सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६२१
पड़ता है। परन्तु वराह मिहिर१ तथा ग्रहलाघवकार२ ने लिखा है कि शनि अथवा
मङ्गलक रोहिणी-शकट-भेद होने से बड़ा अनिष्ट होता है।
युतिकाल का साधन—
ग्रहवद् द्यु निशेमानां कुर्याद् दृक्कर्म पूर्ववत् ।
ग्रहमेलनविज्ञेयं ग्रहभुक्त्या दिनादिकम् ॥१४॥
एष्यो हीने ग्रहे योगो ध्रुवकादधिके गतः ।
विपर्ययाद्वक्रगतैः ग्रहैः ज्ञेयः समागमः ॥१५॥
अनुवाद—(१४) पहले जिस तरह युतिकालिक ग्रहों का दिनमान और
रात्रिमान जानने को कहा गया है उसी तरह नक्षत्रों का भी दिनमान और रात्रिमान
साधन करके उनका आक्षदृक्कर्म संस्कार करना चाहिये । इसके पश्चात् जैसे ग्रहों का
परस्पर युतिकाल और युतिस्थान जाना जाता है उसी तरह केवल ग्रह की गति से
ग्रह और नक्षत्र का युतिकाल और युतिस्थान जान लेना चाहिये । (१५) यदि ग्रह
का आयन-आक्ष-दृक्कर्म-संस्कृत भोग नक्षत्र के आक्षदृक्कर्म-संस्कृत ध्रुवक से कम हो
तो समझना चाहिये कि नक्षत्र और ग्रह का योग होने वाला है और यदि अधिक हो
तो समझना चाहिये कि योग हो चुका है । परन्तु यदि ग्रह वक्री हो तो इसका उलटा
समझना चाहिये ।
विज्ञान भाष्य—इन दोनों श्लोकों में जो नियम बतलाये गये हैं उनकी
व्याख्या ग्रहयुत्यधिकार में आ चुकी है । यहां ग्रह का तो आयन और आक्ष दोनों
दृकर्म करने को कहा गया है परन्तु नक्षत्र का केवल आक्षदृक्कर्म करने को कहा गया
है । इसका कारण स्पष्ट है । क्योंकि ग्रह का जो भोगांश स्पष्टाधिकार के अनुसार
आता है वह कदम्बाभिमुख होता है इसलिए उसमें आयन-दृक्कर्म का संस्कार करने
से वह ध्रुवाभिमुख होता है । अब यदि इसमें आक्षदृक्कर्मका संस्कार किया
जाय तो इसका भोगांश समप्रोतवृत्त में आता है । परन्तु नक्षत्रों के जो ध्रुवक
१. रोहिणी शकटमर्कनंदनी यदि भिनत्ति रुधिरोथवा शशी ।
किं वदामि यदि नष्टसागरे जगदशेषमुपयाति संक्षये ॥३५॥
—बृहत्संहिता ३४ अध्याय
२. कभशकटमसौ भिनत्त्यसृक् शनिरुडुयो यदि चेज्जनक्षयः ॥७॥
भौमकर्योः शकटभिदा युगान्तरे स्यात् सेदानीं न हि भवतीदृशि
स्वपाते ॥८॥
—ग्रहलाघव, नक्षत्रच्छायाधिकार
६२२ सूर्य-सिद्धान्त
दिये गये हैं वे ध्रुवाभिमुख हैं इसलिए इनमें केवल आक्षदृक्कर्म का संस्कार
करने की आवश्यकता पड़ती है । इस प्रकार ग्रह और नक्षत्र के भोगों में किसी
इष्टकाल में जो अंतर होता है उसको ग्रह की दैनिक गति से भाग देने पर यह जाना
जाता है कि कितने समय में ग्रह का नक्षत्र से योग होगा या होने वाला है । और
सब बातें ग्रहयुत्यधिकार में बतलाये गये नियम के अनुसार ही समझनी चाहिए ।
यहाँ सुगमता यह है कि नक्षत्र स्थिर होते हैं इसलिए केवल एक ग्रह के सम्बन्ध की
गणना करनी पड़ती है ।
नक्षत्रों के योगतारों के पहचानने की रीति—
फल्गुन्योः भाद्रपदयोः तथैवाऽऽषाढयोर्द्वयोः ।
विशाखाश्विनिसौम्यानां योगतारा तथोत्तरा ॥१६॥
पश्चिमोत्तरतारा या द्वितीया पश्चिमे स्थिता ।
हस्तस्य योगताराऽसौ श्रविष्ठायाश्च पश्चिमा ॥१७॥
ज्येष्ठाश्रवणमैत्राणां बार्हस्पत्यस्य मध्यमा ।
भरण्याग्नेयपित्र्याणां रेवत्याश्चापि दक्षिणा ॥१८॥
रोहिण्यादित्यमूलानां प्राची सार्पस्य चैव हि ।
यथाप्रधानं शेषाणां स्थूलास्स्युर्ध्रुवतारकाः ॥१९॥
पूर्वस्यां ब्रह्महृदयादंशकैः पञ्चभिः स्थितः ।
प्रजापतिर्वृषान्तेऽसौ सौम्ये अष्टात्रिंशदंशकैः ॥२०॥
अपांवत्सस्तु चित्राया उत्तरेऽशंश्च पञ्चभिः ।
बृहत्किञ्चिदतो भागैरापष्षड्भिस्तथोत्तरे ॥२१॥
इत्यष्टमोध्याय :
अनुवाद—(१६) पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, पूर्वाभाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद,
पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, विशाखा, अश्विनी और मृगशिरा नक्षत्रों में से प्रत्येक नक्षत्र
