सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६०६
भिन्नता (२) अश्विनी के आदि विन्दु की स्थिति के निश्चय करने में भिन्नता (३)
योग तारों के निश्चय में भिन्नता और (४) सम्पात विन्दु की गति । पहला कारण
तो स्पष्ट है क्योंकि वेध यन्त्रों की स्थूलता के कारण वेध के फलों में भिन्नता
स्वाभाविक है। दूसरा कारण भी विशेष महत्व का है। इससे यह जान पड़ता है कि
अश्विनी के आदि विन्दु के निश्चय में पुराने आचार्यों में भी मतभेद था जैसा कि
आजकल है। परन्तु इस मतभिन्नता से आजकल संक्रान्तियों और मलमासों के
निश्चय करने में बड़ी कठिनाई उपस्थित हो रही है जिससे अखिल भारतीय तिथियों
और पर्वों की स्थिरता ही नहीं हो सकती । इस बात पर सब प्रान्तों के ज्योतिषाचार्यों
में एकता हो जाय तो बड़ा भारी काम हो जायगा और इसके उद्योग में जो सज्जन तन
मन धन लगावेंगे वे बड़े पुण्य के भागी होंगे । महाराष्ट्र और गुजरात प्रान्तों में इसके
सम्बन्ध में बहुत दिनों से उद्योग हो रहा है परन्तु अभी तक कुछ निश्चय नहीं हुआ ।
इसी प्रकार सम्पात विन्दु की गति के कारण तारों के ध्रुवों और विक्षेपों में
अन्तर पड़ता जाता है यद्यपि इनके कदम्बाभिमुख भोगों और शरों में स्थिरता रहती है।
अब १०-१२ श्लोकों में बतलाये गये तारों के ध्रुवक और विक्षेप देकर
कई सारणियों में यह बतलाने का उद्योग किया जायगा कि तारों के ध्रुवांशों के
सम्बन्ध में प्राचीन और अर्वाचीन आचार्यों के क्या मत हैं।
अशीतिभागं र्यस्यायामगस्त्यो मिथुनान्तगः ।
विंशे च मिथुनस्यांशे मृगव्याधो व्यवस्थितः ॥१०॥
विक्षिप्तो दक्षिणे भागैः खार्णवैस्त्वावपक्रमात् ।
हुतभुग्ब्रह्म हृदयौ वृषद्वाविंशभागगौ ॥११॥
अष्टाभिः त्रिंशता चैव विक्षिप्तावुत्तरेण तौ ।
गोलं बद्ध्वोपरिक्षेत्रं विक्षेपध्रुवकान् स्फुटान् ॥१२॥
अनुवाद-(१०) अगस्त्य तारे का ध्रुव मिथुन राशि के अन्त में अर्थात्
६० अंश और दक्षिण विक्षेप ८० अंश है। मृगव्याध अथवा लुब्धक तारे का ध्रुव
मिथुन के २० अंश पर अर्थात् ८० अंश है। (११) इसका विक्षेप क्रान्तिवृत्त से
दक्षिण ४० अंश पर है। अग्नि और ब्रह्महृदय दोनों तारों के ध्रुव वृषराशि के २२
अंश पर अर्थात् ५२ अंश हैं। (१२) इनके विक्षेप क्रम से ८ अंश और ३० अंश
क्रान्तिवृत्त से उत्तर की ओर हैं। गोलयंत्र के द्वारा इन स्फुटविक्षेपों और ध्रुवकों की
परीक्षा करना चाहिए ।
विज्ञान-भाष्य-१२ वें श्लोक का उत्तरार्ध बड़े महत्व का है। इससे यह
सिद्ध होता है कि हमारे आचार्यों को लकोर का फकीर होना इष्ट नहीं था इसीलिए
६१० सूर्य-सिद्धान्त
नक्षत्रों के योग ताराओं तथा कुछ अन्य ताराओं के ध्रुवाभिमुख भोग ( ध्रुव )
( देखो भारतीय ज्योतिष शास्त्र पृष्ठ ४५२ )
| नक्षत्र की क्रम संख्या | ताराओं के नाम | प्रचलित सूर्य-सिद्धान्त | ब्रह्मगुप्त सिद्धान्त | लल्ल तंत्र | दामोदरीय भट तुल्य | सुन्दर सिद्धान्त | ग्रहलाघव | शंकर बालकृष्ण दीक्षित | अन्य तारों के अंग्रेजी नाम | |||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अंश | कला | अंश | कला | अंश | कला | अंश | कला | अंश | कला | अंश | कला | अंश | कला | |||
| १ | अश्विनी | ८ | ० | ८ | ० | ८ | ० | ८ | ३० | ८ | ८ | ७ | ४३ | |||
| २ | भरणी | २० | ० | २० | ० | २० | ० | २१ | १५ | २० | २१ | २१ | ५१ | |||
| ३ | कृत्तिका | ३७ | ३० | ३७ | २८ | ३६ | ० | ३७ | ४५ | ३८ | ३८ | ३६ | २ | |||
| ४ | रोहिणी | ४६ | ३० | ४६ | २८ | ४६ | ० | ४६ | ० | ५० | ४६ | ४७ | ३७ | |||
| ५ | मृगशिरा | ६२ | ० | ६२ | ० | ६२ | ० | ६२ | ० | ६३ | ६२ | ६१ | २६ | |||
| ६ | आर्द्रा | ६७ | ० | ६७ | ० | ७० | ० | ६६ | ० | ६७ | ६६ | ७५ | ४३ | |||
