ऊपरवाला
तारा मृगशिरा नक्षत्र का योग तारा कहलाता है। दक्खिन की ओर का ऊपरवाला
तारा भी प्रथम श्रेणी का है। गाँववाले इस मण्डल को हन्नाहन्नी कहते हैं और
जाड़े की रात में इसकी स्थिति से समय का पता लगाते हैं। आग्रहायण मण्डल के
दक्खिन कई तारे मंद ज्योति के हैं जिनसे शशक का आकार बना हुआ जान पड़ता
है। इसीलिए इनको शशक (Leporis) कह सकते हैं।
आग्रहायण के ऊपर कुछ उत्तर हटकर रोहिणी नक्षत्र है जिसका नीचे वाला
तारा प्रथम श्रेणी का कुछ कुछ लाल रंग का है। इसी रंग के कारण इसका नाम
रोहिणी पड़ा। रोहिणी नक्षत्र के ५ तारों से जो आकार बनता है वह अङ्गरेजी के
(V) अक्षर के सदृश होता है। रोहिणी नक्षत्र के उत्तर प्रजापति मंडल और ऊपर
कुछ उत्तर की ओर कृत्तिका पुंज है जिसे गाँव वाले कचपचिया कहते हैं। इससे भी
रात को समय जानने का काम लिया जाता है। कृत्तिका के ऊपर प्रायः शिर पर
अश्विनी नक्षत्र है।
जिन तारापुंजों की चर्चा इस समय की गयी है और जो इस समय पूर्व
दिशा में देख पड़ते हैं जाड़े की ऋतु में रात भर दिखाई देते हैं इसलिए इनको
शीतकाल के नक्षत्र (Winter constellations) कहते हैं।
पूर्व-दक्षिण-इस दिशा में कोई चमकीले तारे नहीं देख पड़ते। शशक कुछ
पूरब है जिसकी चर्चा पहले हो चुकी है।
दक्षिण-इस दिशा में क्षितिज के पास तीन तारों का पुंज है जिसे अङ्गरेजी
में फीनिक्स कहते हैं। बहुत ऊपर तिमिमंडल देख पड़ता है जिसका मुंह ह्वेल मछली
के आकार का नीचे की ओर लटका हुआ और फैला हुआ जान पड़ता है। इसके
तारे सभी धीमी ज्योति के हैं।
दक्षिण-पच्छिम-इस दिशा में इस समय सारस और कुम्भज या दूसरा
अगस्त देख पड़ते हैं। दूसरे की चर्चा पहले की जा चुकी है।
पच्छिम-दक्षिण और पच्छिम दिशाओं के बीच क्षितिज के पास मकर राशि
के मन्द मन्द तारे फैले हुए हैं। इनके ऊपर कुम्भ राशि के तारे भी देख पड़ते हैं।
पच्छिम-इस दिशा में क्षितिज के पास ही श्रवण नक्षत्र के तारे देख पड़ते
हैं। श्रवण के ऊपर कुछ उत्तर हटकर धनिष्ठा के तारे हैं। श्रवण के बहुत ऊपर पूर्वा
भाद्रपद और उत्तरा भाद्रपद के तारे हैं जिनका वर्गाकार भी बहुत ही साफ-साफ देख
पड़ता है। वर्गाकार क्षेत्र के नीचेवाली भुज के दो तारे पूर्वाभाद्रपद और ऊपर वाले
भुज के दो तारे उत्तरा भाद्रपद के तारे कहलाते हैं।
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६४६
उत्तर-पच्छिम — इस दिशा में अभिजित नक्षत्र क्षितिज के पास ही देख
पड़ता है । अभिजित के ऊपर हंसमंडल के तारे हैं ।
इससे और उत्तर क्षितिज के पास अजगर के मुख के कुछ तारे देख
पड़ते हैं ।
आकाश-गंगा — इस समय आकाशगंगा पूर्व क्षितिज के पास से उत्तर-
पच्छिम क्षितिज तक फैली है। पूर्व क्षितिज में यह प्रश्वा को उत्तर तट पर और
लुब्धक को दक्खिन तट पर छोड़ती हुई आग्रहायण के उत्तर, अग्नि और ब्रह्महृदय के
बीच से होती हुई पारसीक मंडल और काश्यप मंडल के मध्य हंसमंडल के पास दो
शाखाओं में बँटती हुई और श्रवण को दक्खिन तट पर छोड़ती हुई पच्छिम और
उत्तर-पच्छिम क्षितिज में विलीन हो जाती है ।
फाल्गुन मास का आकाशचित्र
सिर पर—मिथुनराशि इस समय ठीक सिर पर है । पुनर्वसु के दोनों तारे
प्रायः खस्वस्तिक पर और प्रश्वा कुछ दक्खिन है ।
उत्तर – लघुसप्तर्षि ध्रुवतारा से पूर्व की ओर फैला हुआ है । ध्रुवतारा से
पच्छिम सिफियस के तीन तारे हैं जिनमें से एक क्षितिज से बिल्कुल मिला हुआ है ।
लघुसप्तर्षि के पूर्व अजगर की लपेट है जिसका मुंह अभी क्षितिज से नीचे है ।
उत्तर-पूर्व— इस दिशा में सप्तर्षि मंडल के सातों तारे दिखाई पड़ रहे हैं ।
सप्तर्षि के ऊपर सर्पाकार मंद-मंद तारे हैं ।