का उत्तरवाला तारा उस नक्षत्र का योग तारा है । (१६) हस्तनक्षत्र के पश्चिमोत्तर
दिशा में जो दो तारे हैं । उनमें दूसरा पच्छिमवाला तारा इस नक्षत्र का योगतारा है
और धनिष्ठा नक्षत्र के दो उत्तरवाले तारों में भी पच्छिमवाला तारा योग तारा है ।
(१८) ज्येष्ठा, श्रवण, अनुराधा और पुष्य नक्षत्रों के बीचवाले तारे प्रत्येक के योग
तारे हैं । भरणी, कृत्तिका, मघा और रेवती नक्षत्र के दक्षिणवाला तारा प्रत्येक
नक्षत्र का योग तारा है । (१६) रोहिणी, पुनर्वसु, मूल और आश्लेषा नक्षत्र का
पूर्ववाला तारा प्रत्येक का योग तारा है । २८ नक्षत्रों में से अब जितने शेष हैं, उनमें
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६२३
अर्थात् आर्द्रा, चित्रा, स्वाती, अभिजित और शतभिषक् नक्षत्रों में प्रत्येक नक्षत्रों का
सबसे बड़ा तारा उस नक्षत्र का योग तारा है। (२०) ब्रह्महृदय तारे से ५ अंश
पूर्व की ओर प्रजापति नामक तारा वृष के अंत में है। इसका उत्तर विक्षेपांश ३८
है। (२१) चित्रा तारे से ५ अंश उत्तर की ओर अपांवत्स तारा है जिससे ६ अंश
उत्तर कुछ बड़ा आप नामक तारा है।
विज्ञान भाष्य-१६-१८ श्लोकों में यह बतलाया गया है कि प्रत्येक नक्षत्र
में कौन तारा मुख्य माना गया है जिसके ध्रुवक और शर पहले बतलाये गये हैं।
ऐसे मुख्य तारे को योगतारा कहा गया है। आजकल इन योगताराओं के सम्बन्ध
में विद्वानों में कुछ मतभेद है। आगे एक सारणी दी जायगी जिससे पता चलेगा कि
आजकल कौन विद्वान् किस तारे को योगतारा मानता है। नक्षत्र के लिए कभी-कभी
उनके देवताओं के नामों का प्रयोग किया गया है इसलिए सुविधा के लिए यह भी
बतलाया जायगा कि किस नक्षत्र का स्वामी कौन देवता है तथा प्रत्येक नक्षत्र में
कितने तारे हैं। तारों की संख्याओं में प्राचीन आचार्यों में भी मतभेद है जैसा कि
सारणी से पता चलेगा।
ब्रह्महृदय का ध्रुवक १ राशि २२ अंश बतलाया गया है। इससे ५ अंश पूर्व
प्रजापति तारा है। इसलिए प्रजापति का ध्रुवक १ राशि २७ अंश है। श्लोक में
बतलाया गया है कि प्रजापति वृषराशि के अंत में है परन्तु इसका अर्थ यही लेना
चाहिये कि यह वृषराशि के अंत के पास है। चित्रा तारे का दक्षिण शर २ है और
अपांवत्स तारा चित्रा से ५ अंश उत्तर है इसलिए अपांवत्स का उत्तर शर ३ अंश हुआ।
आप तारा अपांवत्स से ६ अंश उत्तर है इसलिए इसका उत्तर शर ६ अंश हुआ।
तारों और नक्षत्रों की पहचान के लिए ४ आकाश-चित्र दिये जायेंगे जिनसे
यह सहज ही जाना जा सकता है कि कौन नक्षत्र किस समय आकाश में कहां देख
पड़ता है।
इन सारणियों में तारों के अङ्गरेजी नाम विलक्षण ढंग से दिये हुए हैं इस-
लिये यह बतला देना आवश्यक है कि ये नाम किस प्रकार रखे गये हैं। अङ्गरेजी में
तारा-पुञ्जों के जो नाम प्रचलित हैं वह अधिकतर लैटिन और यूनानी ( Greek )
भाषा से लिए गये हैं। प्रत्येक तारापुंज के नाम के पहले कोई यूनानी अक्षर जोड़
कर रखा गया है। इन अक्षरों का क्रम अधिकतर इस प्रकार रखा गया है कि उस
पुंज में जो तारा सबसे चमकीला और बड़ा है उसका नाम पहले अक्षर 'अल्फा' से
प्रकट किया गया है। उसके बाद जो तारा उससे छोटा है उसका नाम दूसरे अक्षर
‘बीटा’ से प्रकट किया गया है, इत्यादि। कुछ प्रधान तारों के नाम इस तरह तो
६२४ सूर्य-सिद्धान्त
नक्षत्र के देवता
(मुहूर्त चिंतामणि तथा भारतीय
| क्रम संख्या | नक्षत्रों के नाम | नक्षत्र के स्वामी या देवता | तैत्तिरीय संहिता | नक्षत्र कल्प | वृद्धगार्गीय संहिता | नारद संहिता | बराह मिहिर | खंडखाद्यक |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | अश्विनी | अश्विनी कुमार | २ | २ | २ | ३ | ३ | २ |
| २ | भरणी | यम | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | |
| ३ | कृत्तिका | अग्नि | ७ | ६ | ६ | ६ | ६ | ६ |
| ४ | रोहिणी | ब्रह्मा | १ | ५ | ५ | ५ | ५ | |