| ७ | पुनर्वसु | ६२ | ० | ६२ | ० | ६२ | ० | ६२ | ४५ | ६२ | ६४ | ६१ | २१ |
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६१९
८ पुष्य १०६ ० १०६ ० १०५ ० १०६ ० १०६ १०६ १०५ ४३
९ आश्लेषा १०६ ० १०८ ० ११४ ० १०७ १५ १०८ १०७ १०८ ३८
१० मघा १२६ ० १२६ ० १२८ ० १२६ ० १२६ १२६ १२६ ५६
११ पूर्वा फाल्गुनी १४४ ० १४७ ० १३६ २० १४८ १४८ १४४ ३१
१२ उत्तरा फाल्गुनी १५५ ० १५५ ० १५४ ० १५५ ३० १५५ १५५ १५४ १
१३ हस्त १७० ० १७० ० १७३ ० १७० ० १७० १६५ ६
१४ चित्रा १८० ० १८३ ० १८४ ० १८३ ० १८३ १८३ १८० ०
१५ स्वाती १६६ ० १६६ ० १६७ ० ११८ ३० १६६ १६८ १६३ २८
१६ विशाखा २१३ ० २१२ ५ २१२ ० २१२ १५ २१२ २१२ २०२ ११
१७ अनुराधा २२४ ० २२४ ५ २२२ ० २२४ १५ २२४ २११ ८
१८ ज्येष्ठा २२६ ० २२६ ५ २२८ ० २२६ ३० २२६ २३० २२२ ५६
१९ मूल २४१ ० २४१ ० २४१ ० २४२ ० २४० २४० ४५
६१२ सूर्य-सिद्धान्त
नक्षत्र की क्रम | ताराओं | प्रचलित सूर्य-सिद्धान्त | ब्रह्मगुप्त सिद्धान्त | लल्लतंत्र | दामोदरीय भट तुल्य | सुन्दर सिद्धान्त | प्रह्लादघव | शंकर बालकृष्ण दीक्षित | अन्य तारों के अंग्रेजी नाम
संख्या | के नाम | अंश कला | अंश कला | अंश कला | अंक वर्ग | अंश काल | अंश कला | अंश कला |
२० | पूर्वाषाढा | २५४ ० | २५४ ० | २५४ ० | २५५ ३२ | २५४ | २५५ | २५३ २३ |
२१ | उत्तराषाढा | २७० ० | २६० ० | २६७ २० | २६० ० | २६० | २६१ | २६३ ५ |
| अभिजित | २६६ ४० | २६५ ० | २६७ ० | २५६ ४५ | | २५८ | २५६ १० |
२२ | श्रवण | २८० ० | २७८ ० | २८३ १० | २७५ १५ | २७८ | २७५ | २७२ ५८ |
२३ | धनिष्ठा | २९० ० | २९० ० | २९६ २० | ३०७ ३० | २९० | २८६ | २८४ ४७ |
२४ | शततारका | ३२० ० | ३२० ० | ३१३ २० | ३२० ० | ३२० | ३२० | ३१९ ४३ |
२५ | पूर्वाभाद्रपद | ३२६ ० | ३२६ ० | ३२७ ० | ३२५ ० | ३२६ | ३२५ | ३२२ ३ |
२६ | उत्तर भाद्रपद | ३३७ ० | ३३७ ० | ३३५ २० | ३३७ ० | ३३७ | ३३७ | ३४० ३५ |
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार
६१३
२७ रेवती ३५६ ५० ० ० ३५६ ० ० ० ० ० ३५६ ५७
१ २०
अगस्त्य ६० ० ८७ ० ८७ ० ८७ ८० Canopus
व्याध ८० ० ८६ ० ८६ ० ८६ ८१ Sirius
अग्नि ५२ ० ५२ ५३ β Tauri
ब्रह्मा ५२ ० ५२ ५६ α aurigae
(capella)
β aurigae
प्रजापति ५७ ० ५७ ६१ θvirginis*
अपांवत्स १८० ० १८३ δvirginis*
आपस १८० ०
Popular Hindu Astronomy Part I pp. 240-241
६१४ | सूर्य-सिद्धान्त
नक्षत्रों के योग ताराओं तथा कुछ अन्य ताराओं के ध्रुवाभिमुख शर या विक्षेप
(देखो भारतीय ज्योतिष शास्त्र पृष्ठ ४५३)
| नक्षत्रों की क्रम-संख्या | ताराओं के नाम | प्रचलित सूर्य-सिद्धान्त (अंश | कला) | ब्रह्मगुप्त सिद्धान्त (अंश | कला) | लल्लतंत्र (अंश | कला) | दामोदरीय भटतुल्य (अंश | कला) | सुन्दर सिद्धान्त (अंश | कला) | ग्रहलाघव (अंश | कला) | शंकर बालकृष्ण दीक्षित (अंश | कला) | शर की दिशा |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | अश्विनी | १० | १० | १० | १० | १० | १० | ८ | उत्तर |
| २ | भरणी | १२ | १२ | १२ | १२ १५ | १२ | १२ | १० ५७ | उत्तर |
| ३ | कृत्तिका | ५ | ४ ३१ | ५ | ४ | ४ | ५ | ४ ८ | उत्तर |
| ४ | रोहिणी | ५ | ४ ३३ | ५ | ४ | ४ ३० | ५ | ५ ३२ | दक्षिण |
| ५ | मृगशिरा | १० | १० | १० | १० | १० | १० | १३ २४ | दक्षिण |
| ६ | आर्द्रा | ९ | ११ | ११ | ११ | ११ | ११ | ६ ४६ | दक्षिण |
| ७ | पुनर्वसु | ६ | ६ | ६ | ६ | ६ | ६ | ६ ४६ | उत्तर |
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६१५
८ पुष्य ० ० ० ० ० ० ० ५ उत्तर
९ आश्लेषा ७ ७ ७ ७ ७ ७ ११ २४ दक्षिण
१० मघा ० ० ० ० ० ० ० २६ उत्तर