उत्तर-पूर्व और पूर्व दिशाओं के बीच क्षितिज के पास ही कुछ कुछ लाल
रंग का स्वाती तारा है ।
पूरब—इस दिशा में क्षितिज के पास कन्या राशि के तारे दिखाई पड़ रहे
हैं । अभी चित्रा उदय नहीं हुआ है। कन्या राशि के ऊपर सिंहराशि के सब तारे
दिखाई पड़ रहे हैं। नीचे वाला अकेला तारा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का है। इसके
ऊपर दो तारे पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र के हैं। पूर्वाफाल्गुनी के ऊपर मघा नक्षत्र के तारे
हंसिया के आकार के देख पड़ते हैं। इस हंसिया के नीचे के दो तारे बहुत चमकीले
हैं जिनमें दक्खिनवाला तारा मघा का योगतारा है। यह भी कुछ कुछ लाल रंग का
देख पड़ता है।
हँसिया के ऊपर बहुत मंद-मंद तारे हैं। उत्तरवाले तारों को पुष्यनक्षत्र
और दक्खिन वालोंतारों को आश्लेषा नक्षत्र कहते हैं। यहीं कर्कराशि भी है।
पुनर्वसु और मघा के बीच में जितने मंद-मंद तारे हैं सभी कर्कराशि में कहे जा
सकते हैं।
१४
६५० सूर्य-सिद्धान्त
पूर्व और पूर्व-दक्षिण दिशाओं के बीच ४, ५ तारे क्षितिज के पास ही देख
पड़ते हैं। ये हस्तनक्षत्र के तारे हैं।
पूर्व क्षितिज से लेकर सिर के ऊपर तक वरन् कुछ और पच्छिम तक जितने
नक्षत्र क्रान्तिवृत्त के पास देख पड़ते हैं उनको वर्षा के नक्षत्र कहते हैं। इसलिए नहीं
कि ये वर्षा ऋतु में देख पड़ते हैं वरन् इसलिए कि जब सूर्य इन नक्षत्रों में रहता है
तभी यहाँ वर्षा होती है। वर्षा के नक्षत्रों के नाम क्रमानुसार यह है :—आर्द्रा,
पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त और चित्रा।
पूर्व-दक्षिण — इस दिशा में कोई प्रसिद्ध तारा इस समय नहीं देख पड़ता।
दक्षिण — इस दिशा में क्षितिज के पास कई तेजवान तारों का समूह है जो
जहाज के आकार का देख पड़ता है इसीलिए इसको नौका पुंज (Argo Navis)
कहते हैं। इस समूह का प्रधान तारा अगस्त याम्योत्तरवृत्त से पच्छिम हो गया है
और क्षितिज के पास देख पड़ता है। चमक में इसका स्थान दूसरा है। पहला स्थान
लुब्धक को प्राप्त है जो इससे ठीक ऊपर देख पड़ता है। नौका पुंज के ऊपर लुब्धक
मंडल है।
पच्छिम दक्षिण—इस दिशा में क्षितिज के पास कोई चित्ताकर्षक नक्षत्र
नहीं है। कुछ ऊपर शशक और इससे भी ऊपर प्रसिद्ध आग्रहायण मंडल है।
आग्रहायण मंडल के ऊपर प्रायः सिर पर मिथुन राशि के तारे हैं।
पच्छिम—इस दिशा में कुछ उत्तर को हटकर अश्विनी नक्षत्र क्षितिज के
पास ही है। इससे ऊपर २, ३ बहुत मंद तारे हैं जिसे भरणी नक्षत्र कहते हैं।
भरणी से कुछ और उत्तर तीन तारे त्रिकोण बनाते हुए देख पड़ते हैं। भरणी के
ऊपर कुछ पच्छिम की ओर कृत्तिका नक्षत्र है। कृत्तिका के कुछ ऊपर और पच्छिम
रोहिणी नक्षत्र है। कृत्तिका से उत्तर पारसीक मंडल है इन दोनों नक्षत्रों के ऊपर
प्रजापति मंडल है जिसका अग्नि तारा कृत्तिका के ऊपर और ब्रह्महृदय पारसीक
के ऊपर है। ब्रह्महृदय के ऊपर प्रजापति का तारा है। पारसीक और प्रजापति
मंडलों के उत्तर वाले तारे ब्रह्महृदय, प्रजापति आदि उत्तर पच्छिम दिशा में
देख पड़ते हैं।
त्रिकोण के उत्तर अंतरमदा के कुछ तारे क्षितिज के पास देख पड़ते हैं।
उत्तर पच्छिम—इस दिशा में पारसीक और प्रजापति मंडल के उत्तर वाले
तारे हैं जिनकी चर्चा अभी हो चुकी है। इस दिशा से कुछ उत्तर और हटकर काश्यप
मंडल के तारे क्षितिज के पास हैं।
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६५१
आकाश-गंगा—इस समय उत्तर पश्चिम के कोने से दखिन क्षितिज तक
फैली हुई है। उत्तर-पश्चिम क्षितिज से आरम्भ कर के इसमें या इसके आसपास
कश्यप, पारसीक, प्रजापति, आग्रहायण, लुब्धकं मंडल और नौका पुंज के तारे हैं ।