| ५ | मृगशिरा | चन्द्रमा | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | |
| ६ | आर्द्रा | रुद्र | १या२ | १ | १ | १ | १ | १ |
| ७ | पुनर्वसु | अदिति | २ | २ | २ | ४ | ५ | २ |
| ८ | पुष्य | बृहस्पति | १ | १ | १ | ३ | ३ | १ |
| ९ | आश्लेषा | सर्प | ६ | ६ | ५ | ६ | ६ | |
| १० | मघा | पितर | ६ | ६ | ५ | ५ | ६ | |
| ११ | पूर्वा फाल्गुनी | भग | २ | २ | २ | २ | ८ | २ |
| १२ | उत्तरा फाल्गुनी | अर्यमा | २ | २ | २ | २ | २ | २ |
| १३ | हस्त | सूर्य | ५ | ५ | ५ | ५ | ५ | |
| १४ | चित्रा | विश्वकर्मा | १ | १ | १ | १ | १ | १ |
| १५ | स्वाती | पवन | १ | १ | १ | १ | १ | १ |
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६२५
और तारों की संख्या
ज्योतिषशास्त्र पृष्ठ ४५८)
| लल्लकृत रत्नकोश | शाकल्य ब्रह्मसिद्धान्त | श्रीपतिकृत रत्नमाला | मुहूर्त्त तत्व | मुहूर्त्त चिन्तामणि | नक्षत्र के तारों के नाम Kaye के Hindu Astronomy के अनुसार |
|---|---|---|---|---|---|
| ३ | २ | ३ | ३ | ३ | β, γ Arietis |
| ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | 35, 39, 41 Arietis |
| ६ | ६ | ६ | ६ | ६ | .η Tauri, etc. |
| ५ | ५ | ५ | ५ | ५ | α, θ γ, δ, ∈ Tauri |
| ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | λ, ϕ₁, ϕ₂ Orionis |
| १ | १ | १ | १ | १ | α Orionis |
| ४ | २ | ४ | ४ | ४ | β, α Geminorum |
| ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | θ, δ, γ Cancri |
| ५ | ५ | ५ | ५ | ५ | ∈, δ, σ, η, ρ Hydrae |
| ५ | ५ | ५ | ५ | ५ | α, η, γ, γ, l, μ, ∈, Leonis |
| २ | २ | २. | २ | २ | δ, θ Leonis |
| २ | २ | २ | २ | २ | β, 93 Leonis |
| ५ | ५ | ५ | ५ | ५ | δ, γ, ∈, α, β Corvi |
| १ | १ | १ | १ | १ | α Virginis |
| १ | १ | १ | १ | १ | . α Bootis |
. ६२६ सूर्य-सिद्धान्त
| क्रम संख्या | नक्षत्रों के नाम | नक्षत्रों के स्वामी या देवता | तैत्तिरीय संहिता | नक्षत्रकल्प | वृद्ध गार्गीय संहिता | नारद संहिता | बराह मिहिर | खंड खाद्यक |
| १६ | विशाखा | इन्द्र, अग्नि | २ | २ | २ | २ | ५ | २ |
| १७ | अनुराधा | मित्र | | ४ | ४ | ४ | ४ | ४ |
| १८ | ज्येष्ठा | इन्द्र | १ | | ३ | ३ | ३ | ३ |
| १९ | मूल | राक्षस | १या२ | | ६ | ११ | ११ | २ |
| २० | पूर्वाषाढ़ | जल | | ४ | ४ | ४ | २ | ४ |
| २१ | उत्तराषाढ़ | विश्वदेव | | ४ | ४ | २ | ८ | ४ |
| | अभिजित | ब्रह्मा | १ | | ३ | | | ३ |
| २२ | श्रवण | विष्णु | १ | ३ | ३ | | ३ | ३ |
| २३ | धनिष्ठा | वसु | ४ | ५ | ४ | | | ५ |
| २४ | शतभिषक | वरुण | १ | १ | १ | १०० | १०० | १ |
| २५ | पूर्वा भाद्रपद | अजपाद | | २ | २ | २ | २ | २ |
| २६ | उत्तरा भाद्रपद | अहिर्बुध्न्य | ४ | २ | २ | २ | ८ | २ |
| २७ | रेवती | पूषा | १ | १ | ४ | ३२ | ३२ | १ |
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६२७
लल्ल कृत रत्नकोश | शाकल्य ब्रह्म सिद्धान्त | श्रीपति कृत रत्नमाला | मुहूर्त तत्व | मुहूर्त चिन्ता मणि | नक्षत्र के तारों के नाम Kaye के Hindu Astronomy के अनुसार
४ | २ | ४ | ४ | ४ | γ, β, α, l Librae
४ | ३ | ४ | ४ | ४ | δ, β, π Scorpii
३ | ३ | ३ | ३ | ३ | α, σ, L Scropii
११ | ६ | ११ | ११ | ११ | λ, μ, x, L θ, ∈ Scorpii
२ | ४ | ४ | ४ | २ | δ, ∈, Sagittarii
२ | ४ | ४ | ३ | २ | 6, ζ Sagittarii
३ | ३ | ३ | ३ | ३ | α, ∈, ζ Lyrae
३ | ३ | ३ | ३ | ३ | α, β, γ, Aquilae
४ | ५ | ४ | ४ | ४ | β, α, γ, δ Delphini
१०० | १०० | १०० | १०० | १०० | λ Aquarii, etc.
२ | २ | २ | २ | २ | α, β Pegasi
२ | २ | २ | २ | २ | γ Pegasi, α Andromedae
३२ | ३२ | ३२ | ३२ | ३२ | γ Pisceium, etc.