११ पू०फाल्गुनी १२ १२ १२ १३ १ ४५ १२ १० ३१ उत्तर
१२ उ०फाल्गुनी १३ १३ १३ १२ ४५ १३ १३ २४ उत्तर
१३ हस्त ११ ११ ८ ११ ११ ११ १३ १७ दक्षिण
१४ चित्रा २ १ ४५ २ १ ४५ १ ४५ २ २ १२ दक्षिण
१५ स्वाती ३७ ३७ ३७ ३७ १५ ३७ ३२ ५६ उत्तर
१६ विशाखा १ ३० १ २३ १ ३० १ १५ १ ० २२ दक्षिण
१७ अनुराधा ३ ० १ ४४ ३ १ ४५ २ २ १ दक्षिण
१८ ज्येष्ठा ४ ३ ३० ४ ३ ३० ३ ४ ३७ दक्षिण
१९ मूल ८ ८ ३० ८ ३० ८ ३० ८ १३ ४८ दक्षिण
६१६ सूर्य-सिद्धान्त
| नक्षत्रों की क्रम-संख्या | ताराओं के नाम | प्रचलित सूर्य-सिद्धान्त (अंश | कला) | ब्रह्मगुप्त सिद्धान्त (अंश | कला) | लल्ल तंत्र (अंश | कला) | दामोदरदेव भटतुल्य (अंश | कला) | सुन्दर सिद्धान्त (अंश | कला) | ग्रहलाघव (अंश | कला) | शंकर बालकृष्ण दीक्षित (अंश | कला) | शर की दिशा |
| :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- |
| २० | पूर्वाषाढ़ | ५ | ३० | ५ | २० | ५ | २० | ५ | ३० | | | ५ | | २ | ७ | दक्षिण |
| २१ | उत्तराषाढ़ | ५ | | ५ | | ५ | | ५ | | | | ५ | | १ | २८.७ | दक्षिण |
| | अभिजित् | ६० | | ६२ | | ६३ | | ६२ | | ६२ | | ६२ | | ६१ | ५५ | उत्तर |
| २२ | श्रवण | ३० | | ३० | | ३० | | २६ | ३० | ३० | | ३० | | २६ | ४६ | उत्तर |
| २३ | धनिष्ठा | ३६ | | ३६ | | ३६ | | २५ | ३० | ३६ | | ३६ | | ३४ | १५ | उत्तर |
| २४ | शततारका | ० | ३० | ० | १८ | ० | २० | ० | १५ | ० | २० | ० | | ० | २५ | दक्षिण |
| २५ | पू. भाद्रपद | २४ | | २४ | | २४ | | २३ | ४५ | | | २४ | | २१ | ६ | उत्तर |
| २६ | उ. भाद्रपद | २६ | | २६ | | २६ | | २६ | | | | २७ | | १३ | ४५ | उत्तर |
नक्षत्रग्रहणाधिकार ६१७
२७ रेवती ० ० ० ० ७७ ० ० १४ } दक्षिण
३ १८ }
अगस्त्य ८० ७७ ८० ७७ ७६ दक्षिण
व्याध ४० ४० ४० ४० ४० दक्षिण
अग्नि ८ ८ ८ उत्तर
ब्रह्मा ३० ३० ३० उत्तर
प्रजापति ३८ ३८ ३८ उत्तर
अपांवत्स ४५ ३ उत्तर
आप उत्तर
६१८ सूर्य-सिद्धान्त
वह स्थान-स्थान पर कहते गये हैं कि यंत्रों के द्वारा ग्रहों और नक्षत्रों का वेध करके
जो ध्रुवक यथार्थ आवें उनको मानना चाहिए। यहाँ उन्होंने केवल गोलयंत्र की
चर्चा की है। त्रिप्रश्नाधिकार के ११ वें श्लोक में बतलाया गया है कि शंकु की
छाया से सूर्य का जो भोगांश आता है उससे गणित से निकाले हुए भोगांश का जो
अंतर होता है वही स्पष्ट अयनांश है। इन बातों से स्पष्ट होता है कि हमारे आचार्यों
को यह इष्ट था कि ज्योतिष सम्बन्धी गणित का मिलान आकाश के प्रत्यक्ष वेध से
करके उचित संशोधन भी करते रहना चाहिए।
यहाँ गोलयंत्र की विशेष चर्चा नहीं की जायगी क्योंकि यह विषय ज्योति-
षोपनिषद्ध्याय नामक १३ वें अध्याय में जहां और यंत्रों की चर्चा है स्वयम् आवेगा
इसलिए वहीं चित्र देकर यह अच्छी तरह समझाया जायगा। साथ ही साथ यह भी
बतलाया जायगा कि इस समय कुछ नवीन यंत्रों जैसे दूरदर्शक यंत्र इत्यादि से बहुत
ही सूक्ष्मतापूर्वक कैसे काम लिया जा सकता है और प्रत्येक ज्योतिष विद्यालय के
साथ नवीन ढंग के एक-एक वेधालय की कितनी आवश्यकता होती है।
पिछली सारणियों में यह बताया गया है कि भिन्न-भिन्न आचार्यों के मत से
उपर्युक्त तारों के ध्रुवक और विक्षेप क्या हैं। ब्रह्मगुप्त सिद्धान्त के ध्रुवक और
विक्षेप भास्कराचार्य की सिद्धान्तशिरोमणि के ध्रुवक और विक्षेप से मिलते हैं।
लल्लतंत्र, दामोदरीयभट तुल्य, और सुन्दरी-सिद्धान्त के ध्रुवक और विक्षेप स्वर्गीय
शंकर बालकृष्ण दीक्षित के भारतीय ज्योतिष शास्त्र से लिये गये हैं। दीक्षित जी ने
चित्रा तारे का ध्रुवक १८० अंश मानकर सन् १८८७ ई० के नाटिकल अलमैनेक
में दिये हुए तारों के विषुवांशों और क्रान्तियों से जो ध्रुवक और विक्षेप स्थिर किये