इन चार मासों के आकाश चित्रों और इनके वर्णनों से आकाश के सभी
सभी प्रधान तारों और तारासमूहों की जानकारी की जा सकती है । इनकी सहायता
से रात्रि में जब आकाश निर्मल हो दिशा, देश और काल का ज्ञान सहज ही हो
सकता है ।
इस प्रकार नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार नामक आठवें अध्याय का विज्ञान भाष्य
समाप्त हुआ ।
नवम अध्याय
उदयास्ताधिकार
(संक्षिप्त वर्णन)
[ १ श्लोक-सूर्य के निकट आ जाने के कारण ग्रहों और नक्षत्रों के अदृश्य
होने का विचार । २-३ श्लोक-ग्रहों के उदय और अस्त होने की दिशा । ४-५
श्लोक-ग्रहों का कालांश जानने की रीति । ६-६ श्लोक-- ग्रहों के परम कालांश ।
१०-११ श्लोक-यह जानने की रीति कि किसी इष्टकाल में उदय या अस्त होने को
कितने दिन शेष हैं या बीत गये हैं । १२-१५ श्लोक-किस तारे का क्या परम कालांश
है । १६-१७ श्लोक-तारे के दृश्य या लोप होने के दिन को जानने की रीति ।
१८ श्लोक-उन तारों के नाम जो कभी अदृश्य नहीं होते ]
इस अध्याय में यह बतलाया गया है कि ग्रहों और तारों का उदय और अस्त
कब होता है और कैसे जाना जाता है । यहाँ उदय और अस्त के अर्थ साधारण
उदय और अस्त के अर्थों से भिन्न हैं। साधारणतः जब सूर्य, चन्द्रमा इत्यादि पूर्व
क्षितिज के ऊपर आ जाते हैं तब इनका उदय समझा जाता है और जब ये पच्छिम
क्षितिज के नीचे चले जाते हैं तब इनका अस्त समझा जाता है। यह पृथ्वी की दैनिक
गति के कारण होता है जिसे पुराने आचार्य प्रवह-गति कहते थे । इसके सिवा जब
ग्रह चन्द्रमा या तारे सूर्य के बहुत पास हो जाते हैं जिससे वे सूर्योदय के लगभग पूर्व
क्षितिज के ऊपर आते हैं और सूर्यास्त के लगभग पच्छिम क्षितिज के नीचे चले जाते
हैं तब भी वे अस्त कहे जाते हैं। ऐसी दशा में वे सूर्य के तीव्र प्रकाश के कारण देखे
नहीं जा सकते । जिस समय वे सूर्य के निकट आने के कारण अदृश्य हो जाते हैं
उस समय से वे अस्त समझे जाते हैं और जिस समय वे सूर्य से इतनी दूर हो जाते हैं
कि सूर्योदय के कुछ पहले या सूर्यास्त के कुछ पीछे देख पड़ने लगते हैं उस समय उनका
उदय समझा जाता है। इस अधिकार में इसी प्रकार के उदय अस्त की बातें बतलायी
गयी हैं । पाश्चात्य ज्योतिषी इसको heliacal rising and setting कहते हैं ।
अध्याय का प्रयोजन-
अथोदयास्तमययोः परिज्ञानं प्रकीर्त्यते ।
दिवाकरकराक्रान्त मूर्तीनामल्पतेजसाम् ॥१॥
उदयास्ताधिकार ६५३
अनुवाद-(१) सूर्य के प्रकाश से आक्रान्त होने के कारण अथवा दब जाने
के कारण अल्प प्रकाशवाले पिंडों का जो उदय अस्त होता है उसके जानने की रीति
बतलायी जाती है।
विज्ञान भाष्य-इसकी व्याख्या ऊपर की जा चुकी है।
उदय और अस्त की दिशा -
सूर्यादभ्यधिकाः पश्चादस्तं जीवकुजार्कजाः ।
ऊनाः प्रागुदयं यान्ति शुक्रज्ञौ वक्रिणौ तथा ॥२॥
ऊनाः विवस्वतः प्राच्यामस्तं चन्द्रज्ञभार्गवाः ।
व्रजन्त्यभ्यधिकाः पश्चादुदयं शीघ्रयायिनः ॥३॥
अनुवाद-(२) जब गुरु, मंगल और शनि के भोगांश सूर्य के भोगांश से कुछ
अधिक होते हैं तब इनका पच्छिम में अस्त होता है और जब इनके भोगांश से कुछ
कम होते हैं तब इनका पूर्व में उदय होता है। इसी प्रकार वक्री शुक्र और बुध का
भी उदय अस्त होता है, अर्थात् जब वक्री शुक्र और बुध के भोगांश सूर्य के भोगांश से
अधिक होते हैं तब इनका पच्छिम में अस्त और कम होते हैं तब पूर्व में उदय होता
है। (३) चन्द्रमा, (मार्गी) बुध और शुक्र के भोगांश सूर्य के भोगांश से कम होते
हैं तब ये पूर्व में अस्त होते हैं और जब ये तीव्र गति के कारण सूर्य से कुछ आगे बढ़
जाते हैं तब पच्छिम में उदय होते हैं।
विज्ञान भाष्य-इन दो श्लोकों में संक्षेप में यह बतलाया गया है कि सूर्य,