६२८
किस नक्षत्र का कौन तारा योगतारा है (भारतीय ज्योतिष शास्त्र पृष्ठ ४५६)
सूर्य-सिद्धान्त
| क्रम संख्या | नक्षत्र का नाम | कोलब्रुक के मत से | बेंटली और केरोपंत के मत से | व्हिटने और बर्जेस के मत से | बापूदेव के मत से | वें. बा. केत-कर के मत से | शंकर बाल-कृष्ण दीक्षित के मत से | चंद्रशेखर सिंह सामंत का सिद्धान्त दर्पणभूमिका पृ० ५६, ५७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | अश्विनी | $\alpha$ Arietis | $\beta$ Arietis | $\beta$ Arietis | $\alpha$ Arietis | $\beta$ Arietis | $\beta$ Arietis | $\alpha$ Arietis |
| २ | भरणी | $\mu$ or 35, Arietis | 35 Arietis | 35 Arietis | 35 Arietis | 41 Arietis | 41 Arietis | 41 Arietis |
| ३ | कृत्तिका | $\eta$ Tauri | $\eta$ Tauri | $\eta$ Tauri | $\eta$ Tauri | $\eta$ Tauri | $\eta$ Tauri | $\eta$ Tauri |
| ४ | रोहिणी | $\alpha$ Tauri अर्थात् Aldebaran | Aldebaran | Aldebaran | Aldebaran | Aldebaran | Aldebaran | Aldebaran |
| ५ | मृगशिरा | $\lambda$ Orionis | 116 Tauri | $\lambda$ orionis | $\lambda$ orionis | $\lambda$ orionis | $\lambda$ orionis | $\lambda$ orionis |
| ६ | आर्द्रा | $\alpha$ Orionis | 133 Tauri | $\alpha$ orionis | $\alpha$ orionis | $\alpha$ orionis | $\gamma$ Gemino-rum | $\alpha$ orionis |
| ७ | पुनर्वसु | Pollux अर्थात् $\beta$ Geminorum | Pollux | Pollux | Pollux | Pollux | Pollux | $\beta$ Gemino-rum |
| ८ | पुष्य | $\delta$ cancri | $\delta$ cancri | $\delta$ cancri | $\delta$ cancri | $\delta$ cancri | $\delta$ cancri | Proesepe |
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६२६
६ आश्लेषा $\alpha$ cancri 49 cancri $\epsilon$ Hydrae $\alpha$ cancri $\alpha$ cancri $\zeta$ Hydrae $\zeta$ Hydrae
१० मघा $\alpha$ Leonis अर्थात् Regulus Regulus Regulus Regulus Regulus Regulus Regulus
११ पूर्वा फाल्गुनी $\delta$ Leonis $\theta$ Leonis $\delta$ Leonis $\delta$ Leonis $\theta$ Leonis $\theta$ Leonis $\delta$ Leonis
१२ उत्तरा फाल्गुनी $\beta$ Leonis अर्थात् Denebola Denebola Denebola Denebola Denebola Denebola $\beta$ Leonis
१३ हस्त $\gamma$ or $\delta$ corvi $\delta$ corvi $\delta$ corvi $\gamma$ or $\delta$ corvi $\delta$ corvi $\delta$ corvi $\delta$ corvi
१४ चित्रा Spica अर्थात् $\alpha$ Virginis spica spica spica spica spica spica
१५ स्वाती Arcturus अर्थात् $\alpha$ Bootes Arcturus Arcturus Arcturus Arcturus Arcturus Arcturus
१६ विशाखा $\alpha$ or K Librae 24 Librae 24 Librae $\alpha$ or K Librae 24 Librae $\alpha$ Librae $\alpha$ Librae
१७ अनुराधा $\delta$ Scorpii $\beta$ Scorpii $\delta$ Scorpii $\delta$ Scorpii $\delta$ Scorpii $\delta$ Scorpii $\delta$ Scorpii
१८ ज्येष्ठा $\alpha$ Scorpii अर्थात् Antares Antares Antares Antares Antares Antates Antares
१९ मूल v or 34 scorpii 34 scorpii $\lambda$ scorpii 34 scorpii 45 ophiuchi $\lambda$ Scorpii $\lambda$ Scorpii
२० पूर्वाषाढ़ $\delta$ Sagittarii $\delta$ Sagittarii $\delta$ Sagittarii $\delta$ Sagittarii $\delta$ Sagittarii $\lambda$ Sagittarii $\delta$ Sagittarii
२१ उत्तराषाढ़ t Sagittarii $\phi$ Sagittarii $\sigma$ Sagittarii t Sagittarii $\sigma$ Sagittarii $\pi$ Sagittarii $\phi$ Sagittarii
६३०
सूर्य-सिद्धान्त
| क्रम संख्या | नक्षत्र का नाम | कोलब्रुक के मत से | बेंटली और केरोपंत के मत से | ह्विटने और बर्जेस के मत से | बापूदेव के मत से | वें. बा. केत-कर के मत से | शंकर बाल-कृष्ण दीक्षित के मत से | चंद्रशेखर सिंह सामंत का सिद्धान्त दर्पणभूमिका पृ० ५६, ५७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अभिजित | $\alpha$ Lyrae Aega | Aega | Aega | Aega | Aega | Aega | Aega | |
| २२ | श्रवण | $\alpha$ Aquilae अर्थात् Altair | Altair | Altair | Altair | Altair | Altair | Altair |
| २३ | धनिष्ठा | $\alpha$ Delphini | $\alpha$ Delphini | $\beta$ Delphini | $\alpha$ Delphini | $\alpha$ Delphini | $\alpha$ Delphini | $\alpha$ Delphini |
| २४ | शतभिषक | $\lambda$ aquarii | $\lambda$ aquarii | $\lambda$ Aquarii | $\lambda$ Aquarii | $\lambda$ Aquarii | $\lambda$ Aquarii | $\lambda$ Aquarii |