थे वे भी इस सारिणी में दिये जायेंगे। दीक्षित जी ने रेवती तारे के दो ध्रुवक और
दो विक्षेप दिये हैं । इसका कारण यह है कि इनके मत से रेवती का योग
तारा जीटा पिसियम या म्यू पिसियम हो सकता है। इसीलिए पहला ध्रुवक या
विक्षेप जीटा पिसियम का है और दूसरा म्यू पिसियम का।
ग्रह का रोहिणी-शकट-भेद कब होता है—
वृषे सप्तदशे भागे यस्य याम्योऽशकद्वयात् ।
विक्षेपोऽभ्यधिको हन्याद् रोहिण्याश्शकटं तु सः ॥१३॥
अनुवाद—(१३) वृषराशि के १७ वें अंश पर स्थित जिस ग्रह का दक्षिण
विक्षेप २ अंश से अधिक होता है वह ग्रह रोहिणी नक्षत्र के शकट को भेद करता है ।
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६१६
विज्ञान भाष्य—रोहिणी नक्षत्र में ५ तारे हैं जिनकी आकृत गाड़ी की
तरह अथवा अंग्रेजी के वी (V) अक्षर की तरह है । इन पांच तारों में सबसे उत्तर
वाले तारे का दक्षिण विक्षेप २ अंश ३५ कला के लगभग है । इस तारे को आजकल
एपसिलान टारि कहते हैं। और रोहिणी के योग तारे का दक्षिण शर ५ अंश ३२
कला है । जिस ग्रह का दक्षिण शर या विक्षेप इन दो सीमाओं के बीच में होता है
वह रोहिणी के शकट के भीतर हो जाता है । इसी को रोहिणी के शकट का भेदन
कहते हैं । यह प्रकट है कि ग्रह का विक्षेप उसके पात पर आश्रित रहता है । चन्द्रमा
का पात १८ वर्षों में एक फेरा करता है। इस एक फेरे में चन्द्रमा केवल ५,६ वर्ष
शकट का भेद करता है । यदि चन्द्रमा का दक्षिण शर २ अंश ३५ कला से अधिक
हो और ५ अंश ३२ कला से कम और उस समय यह रोहिणी नक्षत्र में हो तो यह
अवश्य रोहिणी के शकट में होकर चलेगा इसलिए चन्द्रमा का रोहिणी-शकट-भेद
होगा । अब यह देखना है कि जिस समय चन्द्रमा रोहिणी नक्षत्र में होता है उस
समय इसका दक्षिण शर २ अंश ३५ कला से अधिक कम होता है ।
मध्यमाधिकार के पृष्ठ ७५ में बतलाया गया है कि चन्द्रमा का परमविक्षेप
५ अंश ८ कला ४२ विकला है । इसका अर्थ यह है कि जब चन्द्रमा राहु से ६० अंश
आगे रहता है तब इसका उत्तर शर ५ अंश ८ कला और ४२ विकला होता है और
जब यह केतु से ६० अंश आगे रहता है तब इसका दक्षिण शर इतना ही होता है ।
परन्तु जब यह राहु या केतु पर रहता हैतब इसका शर शून्य होता है । इसलिए स्पष्टा-
धिकार के श्लोक २८, चित्र २५ के आधार पर यह सहज ही जाना जा सकता
है कि चन्द्रमा का शर २ अंश ३५ कला से अधिक कब होता है । इस चित्र में यदि व स
चन्द्रमा की कक्षा, व प क्रान्तिवृत्त, व राहु का स्थान, स चन्द्रमा का स्थान, स ए
चन्द्रशर और स व प चन्द्रमा का परम विक्षेप मान लिया जाय तो व स और प
का सम्बन्ध सहज ही जाना जा सकता है। यहां यदि स प को २ अंश ३५ कला
मान लिया जाय तो
ज्या (वस) = ज्या ( स प ) / ज्या (सवप) = ज्या २°३५′ / ज्या ५° ८′ = .०४५१ / .०८६८ = .५०२२
∴ व स = ३० अंश ६ कला
अर्थात् जब चन्द्रमा अपने पात से एक राशि आगे रहता है तब इसका शर
२ अंश ३५ कला से अधिक होता है । परन्तु रोहिणी क्रान्तिवृत्त के दक्षिण है और
इसका ध्रुवाभिमुख भोगांश सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार ४६ अंश ३० कला और शंकर
बालकृष्ण दीक्षित के अनुसार ४७ अंश ३७ कला है तथा कदम्बाभिमुख भोगांश
६२० सूर्य-सिद्धान्त
सूर्य-सिद्धान्त की गणना से ४८ अंश ६ कला और शंकर बालकृष्ण दीक्षित की
गणना से ४५ अंश ५७ कला है। इसलिए यदि रोहिणी के योग तारा का
कदम्बाभिमुख भोगांश ४६ अंश मान लिया जाय तो जिस समय चन्द्रमा का भोगांश
इतना ही होगा उस समय ही रोहिणी-शकट-भेद हो सकता है यदि इसका दक्षिण
शर भी २ अंश ३५ कला से अधिक हो। ऐसी दशा में चन्द्रमा को केतु से कम
से कम १ राशि आगे रहना चाहिए अर्थात् जब केतु का भोगांश कम से कम १६