चन्द्रमा, मंगल, बुध इत्यादि के भोगांशों से अथवा स्पष्ट स्थानों से मोटी रीति से कैसे
जाना जा सकता है कि कौन ग्रह किस दिशा में उदय या अस्त होगा । इस काम के
लिए ग्रहों के दो भाग कर दिये गये हैं। एक भाग में गुरु, मंगल और शनि हैं जिनकी
गति सूर्य की गति से मंद है और दूसरे भाग में बुध, शुक्र और चन्द्रमा हैं जिनकी
गति सूर्य की गति से तीव्र है। इनमें भी बुध और शुक्र की गतियों में विशेषता होने
के कारण कुछ भिन्नता है।
गुरु, मङ्गल और शनि की अपेक्षा सूर्य अधिक चलता है इसलिए सूर्य ही
गुरु, मङ्गल और शनि की ओर बढ़ता हुआ देख पड़ता है। जब सूर्य इनके इतना
निकट पहुँच जाता है कि ये अदृश्य हो जाते हैं तब सूर्य के भोगांश से इनका भोगांश
अधिक रहता है क्योंकि भोगांश की नाप पच्छिम से पूरब की ओर होती है। अदृश्य
होने के पहले ये तीनों ग्रह सूर्यास्त के पीछे पच्छिम क्षितिज के पास ही देख पड़ते हैं
और वहीं गोधूली प्रकाश की तीव्रता के कारण अदृश्य हो जाते हैं इसलिए कहा
जाता है कि ये तीन ग्रह पच्छिम में अस्त होते हैं । कुछ दिन में जब सूर्य इनसे आगे
६५४ सूर्य-सिद्धान्त
बढ़ जाता है और इनका भोगांश सूर्य के भोगांश से कम हो जाता है तब ये फिर पूर्व
में सूर्योदय के कुछ पहले दिखलाई पड़ने लगते हैं । इसलिए कहा जाता है कि पूर्व में
इनका उदय होता है ।
जब वक्री बुध और शुक्र के भोगांश सूर्य के भोगांश से अधिक होते हैं तब ये
सूर्यास्त के उपरान्त पश्चिम क्षितिज में देख पड़ते हैं और वहीं अदृश्य हो जाते हैं ।
कुछ दिन में ये ग्रह अपनी वक्र गति के कारण सूर्य की दूसरी ओर बहुत शीघ्र चले
जाते हैं और इनके भोगांश सूर्य के भोगांश से कम हो जाते हैं । ऐसी दशा में ये
सूर्योदय के पहले पूर्व क्षितिज में फिर दीखने लगते हैं । इसलिए कहा जाता है कि
वक्री बुध और शुक्र भी पश्चिम में अस्त और पूर्व में उदय होते हैं ।
परन्तु चन्द्रमा तथा मार्गी बुध और शुक्र की गति सूर्य की गति से अधिक
होती है इसलिए जब ये सूर्य की ओर बढ़ते हुए उसके पास इतना पहुँच जाते हैं कि
अदृश्य हो जाते हैं तब इनके भोगांश सूर्य के भोगांश से कम होते हैं और ये पूर्व
क्षितिज में ही सूर्योदय के पहले अदृश्य होते हैं । इसलिए कहा जाता है कि ये पूर्व में
अस्त होते हैं । जब ये सूर्य के आगे बढ़ जाते हैं तब इनके भोगांश सूर्य के भोगांश से
अधिक हो जाते हैं और सूर्यास्त के उपरान्त पश्चिम क्षितिज में दीखने लगते हैं ।
इसलिए कहा जाता है कि चन्द्रमा और मार्गी बुध और शुक्र पश्चिम में उदय
होते हैं ।
कालांश जानने की रीति—
सूर्यास्तकालिकौ पश्चात्प्राच्यामुदयकालिकौ ।
दिवाकरग्रहौ कुर्यात् दृक्कर्मार्थं ग्रहस्य तु ॥४॥
तयोर्लग्नान्तरप्राणाः कालांशाः षष्टिभाजिताः ।
प्रतीच्यां षड्भयुतयोस्तद्वल्लग्नान्तरासवः ॥५॥
अनुवाद—(४) यदि पश्चिम में किसी ग्रह के उदय या अस्त होने का समय
जानना हो तो अनुमान से जाने हुए दिन के सूर्यास्त काल के सूर्य और ग्रह को स्पष्ट
करे और पूरब में किसी ग्रह के उदय या अस्त होने का समय जानना हो तो उस
दिन के सूर्योदय-काल के सूर्य और ग्रह को स्पष्ट करे तथा ग्रह का दृक्कर्म संस्कार
करे । दृक्कर्म संस्कृत ग्रह और सूर्य के उदय लग्नों के असुओं का अन्तर निकाले
और इसको ६० से भाग दे तो ग्रह का पूर्व में उदय या अस्त सम्बन्धी कालांश ज्ञात
होता है । यदि ग्रह का पश्चिम में उदय या अस्त सम्बन्धी कालांश जानना हो तो
सूर्य और ग्रह के भोगांश में ६ राशि जोड़ने से जो आवे उनके लग्नों के असुओं के
अन्तर को ६० से भाग देकर कालांश जानना चाहिए ।
1
उदयास्ताधिकार ६५५
विज्ञान भाष्य—सूर्य के उदय होने से जितने समय पहले कोई ग्रह पूर्व