| २५ | पूर्वा भाद्रपद | Markab अर्थात् $\alpha$ Pegasi | Markab | Markab | Markab | Markab | Markab | $\beta$ Pegasi |
| २६ | उत्तरा भाद्र-पद | $\alpha$ Androme-dae अर्थात् Alpherat | $\gamma$ Pegasi (Algenib) $\alpha$ Andro-medae | Algenib $\alpha$ Andro-medae | $\alpha$ Andro-medae | $\alpha$ Andro-medae | $\gamma$ Pegasi (Algenib) | $\alpha$ Andro-medae |
| २७ | रेवती | $\zeta$ Piscium | $\zeta$ Piscium | $\zeta$ Piscium | $\zeta$ Piscium | $\zeta$ Piscium | $\zeta$ or $\mu$ Picium | $\eta$ Piscium |
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६३१
यूनानी अक्षर | नाम | उच्चारण | समान उच्चारण के रोमन अक्षर | हमारे आकाश चित्र में प्रयोग किये हुए अंक
क α | alpha | आल्फ़ा | a | १
ख β | Beta | बीटा | b | २
ग γ | Gamma | गैमा | g | ३
घ δ | Delta | डेल्टा | d | ४
च ε | Epsilon | एप्साइलन | e short | ५
छ ζ | Zeta | ज़ीटा | z | ६
ज η | Eta | ईटा | e long | ७
झ θ | Theta | थीटा | th | ८
ट ι | Iota | आयोटा | i | ९
ठ K | Kappa | कैपा | k | १०
ड λ | Lambda | लैम्डा | l | ११
ढ μ | Stet | म्यू | m | १२
त ν | Nu | न्यू | n | १३
थ ξ | xi | क्साई | x | १४
द o | omicron | आमीक्रोन | o short | १५
π | Pi | पाई | p | १६
ρ | Rho | रो | r | १७
६३२ सूर्य-सिद्धान्त
$${|c|c|c|c|c|}
\hline
यूनानी अक्षर & नाम & उच्चारण & \begin{matrix} समान उच्चारण
का रोमन अक्षर \end{matrix} & \begin{matrix} हमारे आकाश
चित्र में प्रयोग
किये हुए अंक \end{matrix}
\hline
\sigma & Sigma & सिग्मा & s & १८
\tau & Tau & टा & t & १९
\upsilon & upsilon & अपसाइलन & u & २०
\phi & Phi & फाई & ph & २१
र\quad\chi & chi & काई & ch & २२
ल\quad\psi & Psi & प्साई & ps & २३
\omega & omega & ओमेगा & olog & २४
\hline
$$
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६३३
१२ राशियों के नाम
१ । २ । ३ । ४
संस्कृत साहित्य । संस्कृत के । अंग्रेजी नाम । लैटिन नाम
में प्रचलित नाम । पर्याय
मेष क्रियः Ram Aries
वृष ताबुरि Bull Taurus
मिथुन जितुमः, जित्तमः Twins Gemini
कर्क कुलीर crab cancer
सिंह लेय Lion Leo
कन्या पाथोन, पाथेय virgin Virgo
तुला जूकः Balance Libra
वृश्चिक कौर्प्यः scorpion scorpio
धनु तौक्षिक Archer sagittarius
मकर आलोकेर (?) capricorn capricornus
कुंभ हृद्रोग Water-bearer Aquarius
मीन इत्थ्य, इथुसी (?) Fishes Pisces
१३
६३४ सूर्यसिद्धान्त
रखे ही गये हैं परन्तु साथ ही साथ उनके साहित्य में प्रचलित नाम भी अब तक
व्यवहार में आते हैं ।
यदि यह मालूम हो कि संस्कृत साहित्य में किसी तारे का क्या नाम प्रचलित
है और अङ्गरेजी साहित्य में क्या नाम है तो तारों के पहचानने में बड़ी सुविधा होती
है। इसलिए पहले यह बतला कर कि यूनानी भाषा के अक्षर और उनके नाम क्या
हैं, एक सारिणी से यह भी बतलाया जायगा कि तारापुंजों के नाम संस्कृत और
अङ्गरेजी तथा लेटिन और यूनानी भाषाओं में क्या है। अक्षरों की जगह हमारे
आकाश चित्र में हिन्दी के अङ्क क्रमानुसार प्रयुक्त किये जायगे जैसा कि अन्तिम स्तम्भ
में बतलाया गया है ।
संस्कृत, लैटिन और अंग्रेजी सभी नामों के एक ही अर्थ हैं परन्तु यूनानी
नामों १ के अक्षरों में भी समानता पायी जाती है जिससे जान पड़ता है कि इनकी
उत्पत्ति एक ही देश में हुई है। वह देश चाहे भारतवर्ष हो या यूनान अथवा कोई
अन्य देश जिससे इन दोनों देशों ने लिया हो । यह बात भाषा-तत्व-विशारदों से ही
स्पष्ट हो सकती है कि इस एकता का क्या कारण है। ज्योतिष के और भी शब्द
ऐसे हैं जिनके संस्कृत, अरबी और यूनानी नामों में समता है । परन्तु इस विषय पर
यहां तुलनात्मक विचार नहीं किया जायगा क्योंकि इसकी सामग्री इस समय दुर्लभ
है । यदि सुविधा हुई तो भूमिका में यह विषय फिर उठाया जायगा ।
इस अध्याय में जिन नक्षत्रों की चर्चा हुई है उनकी पहचान के लिए यह
आवश्यक है कि उनके चित्र दिये जायें । इसलिए और फाल्गुन मासों के आकाशचित्र २
दिये जाते हैं । इन चित्रों में तारों के यूनानी नाम नहीं दिये गये हैं इसलिए योग-
तारों के पहचानने में कुछ कठिनाई पड़ सकती है परन्तु नक्षत्रों अर्थात् तारा-समूहों
और उनकी स्थिति के समझने में कोई कठिनाई नहीं हो सकती । इन चित्रों में केवल
१. खेद है कि यूनानी अक्षरों के टाइप के अभाव से यूनानी नाम नहीं