अंश हो तभी रोहिणी-शकट-भेद हो सकता है।
ऊपर की गणना से यह सिद्ध हुआ कि जब केतु से चन्द्रमा १ राशि आगे
रहता है तब इसका दक्षिण शर २ अंश ३५ कला होता है। इसके बाद इसका दक्षिण
शर बढ़ते-बढ़ते ५ अंश ८ कला हो जाता है। उस समय यह केतु से ३ राशि आगे हो
जाता है। फिर इसका दक्षिण शर घटने लगता है और जब यह केतु से ५ राशि आगे
अथवा राहु से १ राशि पीछे रहता है तब तक इसका दक्षिण शर २ अंश ३५ कला
से कम नहीं होता । इसी सीमा के भीतर चन्द्रमा रोहिणी के शकट का भेद करता
है। परन्तु ऊपर सिद्ध हुआ है कि जब केतु का भोगांश १६ अंश होता है अर्थात्
जब केतु मेष राशि के १६ अंश पर होता है तब यदि चन्द्रमा का दक्षिण विक्षेप २
अंश ३५ कला हो तो रोहिणी-शकट-भेद होगा। इसके बाद केतु अपनी वक्री गति से
जब पीछे हटता जायगा तब भी चन्द्रमा रोहिणी के शकट को भेद करेगा क्योंकि उस
समय रोहिणी नक्षत्र में इसका दक्षिण शर २ अंश ३५ कला से अधिक होता जायगा।
इस प्रकार जब तक केतु मेष के १६ अंश से ४ राशि पीछे नहीं चला जाता तब तक
रोहिणी नक्षत्र में चन्द्रमा का दक्षिण शर २ अंश ३५ कला से कम नहीं होगा ।
इसका अर्थ यह हुआ कि जब केतु मेष राशि के १६ अंश पर आवेगा तब चन्द्रमा के
रोहिणी-शक भेद का आरम्भ होगा और जब तक यह धनु के १६ अंश पर नहीं
आवेगा तबतक चन्द्रमा के प्रति फेरे में रोहिणी नक्षत्र में चन्द्रमा का रोहिणी-शकट-
भेद होगा। परन्तु राहु केतु से ६ राशि आगे रहता है। इसलिये यह भी कहा जा
सकता है कि जब तक राहु मिथुन के १६ अंश से तुला के १६ अंश तक की सीमा में
रहता है तब तक चन्द्रमा का रोहिणी-शकट-भेद होता है।
इसी प्रकार अन्य ग्रहों के रोहिणी शकट-भेद की भी गणना की जा सकती
है। परन्तु मध्यमाधिकार पृष्ठ ७५ में दी हुई सारिणी से यह प्रकट होता है कि
शुक्र और बुध के सिवा किसी ग्रह का परम शर २ अंश ३५ कला से अधिक नहीं है
इसलिए बुध और शुक्र का ही रोहिणी शकट-भेद संभव है। शनि का परम शर २
अंश २६ कला ३६ विकला है इसलिए शनि का रोहिणी-शकट-भेद भी असंभव जान
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६२१
पड़ता है। परन्तु वराह मिहिर१ तथा ग्रहलाघवकार२ ने लिखा है कि शनि अथवा
मङ्गलक रोहिणी-शकट-भेद होने से बड़ा अनिष्ट होता है।
युतिकाल का साधन—
ग्रहवद् द्यु निशेमानां कुर्याद् दृक्कर्म पूर्ववत् ।
ग्रहमेलनविज्ञेयं ग्रहभुक्त्या दिनादिकम् ॥१४॥
एष्यो हीने ग्रहे योगो ध्रुवकादधिके गतः ।
विपर्ययाद्वक्रगतैः ग्रहैः ज्ञेयः समागमः ॥१५॥
अनुवाद—(१४) पहले जिस तरह युतिकालिक ग्रहों का दिनमान और
रात्रिमान जानने को कहा गया है उसी तरह नक्षत्रों का भी दिनमान और रात्रिमान
साधन करके उनका आक्षदृक्कर्म संस्कार करना चाहिये । इसके पश्चात् जैसे ग्रहों का
परस्पर युतिकाल और युतिस्थान जाना जाता है उसी तरह केवल ग्रह की गति से
ग्रह और नक्षत्र का युतिकाल और युतिस्थान जान लेना चाहिये । (१५) यदि ग्रह
का आयन-आक्ष-दृक्कर्म-संस्कृत भोग नक्षत्र के आक्षदृक्कर्म-संस्कृत ध्रुवक से कम हो
तो समझना चाहिये कि नक्षत्र और ग्रह का योग होने वाला है और यदि अधिक हो
तो समझना चाहिये कि योग हो चुका है । परन्तु यदि ग्रह वक्री हो तो इसका उलटा
समझना चाहिये ।
विज्ञान भाष्य—इन दोनों श्लोकों में जो नियम बतलाये गये हैं उनकी
व्याख्या ग्रहयुत्यधिकार में आ चुकी है । यहां ग्रह का तो आयन और आक्ष दोनों
दृकर्म करने को कहा गया है परन्तु नक्षत्र का केवल आक्षदृक्कर्म करने को कहा गया
है । इसका कारण स्पष्ट है । क्योंकि ग्रह का जो भोगांश स्पष्टाधिकार के अनुसार
आता है वह कदम्बाभिमुख होता है इसलिए उसमें आयन-दृक्कर्म का संस्कार करने