क्षितिज में आता है अर्थात् उदय होता है उस समय को उस ग्रह का कालान्तर
कहते हैं। लग्न काल की गणना सूक्ष्मता के लिए असुओं में की जाती है और
विषुवद्-वृत्त की एक कला का उदय एक असु में होता है। इसलिए ६० काल का
उदय ६० असुओं में होता है परन्तु ६० कला एक अंश के समान है। इसलिए
सूर्य और ग्रह के उदय-कालों के अन्तर को जो प्रायः असुओं में होता है और जिसे
५ वें श्लोक में लग्नान्तर-प्राण या लग्नान्तरासु कहा गया है ६० से भाग देने पर
जो आता है उसको अंशों में समझ लेना चाहिए, इसी को ग्रह का कालांश
कहते हैं।
पृष्ठ ५६१ में बतलाया गया है कि यह जानने के लिए कि ग्रह किस समय
क्षितिज में लग्न होता है इसके स्पष्ट भोगांश में आक्ष और आयन दृक्कर्म संस्कार
करना चाहिए क्योंकि स्पष्टाधिकार के अनुसार ग्रह का जो भोगांश आता है उससे तो
केवल यह मालूम होता है कि ग्रह अपनी कक्षा में कहाँ है। परन्तु ग्रह की कक्षा
क्रान्ति-वृत्त से भिन्न होती है इसलिए जिस समय ग्रह का क्रान्तिवृत्त वाला विन्दु क्षितिज
पर आता है उस समय ग्रह का बिम्ब क्षितिज पर नहीं वरन् अपने शर के अनुसार
कुछ आगे या पीछे उदय होता है (देखो चित्र १०७, १०८) जिसका ज्ञान
दृक्कर्म संस्कार से ही होता है। इसीलिए चौथे श्लोक में पहले दृक्कर्म संस्कार आदि
करने को कहा गया है। दृक्कर्म संस्कार करने पर जब ग्रह के क्षितिज पर का
समय ठीक ठीक ज्ञात हो जाय तभी यह जाना जा सकता है कि सूर्योदय से कितना
पहले वह ग्रह पूर्व क्षितिज में लग्न होता है।
परन्तु जब ग्रह का उदय या अस्त पश्चिम में होता है तब सूर्यास्तकालिक
सूर्य और ग्रह का समय स्पष्ट किया जाता है क्योंकि तब यह जानने की आवश्यकता
पड़ती है कि सूर्यास्त से कितने समय पीछे ग्रह का अस्त होता है। इस काम के लिए
भी ग्रह में दृक्कर्म संस्कार की आवश्यकता पड़ती है जैसा कि उदय लग्न के समय की
जाती है। अब दृक्कर्म संस्कृत ग्रह अथवा भास्कराचार्यजी के शब्दों में दृग्ग्रह और
सूर्य के अस्तलग्नासुओं का अन्तर जानना चाहिए अर्थात् यह देखना चाहिए कि जिस
समय सूर्य अस्त होता है उस समय से कितने असु उपरान्त इष्ट ग्रह का बिम्ब पश्चिम
क्षितिज पर आता है। इन असुओं को ६० से भाग देने पर अस्त समय के कालांश
अथवा अस्तांश का ज्ञान हो जाता है। परन्तु ५वें श्लोक के उत्तरार्ध में बतलाया
गया है कि अस्तकालिक सूर्य और दृग्ग्रह के भोगांशों में ६ राशि या १८० अंश जोड़
कर दोनों के लग्नासुओं का अन्तर निकाले। इसका कारण यह है कि जिस समय
सूर्य अस्त होता रहता है उस समय पूर्व क्षितिज में क्रान्तिवृत्त का वह विन्दु लग्न
६५६ सूर्य-सिद्धान्त
होता है जो सूर्य से १८० अंश आगे रहता है। इसी प्रकार जब दृग्ग्रह अस्त होता
रहता है तब भी पूर्व क्षितिज में वह बिन्दु लग्न रहता है जो दृग्ग्रह से १८० अंश
आगे है। इसलिए यदि यह मालूम हो जाय कि सूर्य और दृग्ग्रह के अस्तकालों में
पूर्व क्षितिज के लग्नों के उदयासुओं में क्या अन्तर होता है तो भी अस्तांश या कालांश
का ज्ञान हो सकता है।
ग्रहों के परम कालांश—
एकादशामरेड्यस्य तिथिसङ्ख्याऽर्कजस्य तु।
कालांशा भूमिपुत्रस्य दश सप्ताधिकास्तथा ॥६॥
पश्चादस्तमयोऽष्टाभिः उदयः प्राङ्महत्तया ।
प्रागस्तमुदयः पश्चादल्पत्वाद्वशभिः भृगोः ॥७॥
एवं बुधो द्वादशभिः चतुर्दशभिरंशकैः ।
वक्री शीघ्रगतिश्चार्कात्करोत्यस्तमयोदयौ ॥८॥
एभ्योऽधिकैः कालभागैर्दृश्या न्यूनैरदर्शनाः ।
भवन्ति लोके खचरा भानुभाग्रस्तमूर्तयः ॥६॥
अनुवाद—(६) गुरु का परमकालांश ११; शनि का १५ और मङ्गल का १७
है। (७) शुक्र का बिम्ब बड़ा देख पड़ने के कारण पच्छिम में अस्त होने का और
पूर्व में उदय होने का परमकालांश ८ है परन्तु बिम्ब छोटा देख पड़ने के कारण