दिये गये ।
२. संवत् १६७८ विक्रमीय के कातिक मास से संवत् १६७६ के भाद्रपद मास
तक की मर्यादा के लिये जब वह काशी के ज्ञानमण्डल से प्रकाशित होती थी, उसके
सम्पादक बाबू सम्पूर्णानन्दजी की इच्छा से दस मास के आकाशचित्र इसी लेखक द्वारा
बनाये गये थे । उन्हीं से चार चित्र चुनकर दिये हैं। इनमें उस समय के मंगल, गुरु
तथा अन्य प्रधान नक्षत्र समूहों के भी स्थान दिखलाये गये हैं। इनमें से जिनकी चर्चा
प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों में आयी है उनके नाम संस्कृत ग्रन्थों से ही लिये गये हैं परन्तु
जिनकी चर्चा प्राचीन ग्रन्थों में नहीं है उनके नाम वही रखे गये हैं जो आजकल
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६३५
वही तारे नहीं दिये गये हैं जिनकी चर्चा इस अध्याय में आयी है वरन् आकाश के
अङ्गरेजी ग्रन्थों में पाये जाते हैं अथवा इनके हिन्दी के समानार्थ-सूचना शब्द बनाये
गये हैं । जैसे Cassiopea के लिए काश्यप मंडल, Cepheus के लिए सिफियस,
Draco के लिए अजगर, Leporis के लिए शशक इत्यादि । आचार्य वेंकटेश बाबू
केतकर ने अपने ज्योतिर्गणित के पृष्ठ ३२४ में कई प्रधान तारों के नाम प्रसिद्ध
ऋषियों और देवताओं के नाम पर रखे हैं जैसे कण्व, कुवेर, रुद्र, यम, पराशर
इत्यादि । परन्तु ये नाम इस चित्र में नहीं दिये गये हैं क्योंकि अभी ये किसी सभा
द्वारा स्थिर नहीं किये गये हैं इसलिए पाठकों को तभी सुविधा होगी जब वही नाम
दिये जायें जो संसार के साहित्य में बहुत प्रसिद्धि पा चुके हैं ।
इन चित्रों में आकाश के वह दृश्य दिखलाये गये हैं जो २५ अक्षांश के सब
स्थानों से चित्रों में बतलाये हुए महीनों में संध्या के ८ बजे से १० बजे तक देखे जा
सकते हैं। महीने का आरम्भ संक्रान्ति के प्रायः दूसरे दिन से माना गया है क्योंकि
चांद्रमास के अनुसार बनाया हुआ चित्र एक महीने से अधिक काम नहीं दे सकता
जबकि संक्रान्ति के हिसाब से बनाया हुआ चित्र सैकड़ों वर्ष तक काम में आ सकता
है। संक्रान्ति का विचार भी आजकल तीन तरह से किया जाता है। यहाँ सूर्य सिद्धान्त
की रीति से संक्रान्ति का विचार किया गया है। पाठकों की सुविधा के लिए यह
बतलाना आवश्यक जान पड़ता है कि कौन संक्रान्ति अङ्गरेजी महीने की किस
तारीख को पड़ती है। इन चार चित्रों से वर्ष के बारहों महीनों में कैसे काम लिया
जा सकता है उसके लिए भी कुछ बातें अगले दो पृष्ठों की सारणी में दे दी जाती हैं
जिसकी विधि आगे बतलायी जायगी ।
आगे जो तीन-तीन महीने एकसाथ दिखलाये गये हैं उसका अर्थ यह है कि उन
तीन महीनों की पहली तारीख को बीचवाले महीने का आकाश-चित्र ६ठे स्तम्भ में
बतलाये हुए समय पर देखा जा सकता है। अथवा यों कहिये कि मोटे अक्षरों में
बतलाये हुए महीने का आकाश-चित्र इस महीने के पीछे-आगे वाले महीनों की १ली
तारीख को ६ठें स्तम्भ में बतलाये हुए समय पर देखा जा सकता है।
इस सारणी में केवल यह बतलाया गया है कि महीने की १ ली तारीख को
और शनि ग्रहों के चित्र भी यथास्थान दिये गये थे, जो ब्लाक से हट नहीं सकते
इसलिये पाठकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि वे ग्रह अब वहां नहीं देख पड़ेंगे
क्योंकि ग्रहों के स्थान बदलते रहते हैं तारों की तरह एक से नहीं रहते। इन ब्लाकों
के देने में ज्ञानमंडल के संचालक बाबू शिवप्रसाद गुप्तजी ने जो उदारता दिखलाई
है उसके लिए विज्ञान-परिषद और लेखक दोनों गुप्तजी के ऋणी हैं ।
६३६ सूर्य-सिद्धांत
| सौर मास | किस संक्रान्ति से आरम्भ होता है | उस दिन की अङ्ग्रेजी तारीख जिस दिन सौर मास की पहली तारीख मानी गयी है | सौर मास की १ली तारीख के मध्याह्न काल का सूर्य का विषुवांश * | नक्षत्र काल † जिस का आकाश चित्र बनाया गया है | सौरमास की १ ली तारीख को आकाश चित्र देखने का समय धूप-घड़ी के अनुसार, मध्याह्नोपरान्त | सौर मास की १ ली तारीख का काल-समीकरण | |||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| घण्टा | मिनट | घण्टा | मिनट | घण्टा | मिनट | ||||
| वैशाख | मेष | १४ अप्रैल | १ | २६ | १३ | ३० | ११ | ५६ | |
| ज्येष्ठ | वृष | १५ मई | ३ | २७ | १० | १ | |||
| आषाढ़ | मिथुन | १५ जून | ५ | ३३ | ७ | ५६ |
* मध्याह्नकाल में सूर्य का विषुवांश होता है वही मध्याह्न का नक्षत्रकाल भी होता है (देखो पृष्ठ २७५ पाद
टिप्पणी)। यह १६८५ विक्रमीय का प्रयाग के मध्याह्नकाल का विषुवांश है। यह प्रतिवर्ष एक-एक मिनट कम होता जाता है