से वह ध्रुवाभिमुख होता है । अब यदि इसमें आक्षदृक्कर्मका संस्कार किया
जाय तो इसका भोगांश समप्रोतवृत्त में आता है । परन्तु नक्षत्रों के जो ध्रुवक
१. रोहिणी शकटमर्कनंदनी यदि भिनत्ति रुधिरोथवा शशी ।
किं वदामि यदि नष्टसागरे जगदशेषमुपयाति संक्षये ॥३५॥
—बृहत्संहिता ३४ अध्याय
२. कभशकटमसौ भिनत्त्यसृक् शनिरुडुयो यदि चेज्जनक्षयः ॥७॥
भौमकर्योः शकटभिदा युगान्तरे स्यात् सेदानीं न हि भवतीदृशि
स्वपाते ॥८॥
—ग्रहलाघव, नक्षत्रच्छायाधिकार
६२२ सूर्य-सिद्धान्त
दिये गये हैं वे ध्रुवाभिमुख हैं इसलिए इनमें केवल आक्षदृक्कर्म का संस्कार
करने की आवश्यकता पड़ती है । इस प्रकार ग्रह और नक्षत्र के भोगों में किसी
इष्टकाल में जो अंतर होता है उसको ग्रह की दैनिक गति से भाग देने पर यह जाना
जाता है कि कितने समय में ग्रह का नक्षत्र से योग होगा या होने वाला है । और
सब बातें ग्रहयुत्यधिकार में बतलाये गये नियम के अनुसार ही समझनी चाहिए ।
यहाँ सुगमता यह है कि नक्षत्र स्थिर होते हैं इसलिए केवल एक ग्रह के सम्बन्ध की
गणना करनी पड़ती है ।
नक्षत्रों के योगतारों के पहचानने की रीति—
फल्गुन्योः भाद्रपदयोः तथैवाऽऽषाढयोर्द्वयोः ।
विशाखाश्विनिसौम्यानां योगतारा तथोत्तरा ॥१६॥
पश्चिमोत्तरतारा या द्वितीया पश्चिमे स्थिता ।
हस्तस्य योगताराऽसौ श्रविष्ठायाश्च पश्चिमा ॥१७॥
ज्येष्ठाश्रवणमैत्राणां बार्हस्पत्यस्य मध्यमा ।
भरण्याग्नेयपित्र्याणां रेवत्याश्चापि दक्षिणा ॥१८॥
रोहिण्यादित्यमूलानां प्राची सार्पस्य चैव हि ।
यथाप्रधानं शेषाणां स्थूलास्स्युर्ध्रुवतारकाः ॥१९॥
पूर्वस्यां ब्रह्महृदयादंशकैः पञ्चभिः स्थितः ।
प्रजापतिर्वृषान्तेऽसौ सौम्ये अष्टात्रिंशदंशकैः ॥२०॥
अपांवत्सस्तु चित्राया उत्तरेऽशंश्च पञ्चभिः ।
बृहत्किञ्चिदतो भागैरापष्षड्भिस्तथोत्तरे ॥२१॥
इत्यष्टमोध्याय :
अनुवाद—(१६) पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, पूर्वाभाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद,
पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, विशाखा, अश्विनी और मृगशिरा नक्षत्रों में से प्रत्येक नक्षत्र
का उत्तरवाला तारा उस नक्षत्र का योग तारा है । (१६) हस्तनक्षत्र के पश्चिमोत्तर
दिशा में जो दो तारे हैं । उनमें दूसरा पच्छिमवाला तारा इस नक्षत्र का योगतारा है
और धनिष्ठा नक्षत्र के दो उत्तरवाले तारों में भी पच्छिमवाला तारा योग तारा है ।
(१८) ज्येष्ठा, श्रवण, अनुराधा और पुष्य नक्षत्रों के बीचवाले तारे प्रत्येक के योग
तारे हैं । भरणी, कृत्तिका, मघा और रेवती नक्षत्र के दक्षिणवाला तारा प्रत्येक
नक्षत्र का योग तारा है । (१६) रोहिणी, पुनर्वसु, मूल और आश्लेषा नक्षत्र का
पूर्ववाला तारा प्रत्येक का योग तारा है । २८ नक्षत्रों में से अब जितने शेष हैं, उनमें
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६२३
अर्थात् आर्द्रा, चित्रा, स्वाती, अभिजित और शतभिषक् नक्षत्रों में प्रत्येक नक्षत्रों का
सबसे बड़ा तारा उस नक्षत्र का योग तारा है। (२०) ब्रह्महृदय तारे से ५ अंश
पूर्व की ओर प्रजापति नामक तारा वृष के अंत में है। इसका उत्तर विक्षेपांश ३८
है। (२१) चित्रा तारे से ५ अंश उत्तर की ओर अपांवत्स तारा है जिससे ६ अंश
उत्तर कुछ बड़ा आप नामक तारा है।
विज्ञान भाष्य-१६-१८ श्लोकों में यह बतलाया गया है कि प्रत्येक नक्षत्र
में कौन तारा मुख्य माना गया है जिसके ध्रुवक और शर पहले बतलाये गये हैं।
ऐसे मुख्य तारे को योगतारा कहा गया है। आजकल इन योगताराओं के सम्बन्ध
में विद्वानों में कुछ मतभेद है। आगे एक सारणी दी जायगी जिससे पता चलेगा कि