इसके पूर्व में अस्त होने का और पच्छिम में उदय होने का परमकालांश १० है।
(८) इसी प्रकार वक्री और शीघ्र गति वाला बुध जब सूर्य से १२ कालांश पर रहता
है तब पच्छिम में उसका अस्त और पूर्व में उदय होता है। परन्तु इसका पूर्व में अस्त
होने और पच्छिम में उदय होने का कालांश १४ है। (६) सूर्य के प्रकाश से ग्रस्त
होने के कारण अथवा दब जाने के कारण यदि किसी ग्रह का किसी समय का कालांश
उसके परमकालांश से अधिक हुआ तो उस समय वह ग्रह देख पड़ता है और कम
हुआ तो नहीं देख पड़ता।
विज्ञान भाष्य— इन श्लोकों में ग्रहों के कालांशों की वह सीमा बतलायी
गयी है जिससे अधिक होने पर ग्रह देख पड़ते हैं और कम होने पर नहीं देख पड़ते ।
इसलिए इस सीमा को परमकालांश कहा जा सकता है। प्रत्येक ग्रह का परम-
कालांश भिन्न है। इसका कारण यह है कि जिस ग्रह का बिम्ब बड़ा होता
है वह सूर्य के पास होने पर भी सुगमतापूर्वक देखा जा सकता है और
जिसका बिम्ब छोटा होता है वह कुछ कठिनाई से देखा जा सकता है। दूर
के ग्रहों में वृहस्पति का बिम्ब सबसे बड़ा है इसलिए इसका परम कालांश ११
उदयास्ताधिकार ६५७
माना गया है अर्थात् यदि सूर्योदय से ११ अंश या ११० पल ४४ मिनट पहले
बृहस्पति उदय हो अथवा सूर्यास्त से इतना ही समय पीछे अस्त हो तो यह प्रातः-
काल या सायङ्काल के संधि-प्रकाश में भी देखा जा सकता है। इसलिए जब
बृहस्पति का कालांश घटते घटते ११ हो जाता है तब यह पच्छिम क्षितिज में
अदृश्य हो जाता है। इसके बाद जब इसका कालांश घटते घटते शून्य हो जाता है
तब यह सूर्य के साथ उदय या अस्त होता है। इस समय से इसका कालांश बढ़ने
लगता है और जब तक ११ अंश नहीं होता तब तक यह अदृश्य रहता है क्योंकि
सूर्य के तीव्र प्रकाश में यह देखा नहीं जा सकता। इसी को साधारण बोलचाल में
गुरु-आदित्य अथवा 'गुरु-बाधिक' भी कहते हैं। यह अवधि साधारणतः १ महीने की
होती है। इस अवधि में हिन्दू लोग विवाह, मुंडन इत्यादि कोई शुभ काम नहीं
करते।
शनि का बिम्ब गुरु के बिम्ब से छोटा और मङ्गल के बिम्ब से बड़ा होता
है इसलिए शनि का परमकालांश १५ और मङ्गल का १७ माना गया है। परन्तु
शुभ कामों में इनके उदय अस्त का विचार नहीं किया जाता है।
शुक्र के परमकालांश ८ और १० माने गये हैं। इसका कारण यह है कि जब
शुक्र वक्री होकर पच्छिम में अस्त होता है और पूर्व में उदय होता है तब पृथ्वी से
इसका अन्तर बहुत कम रहता है क्योंकि यह सूर्य और पृथ्वी के बीच में रहता है
(देखो स्पष्टाधिकार पृष्ठ १०१-१०३)। निकट रहने से इसका बिम्ब बहुत बड़ा
देख पड़ता है इसलिए यह सन्धि प्रकाश में बहुत देर तक देखा जा सकता है।
इसकी सीमा ८ कालांश ३२ मिनट या ८० पल की मानी गयी है अर्थात् जब
सूर्यास्त के उपरान्त ३२ मिनट से भी कम समय में शुक्र अस्त होता है तब नहीं
देख पड़ता और कहा जाता है कि शुक्र पच्छिम में अस्त हो गया। इसके बाद जब
शुक्र सूर्योदय से ३२ मिनट पहले उदय होने लगता है तब यह फिर देख पड़ने लगता
है और कहा जाता है कि पूर्व में शुक्र उदय हो गया। यह अवधि एक सप्ताह से
अधिक नहीं होती क्योंकि जब शुक्र वक्री रहता है तब शुक्र और सूर्य का अन्तर दोनों
की गतियों के योग के समान प्रतिदिन घटता या बढ़ता है इसलिए शुक्र बहुत जल्द
सूर्य के पीछे चला जाता है।
परन्तु जब शुक्र पूर्व में अस्त और पच्छिम में उदय होता है तब इसका परम
कालांश १० होता है क्योंकि इस समय यह पृथ्वी से बहुत दूर सूर्य की दूसरी ओर
रहता है (देखो, चित्र २१, २२)। दूर रहने से शुक्र का बिम्ब छोटा देख पड़ता है
इसलिए यह संध्या प्रकाश में उतनी देर तक नहीं देख पड़ता जितनी देर तक वक्री