परन्तु ४ वर्ष के बाद प्रायः यही फिर हो जाता है। परन्तु यह अन्तर नगण्य है।
† नाक्षत्र काल नाक्षत्र-घटिका-यन्त्र से जाना जाता है और जिस समय बसन्त-सम्पात-बिन्दु यामोत्तरवृत्त पर जाता है
उस समय नाक्षत्र दिन का आरम्भ होता है (देखो पृष्ठ ३१७-३६)'
नक्षत्रग्रहयुधिकार ६३७
$ श्रावण & कर्क & १७ जुलाई & ७ & ४५ & १६ & ३० & ११ & ४३
भाद्रपद & सिंह & १७ अगस्त & ८ & ४६ & & & ८ & ४२
आश्विन & कन्या & १७ सितम्बर & ११ & ३८ & & & ७ & ५१ $
$ कार्तिक & तुला & १८ अक्टूबर & १३ & ३१ & & & ११ & ५७
मार्गशीर्ष & वृश्चिक & १७ नवम्बर & १५ & २६ & १ & ३० & ८ & ५६
पौष & धनु & १६ दिसम्बर & १७ & ३४ & & & ७ & ५५ $
$ माघ & मकर & १४ जनवरी & १६ & ४२ & & & ११ & ४६
फाल्गुन & कुम्भ & १३ फरवरी & २१ & ४६ & ७ & ३० & ८ & ४३
चैत्र & मीन & १५ मार्च & २३ & ३६ & & & ७ & ५० $
६३८ सूर्य-सिद्धान्त
कौन आकाश चित्र किस समय देखना चाहिये। यदि महीने की किसी और तारीख
को आकाश-चित्र से काम लेना हो तो यह ध्यान में रखना चाहिये कि जो
दृश्य महीने की १ ली तारीख को १० बजे देख पड़ता है वही दृश्य २री
तारीख को दस बजने से ४ मिनट पहले, ३री तारीख को दस बजने से
४ x २ = ८ मिनट पहले, एक सप्ताह के बाद अर्थात् ८वीं तारीख को ४ x ७
= २८ मिनट पहले और १५ दिन के बाद १६ तारीख को १५ x ४ = ६०
मिनट या १ घंटा पहले अर्थात् ९ बजे देख पड़ेगा। इसका कारण यह है कि
पृथ्वी दिन रात भर में १ अंश सूर्य की परिक्रमा करने में आगे बढ़ती है जिससे सूर्य
तारों के मध्य पूरब की ओर एक अंश खसकता हुआ देख पड़ता है। इसलिये सूर्य
को यामोत्तर वृत्त पर आने में प्रतिदिन ४ मिनट की देर हो जाती है अथवा सूर्य
का विषुवांश प्रति दिन प्रायः ४ मिनट बढ़ता जाता है। परन्तु आकाश-चित्र जिस
नाक्षत्र-काल का बनाया गया है वह स्थिर है इसलिये मध्याह्न से जितने समय
पर आकाश किसी दिन देख पड़ता है उससे ४ मिनट पहले ही दूसरे दिन देख पड़ता
है (देखो पृष्ठ ४६३-४६६) । सीधा नियम यह है कि मध्याह्न के सूर्य के विषुवांश से
जितना पहले या पीछे आकाश चित्र का नाक्षत्र-काल है मध्याह्न से उतना
ही पहले या पीछे आकाश-चित्र में बतलाये गये दृश्य आकाश में देख पड़ते
हैं। जैसे वैशाख की १ ली तारीख को मध्याह्नकालीन सूर्य का विषुवांश १ घण्टा
२६ मिनट के लगभग होता है और ज्येष्ठ के आकाश चित्र का नाक्षत्रकाल १० घंटा
३० मिनट है अर्थात् मध्याह्नकालीन विषुवांश से १२ घण्टा १ मिनट पीछे है
इसलिये वैशाख की १ ली तारीख को ज्येष्ठ का आकाश चित्र रात के १२ बजकर
१ मिनट पर देख पड़ेगा। परन्तु ६ठें स्तम्भ में ११ बज कर ५६ मिनट बतलाया
गया है इसका कारण यह है। कि १२ घंटा १ मिनट नाक्षत्र-काल में है और ११ घंटा
५६ मिनट धूपघड़ी के अनुसार सावन-काल में है। क्योंकि यह बतलाया जा चुका
है कि सावन दिन नाक्षत्र दिन से ४ मिनट के लगभग बड़ा होता है (देखो पृष्ठ
३३७-३६) इसलिये नाक्षत्र-काल का ६ घण्टा सावन-काल के ५ घण्टा ५६
मिनट के समान होता है।
इस नियम के अनुसार यदि आप माघ महीने की १ली तारीख को एक ही
रात में आकाश के कुल तारों को देखना चाहें तो सहज ही देख सकते हैं। इस तारीख
को बम्बई और जगन्नाथ पुरी को मिलाने वाली रेखा के उत्तर के प्रान्तों में अर्थात्
सारे उत्तर भारत में सूर्य साढ़े पांच बजे के पहले अस्त होता है। इसलिये ६ बजे
संध्या के समय आकाश के तारे अच्छी तरह दिखाई पड़ने लगते हैं। इस तारीख को
मध्याह्नकालीन सूर्य का विषुवांश १६ घण्टा ४२ मिनट होता है इसलिये मध्याह्न से
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६३६
६ घण्टा पीछे का नाक्षत्र काल हुआ १८ घण्टा ४२ मिनट + ६ घण्टा = २४ घण्टा
४२ मिनट अथवा १ घण्टा ४२ मिनट जो १ घण्टा ३० मिनट के लगभग है। इस
लिये माघ की १ली तारीख को १ घण्टा ३० मिनट वाले नाक्षत्रकाल का आकाश
चित्र अर्थात् मार्गशीर्ष का आकाश चित्र ६ बजे संध्या के समय देखा जा सकता है।
इसका अर्थ यह हुआ कि आप श्रवण से लेकर पुनर्वसु तक के १३ नक्षत्रों को अथवा
धनिष्ठा से लेकर पुनर्वसु तक के १२ नक्षत्रों को सहज ही पहचान सकते हैं। यदि
इससे ६ घंटा पीछे १२ बजे रात को आकाश देखें तो उस समय का नाक्षत्रकाल ७
घंटा ४२ मिनट के लगभग होगा जब कि फाल्गुन मास का आकाश-चित्र आपके काम
में आ सकता है क्योंकि फाल्गुन मास का आकाश चित्र उस समय का है जब नाक्षत्र
काल ७ घंटा ३० मिनट होता है। इस चित्र से आपको अश्विनी से लेकर हस्त नक्षत्र
तक की पहचान सहज ही हो सकती है। इसी प्रकार यदि आप इसी रात को ६ बजे