६५८ सूर्य-सिद्धान्त
होने पर देख पड़ता है। जब यह पूर्व में अस्त होता है तब मार्गी रहता है अर्थात्
इसकी गति उसी ओर को होती है जिस ओर को सूर्य चलता हुआ देख पड़ता है
इसलिए इन दोनों का अन्तर दोनों की गतियों के अन्तर के समान प्रति दिन घटता
या बढ़ता है। इसलिए शुक्र के अस्त होने की यह अवधि दो महीने के लगभग की
होती है।
जब तक शुक्र अस्त रहता है तब तक भी हिन्दुओं में विवाह, मुण्डन इत्यादि
कोई शुभ काम नहीं किये जाते।
शुक्र की तरह बुध भी जब वक्री रहता है तब पृथ्वी के निकट रहने के कारण
बड़ा देख पड़ता है और इसका परम कालांश १२ होता है। परन्तु जब यह पृथ्वी से
बहुत दूर सूर्य की दूसरी ओर रहता है तब छोटा देख पड़ता है और इसका
परम कालांश १४ होता है।
बुध के अस्त होने का विचार विवाह, मुण्डन इत्यादि में नहीं किया
जाता।
यहाँ तक तो यह बतलाया गया कि सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार ग्रहों के उदय
और अस्त होने की गणना किस प्रकार की जाती है और इनके परम कालांश क्या
हैं। अब यहाँ दो प्रश्न उपस्थित होते हैं, एक तो यह कि क्या कालांश जानने की
यह रीति शुद्ध है, दूसरे यह कि क्या ये परमकालांश ठीक हैं। इसका उत्तर देना
इसलिए सुगम है कि इसकी जांच इन ग्रहों के प्रत्यक्ष दर्शन से की जा सकती है।
क्योंकि इनके उदय अस्त की परिभाषा ही ऐसी है कि जब तक ये सूर्य के निकट
होने के कारण बिना किसी यन्त्र की सहायता के देखे न जा सकें तभी तक इनको
अस्त समझना चाहिये अन्यथा उदय। इस कसौटी पर कसने से तो यही सिद्ध होता है
कि सूर्य-सिद्धान्त अथवा अन्य किसी भारतीय १ ज्योतिष सिद्धान्त के आधार पर
निकाले हुए उदय या अस्त कालों में तो कभी-कभी दस-दस पन्द्रह-पन्द्रह दिन का
अन्तर पड़ जाता है। यह प्रकट है कि कालांश की शुद्ध-शुद्ध गणना तभी संभव है जब
ग्रहों का स्पष्ट भोगांश और शर बिलकुल शुद्ध हों। परन्तु भारतीय सिद्धान्तों के
आधार पर जाने गये भोगांश और शर ठीक नहीं होते जैसा कि पिछले अध्यायों के
अनेक स्थानों में बतलाया जा चुका है। उदाहरण के लिये (पूर्णिमान्त) चैत्र कृष्ण
११ भौमवार सम्बत् १६८३ वि० तदनुसार २६ मार्च सन् १९२७ की मध्य रात्रि
१. आचार्य केतकर का ज्योतिर्गणित भारतीय ज्योतिष सिद्धान्त के आधार
पर नहीं बनाया गया है वरन् पाश्चात्य सिद्धान्तों के आधार पर बनाया गया है
जिनमें अर्वाचीन आविष्कारों की भी सहायता ली गयी है।
उदयास्ताधिकार ६५६
| मंगल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | |||||||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रा | अं | क | रा | अं | क | रा | अं | क | रा | अं | क | रा | अं | क | |
| विश्व पंचांग¹ | १ | २५ | ३८ | १० | २१ | ० | १० | २६ | ५० | ० | १८ | ३६ | ७ | ६ | २६ |
| भारतभूषण पंचांग² | १ | २५ | ४० | १० | १६ | ३० | १० | २४ | ३६ | ० | १६ | ३८ | ७ | १४ | ११ |
| गणेशदत्त शर्मा का पंचांग³ | १ | २५ | ४० | १० | १६ | ३० | १० | २४ | ३६ | ० | १६ | ३८ | ७ | १४ | ११ |
| नवल किशोर प्रेस का पंचांग⁴ | १ | २६ | ५२ | १० | २१ | ४७ | १० | २४ | ४४ | ० | १५ | ४८ | ७ | १४ १८ | |
| विक्रम विजय पंचांग⁵ | १ | २५ | ४० | १० | १७ | ५८ | १० | २२ | ४२ | ० | १६ | ३७ | ७ | १४ | २० |
| ज्योतिर्गणित के अनुसार⁶ | १ | २६ | ५३ | १० | २२ | २० | १० | २३ | ५४ | ० | १५ | ३५ | ७ | १४ | ४६ |
| (नोट—निर्देशों के लिए पृष्ठ ६६० देखें) |
६६० सूर्य-सिद्धान्त
काल के ५ तारा-ग्रहों के निरयन भोग ६ पंचांगों के अनुसार दिये जाते हैं जिनसे
यह भी पता लगेगा कि ग्रहों की गणना में हमारे यहाँ भिन्न-भिन्न मतों के अनुसार
कितना भेद पड़ता है । (देखें पृष्ठ ६५६)
प्रत्येक ग्रह के भोगांशों की तुलना करने से यह प्रकट हो जाता है कि शुद्ध
सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार निकाले हुए भोगांश ज्योतिर्गणित अथवा दृग्गणित से
निकाले हुए भोगांशों से बहुत भिन्न है। गुरु और शनि के भोगांश तो पाँच-पाँच छः
छः अंश भिन्न हैं इसके प्रतिकूल मकरंद सारणी के अनुसार जाने हुए भोगांश
दृग्गणित से बहुत कुछ मिलते-जुलते हैं। इसलिए ग्रहों के उदय अस्त का विचार
सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार कदापि ठीक नहीं हो सकता । इसके सिवा यह तो दिखलाया
ही जा चुका है कि दृक्कर्म संस्कार की रीति भी स्थूल है। इसलिए यह सिद्ध है कि
उदय अस्त का विचार करने के लिए हमको दृग्गणित सिद्ध मूलाङ्कों से ही काम
लेना चाहिये और इसके लिए या तो ज्योतिर्गणित से काम लिया जाय जो पाश्चात्य
ज्योतिष सिद्धान्त के आधार पर बनाया गया है अथवा नया स्वतन्त्र सिद्धान्त तैयार
किया जाय, क्योंकि नाविक पंचांगों के आधार पर ग्रहों का उदय अस्त जानकर अपने
धार्मिक कृत्यों, मुण्डन, विवाह इत्यादि का निश्चय करना उचित नहीं जान पड़ता ।
१—शुद्ध सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार बनाया हुआ काशी के हिन्दू विश्वविद्यालय
से प्रकाशित तथा पं० मदनमोहन मालवीय, ज्योतिषाचार्य पं० रामयत्न ओझा, पं०
रामव्यास पाण्डेय, पं० पूर्णचन्द्र त्रिपाठी इत्यादि द्वारा सम्पादित ।
२— मकरंद सारणी के अनुसार बनाया हुआ काशी के ज्योतिषाचार्य पं०
रामनिहोर द्विवेदी तथा श्री रामानन्द मिश्र द्वारा विरचित तथा पं० रामयत्न ओझा
द्वारा अनुमोदित ?
३- यह भी मकरंद सारणी के अनुसार बनाया गया और पं० बलदेव
मिश्रात्मज पं० गणेशदत्त शर्मा द्वारा सम्पादित ।
४-पं० रामप्रसाद सिद्धान्ती के पुत्र श्री पं० श्यामविहारी द्वारा बनाया
गया ।
५- सूर्य-सिद्धान्त संस्कृतं मकरंदीयम् काश्यक्षवृत्तीयं दृग्गणितैक्य विषैरलं-
कृतम् जब्बलपुरीय पं० श्री लक्ष्मीप्रसाद विद्याभूषण विरचितम् ।
६ आचार्य वेंकटेश बाबू केतकर के ज्योतिर्गणित के अनुसार लेखक द्वारा
गणना किया हुआ परन्तु अयनांश २२ अंश ४१ कला मानकर, इसलिये दृग्गणित के
अनुसार शुद्ध है। केवल अश्विनी का आदि बिन्दु सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार स्थिर
किया गया है।
उदयास्ताधिकार ६६१
| स्थान | पंचांग का विवरण | शुक्रास्तकाल | शुक्रोदयकाल | गुरु का अस्तकाल | गुरु का उदयकाल |
|---|---|---|---|---|---|
| काशी | बालकृष्ण शास्त्री का | ज्येष्ठ शुक्ल १०, ८५<br>२६ मई १६२८ ई० | अधिक श्रावण शु० १३, ८५; ३० जुलाई २८ | चैत्र शुक्ल ३, ८५ विक्रमी | वैशाख शुक्ल ८, ८५ वि० २७ |
| " | विश्वपंचांग काशी विश्वविद्यालय का | ज्येष्ठ शुक्ल १०, २६ मई | अ० श्रा० शु० १३; ३० जुलाई | २४ मार्च १६२८ ई०<br>चैत शुक्ल २, २३ मार्च | अप्रैल १६२८ ई०<br>वैशाख शु० ८, २७ अप्रैल |
| लखनऊ | रामप्रसाद सिद्धान्ती का नवल किशोर प्रेस का | ज्येष्ठ शुक्ल २, २१ मई | अ० श्रा० कृ० ३, ४ अगस्त | चैत शुक्ल ४, २५ मार्च | वैशाख शु० ७, २६ अप्रैल |
| औंध | शास्त्रशुद्ध ऐक्य वर्द्धक पंचांग | आ० कृ० ३,<br>६ जून<br>* | अ० श्रा० शु० ११, २८ जुलाई | चैत शुक्ल ३, २४ मार्च | वैशाख शु० १, २१ अप्रैल |
| बागलकोट | केतकी पंचांग | " " | " " | ? ? | वैशाख शु० १, २१ अप्रैल |
| पूना | चित्रशाला पंचांग | आ० कृ० ३, ६ जून | अ० श्रा० शु० ११, २८ जुलाई | चैत शुक्ल ३, २४ मार्च | वैशाख शु० १, २१ अप्रैल |
*यहाँ कृष्ण पक्ष पूर्णिमान्त गणना के अनुसार लिखा गया है, अमान्त गणना से यह ज्येष्ठ कृष्ण है जो महाराष्ट्र प्रान्त में प्रचलित है।