प्रातःकाल के लगभग अथवा १०, १२ मिनट और पहले ही आकाश देखें तो ज्येष्ठ
का आकाश चित्र काम दे सकता है क्योंकि ६ बजे प्रातःकाल का नाक्षत्रकाल १३ घंटा
४० मिनट के लगभग होगा और इससे १२, १३ मिनट पहले का आकाश-चित्र १३
घंटा ३० मिनट के नाक्षत्रकाल के समय का होगा। इस आकाश-चित्र से आप पुनर्वसु
से लेकर मूल या पूर्वाषाढ़ तक के तारे देख सकते हैं। इसी प्रकार यह भी हिसाब
लगाया जा सकता है कि किसी और रात को किस समय किस मास के आकाश
चित्र काम दे सकते हैं।
चित्र का साधारण वर्णन—चित्र में जो गोल रेखा खींची हुई है वह २५
अक्षांश का क्षितिज है इसलिए प्रयाग या काशी के क्षितिज से प्रायः मिलता है। केन्द्र
में धन का एक चिह्न इस प्रकार + है। इससे आकाश का वह बिन्दु प्रकट होता है
जो २५ अक्षांश पर सिर के ठीक ऊपर होता है। इसे खस्वस्तिक या खमध्य कहते
हैं। गोल रेखा के पास उत्तर, दक्षिण, पूरब, पच्छिम तथा इनके बीच की दिशाएं
दिखलाई गयी हैं। उत्तर से दक्षिण तक जो सीधी रेखा देख पड़ती है वह यामोत्तर
वृत्त है। मध्याह्नकाल में सूर्य इसी रेखा पर रहता है। पूरब से पच्छिम तक जो टेढ़ी
रेखा देख पड़ती है वह विषुवद्वृत्त है। वसंत-सम्पात और शरद्-संपात के दिन सूर्य
इसी पर देख पड़ता है और ठीक पूर्व में उदय तथा ठीक पच्छिम में अस्त होता है।
विषुवद्वृत्त को काटती हुई एक दूसरी रेखा भी है जिसे क्रान्तिवृत्त कहते हैं। सूर्य
इसी पर प्रतिदिन चलता हुआ देख पड़ता है। यथार्थ में यह हमारी पृथ्वी का मार्ग
है जिस पर चलती हुई यह वर्ष भर में सूर्य की एक परिक्रमा कर लेती है। यह मार्ग
बड़े महत्व का है। चंद्रमा और ग्रह इसी के आसपास आकाश में चक्कर लगाते हुए
६४० सूर्य-सिद्धान्त
देख पड़ते हैं। क्रान्तिवृत्त २७ समान भागों में बाँटा गया है जिन्हें नक्षत्र कहते हैं ।
मार्गशीर्ष के आकाश चित्र में नक्षत्रों के नाम भी दे दिये गये हैं परन्तु अन्य चित्रों में
नक्षत्रों की केवल क्रम संख्या दी गयी है। जैसे क्रान्तिवृत्त पर जहाँ १ लिखा है वहाँ
१ ला नक्षत्र अश्विनी का अन्त होता है, जहाँ ५ लिखा है वहाँ ५वाँ नक्षत्र मृगशिरा
समाप्त होता है, इत्यादि । क्रान्तिवृत्त पर जहाँ छोटे से वृत्त के भीतर चिह्न बना
हुआ है वहीं सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार आजकल रेवती नक्षत्र का अन्त और अश्विनी
नक्षत्र का आरम्भ समझा जाता है। क्रान्तिवृत्त, विषुवद्वृत्त और यामोत्तरवृत्त की
रेखाएं आकाश में देख नहीं पड़ती हैं। इनकी कल्पना ज्योतिषियों ने सुविधा के
लिए की है।
वैसे तो निर्मल आकाश में जब अन्धेरी रात हो अनगिनत तारे देख पड़ते हैं
परन्तु इन चित्रों में केवल वही दिखलाये गये हैं जो चांदनी रात में भी देखे जा सकते
हैं। आकार का परिचय कराने के लिये कुछ ऐसे तारे भी ले लिये गये हैं जो
पूर्णमासी के ३, ४ दिन आगे-पीछे चन्द्रमा का अधिक प्रकाश होने के कारण नहीं
देख पड़ते। आकाश-गङ्गा भी जिनमें नन्हें-नन्हें असंख्य तारे एक दूसरे से मिले हुए
देख पड़ते हैं इन चित्रों में नहीं दिखलायी गयी है। अंधेरी रात में यह आकाश-गंगा
भी उत्तर की ओर प्रजापति, परशु, कश्यप, राजहंस और श्रवण मण्डलों को नहलाती
हुई वृश्चिक, धनु राशियों को सींचती हुई प्रसिद्ध अग्रहायण और लुब्धक मण्डल को
पुनर्वसु और प्रश्वा से अलग करती हुई उत्तर से दक्खिन तक आकाश को घेरे हुए है।
जिस समय का चित्र बनाया गया है उससे कुछ पहले देखने पर पूर्व क्षितिज
के पास वाले तारे उदय न होने के कारण नहीं देख पड़ेंगे और पच्छिम क्षितिज के
पास वाले तारे कुछ ऊपर देख पड़ेंगे और यामोत्तर वृत्त के पास वाले तारे कुछ
पूरव की ओर हटे हुए देख पड़ेंगे। परन्तु यदि उपर्युक्त समय से कुछ पीछे आकाश
देखा जाय तो पूर्व क्षितिज के तारे कुछ ऊपर उठे हुए देख पड़ेंगे और क्षितिज के
पास कुछ नये तारे भी उदय हो चुके रहेंगे; पच्छिम क्षितिज में कुछ तारे अस्त हुए
रहेंगे और यामोत्तर वृत्त के पास वाले तारे पच्छिम की ओर ढल चुके रहेंगे ।
२५ अक्षांश के जो स्थान उत्तर हैं वहाँ उत्तर के कुछ और तारे देख पड़ेंगे ।
परन्तु जो स्थान दक्षिण हैं वहाँ दक्खिन के कुछ और तारे देख पड़ेंगे और तारों की
ऊँचाई-नीचाई में भी कुछ अन्तर देख पड़ेगा परन्तु इससे कोई कठिनाई नहीं हो
सकती ।
चित्र देखने की रीति—जिधर मुँह करके आकाश को देखना हो चित्र में
अंकित उसी दिशा को नीचे करके चित्र को खड़ा कर लीजिए । सबसे नीचे वह
तारा है जो क्षितिज के पास देख पड़ेगा । नीचे से केन्द्र तक जो जो तारे चित्र में