आजकल कौन विद्वान् किस तारे को योगतारा मानता है। नक्षत्र के लिए कभी-कभी
उनके देवताओं के नामों का प्रयोग किया गया है इसलिए सुविधा के लिए यह भी
बतलाया जायगा कि किस नक्षत्र का स्वामी कौन देवता है तथा प्रत्येक नक्षत्र में
कितने तारे हैं। तारों की संख्याओं में प्राचीन आचार्यों में भी मतभेद है जैसा कि
सारणी से पता चलेगा।
ब्रह्महृदय का ध्रुवक १ राशि २२ अंश बतलाया गया है। इससे ५ अंश पूर्व
प्रजापति तारा है। इसलिए प्रजापति का ध्रुवक १ राशि २७ अंश है। श्लोक में
बतलाया गया है कि प्रजापति वृषराशि के अंत में है परन्तु इसका अर्थ यही लेना
चाहिये कि यह वृषराशि के अंत के पास है। चित्रा तारे का दक्षिण शर २ है और
अपांवत्स तारा चित्रा से ५ अंश उत्तर है इसलिए अपांवत्स का उत्तर शर ३ अंश हुआ।
आप तारा अपांवत्स से ६ अंश उत्तर है इसलिए इसका उत्तर शर ६ अंश हुआ।
तारों और नक्षत्रों की पहचान के लिए ४ आकाश-चित्र दिये जायेंगे जिनसे
यह सहज ही जाना जा सकता है कि कौन नक्षत्र किस समय आकाश में कहां देख
पड़ता है।
इन सारणियों में तारों के अङ्गरेजी नाम विलक्षण ढंग से दिये हुए हैं इस-
लिये यह बतला देना आवश्यक है कि ये नाम किस प्रकार रखे गये हैं। अङ्गरेजी में
तारा-पुञ्जों के जो नाम प्रचलित हैं वह अधिकतर लैटिन और यूनानी ( Greek )
भाषा से लिए गये हैं। प्रत्येक तारापुंज के नाम के पहले कोई यूनानी अक्षर जोड़
कर रखा गया है। इन अक्षरों का क्रम अधिकतर इस प्रकार रखा गया है कि उस
पुंज में जो तारा सबसे चमकीला और बड़ा है उसका नाम पहले अक्षर 'अल्फा' से
प्रकट किया गया है। उसके बाद जो तारा उससे छोटा है उसका नाम दूसरे अक्षर
‘बीटा’ से प्रकट किया गया है, इत्यादि। कुछ प्रधान तारों के नाम इस तरह तो
६२४ सूर्य-सिद्धान्त
नक्षत्र के देवता
(मुहूर्त चिंतामणि तथा भारतीय
| क्रम संख्या | नक्षत्रों के नाम | नक्षत्र के स्वामी या देवता | तैत्तिरीय संहिता | नक्षत्र कल्प | वृद्धगार्गीय संहिता | नारद संहिता | बराह मिहिर | खंडखाद्यक |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | अश्विनी | अश्विनी कुमार | २ | २ | २ | ३ | ३ | २ |
| २ | भरणी | यम | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | |
| ३ | कृत्तिका | अग्नि | ७ | ६ | ६ | ६ | ६ | ६ |
| ४ | रोहिणी | ब्रह्मा | १ | ५ | ५ | ५ | ५ | |
| ५ | मृगशिरा | चन्द्रमा | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | |
| ६ | आर्द्रा | रुद्र | १या२ | १ | १ | १ | १ | १ |
| ७ | पुनर्वसु | अदिति | २ | २ | २ | ४ | ५ | २ |
| ८ | पुष्य | बृहस्पति | १ | १ | १ | ३ | ३ | १ |
| ९ | आश्लेषा | सर्प | ६ | ६ | ५ | ६ | ६ | |
| १० | मघा | पितर | ६ | ६ | ५ | ५ | ६ | |
| ११ | पूर्वा फाल्गुनी | भग | २ | २ | २ | २ | ८ | २ |
| १२ | उत्तरा फाल्गुनी | अर्यमा | २ | २ | २ | २ | २ | २ |
| १३ | हस्त | सूर्य | ५ | ५ | ५ | ५ | ५ | |
| १४ | चित्रा | विश्वकर्मा | १ | १ | १ | १ | १ | १ |
| १५ | स्वाती | पवन | १ | १ | १ | १ | १ | १ |
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६२५
और तारों की संख्या
ज्योतिषशास्त्र पृष्ठ ४५८)
| लल्लकृत रत्नकोश | शाकल्य ब्रह्मसिद्धान्त | श्रीपतिकृत रत्नमाला | मुहूर्त्त तत्व | मुहूर्त्त चिन्तामणि | नक्षत्र के तारों के नाम Kaye के Hindu Astronomy के अनुसार |
|---|---|---|---|---|---|
| ३ | २ | ३ | ३ | ३ | β, γ Arietis |
| ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | 35, 39, 41 Arietis |
| ६ | ६ | ६ | ६ | ६ | .η Tauri, etc. |
| ५ | ५ | ५ | ५ | ५ | α, θ γ, δ, ∈ Tauri |
| ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | λ, ϕ₁, ϕ₂ Orionis |
| १ | १ | १ | १ | १ | α Orionis |
| ४ | २ | ४ | ४ | ४ | β, α Geminorum |
| ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | θ, δ, γ Cancri |
| ५ | ५ | ५ | ५ | ५ | ∈, δ, σ, η, ρ Hydrae |
| ५ | ५ | ५ | ५ | ५ | α, η, γ, γ, l, μ, ∈, Leonis |
| २ | २ | २. | २ | २ | δ, θ Leonis |
| २ | २ | २ | २ | २ | β, 93 Leonis |
| ५ | ५ | ५ | ५ | ५ | δ, γ, ∈, α, β Corvi |
| १ | १ | १ | १ | १ | α Virginis |
| १ | १ | १ | १ | १ | . α Bootis |
. ६२६ सूर्य-सिद्धान्त
| क्रम संख्या | नक्षत्रों के नाम | नक्षत्रों के स्वामी या देवता | तैत्तिरीय संहिता | नक्षत्रकल्प | वृद्ध गार्गीय संहिता | नारद संहिता | बराह मिहिर | खंड खाद्यक |
| १६ | विशाखा | इन्द्र, अग्नि | २ | २ | २ | २ | ५ | २ |
| १७ | अनुराधा | मित्र | | ४ | ४ | ४ | ४ | ४ |
| १८ | ज्येष्ठा | इन्द्र | १ | | ३ | ३ | ३ | ३ |
| १९ | मूल | राक्षस | १या२ | | ६ | ११ | ११ | २ |
| २० | पूर्वाषाढ़ | जल | | ४ | ४ | ४ | २ | ४ |
| २१ | उत्तराषाढ़ | विश्वदेव | | ४ | ४ | २ | ८ | ४ |
| | अभिजित | ब्रह्मा | १ | | ३ | | | ३ |
| २२ | श्रवण | विष्णु | १ | ३ | ३ | | ३ | ३ |
| २३ | धनिष्ठा | वसु | ४ | ५ | ४ | | | ५ |
| २४ | शतभिषक | वरुण | १ | १ | १ | १०० | १०० | १ |
| २५ | पूर्वा भाद्रपद | अजपाद | | २ | २ | २ | २ | २ |
| २६ | उत्तरा भाद्रपद | अहिर्बुध्न्य | ४ | २ | २ | २ | ८ | २ |
| २७ | रेवती | पूषा | १ | १ | ४ | ३२ | ३२ | १ |
नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६२७
लल्ल कृत रत्नकोश | शाकल्य ब्रह्म सिद्धान्त | श्रीपति कृत रत्नमाला | मुहूर्त तत्व | मुहूर्त चिन्ता मणि | नक्षत्र के तारों के नाम Kaye के Hindu Astronomy के अनुसार
४ | २ | ४ | ४ | ४ | γ, β, α, l Librae
४ | ३ | ४ | ४ | ४ | δ, β, π Scorpii
३ | ३ | ३ | ३ | ३ | α, σ, L Scropii
११ | ६ | ११ | ११ | ११ | λ, μ, x, L θ, ∈ Scorpii
२ | ४ | ४ | ४ | २ | δ, ∈, Sagittarii
२ | ४ | ४ | ३ | २ | 6, ζ Sagittarii
३ | ३ | ३ | ३ | ३ | α, ∈, ζ Lyrae
३ | ३ | ३ | ३ | ३ | α, β, γ, Aquilae
४ | ५ | ४ | ४ | ४ | β, α, γ, δ Delphini
१०० | १०० | १०० | १०० | १०० | λ Aquarii, etc.
२ | २ | २ | २ | २ | α, β Pegasi
२ | २ | २ | २ | २ | γ Pegasi, α Andromedae
३२ | ३२ | ३२ | ३२ | ३२ | γ Pisceium, etc.
६२८
किस नक्षत्र का कौन तारा योगतारा है (भारतीय ज्योतिष शास्त्र पृष्ठ ४५६)
सूर्य-सिद्धान्त
| क्रम संख्या | नक्षत्र का नाम | कोलब्रुक के मत से | बेंटली और केरोपंत के मत से | व्हिटने और बर्जेस के मत से | बापूदेव के मत से | वें. बा. केत-कर के मत से | शंकर बाल-कृष्ण दीक्षित के मत से | चंद्रशेखर सिंह सामंत का सिद्धान्त दर्पणभूमिका पृ० ५६, ५७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | अश्विनी | $\alpha$ Arietis | $\beta$ Arietis | $\beta$ Arietis | $\alpha$ Arietis | $\beta$ Arietis | $\beta$ Arietis | $\alpha$ Arietis |
| २ | भरणी | $\mu$ or 35, Arietis | 35 Arietis | 35 Arietis | 35 Arietis | 41 Arietis | 41 Arietis | 41 Arietis |
| ३ | कृत्तिका | $\eta$ Tauri | $\eta$ Tauri | $\eta$ Tauri | $\eta$ Tauri | $\eta$ Tauri | $\eta$ Tauri | $\eta$ Tauri |
| ४ | रोहिणी | $\alpha$ Tauri अर्थात् Aldebaran | Aldebaran | Aldebaran | Aldebaran | Aldebaran | Aldebaran | Aldebaran |
| ५ | मृगशिरा | $\lambda$ Orionis | 116 Tauri | $\lambda$ orionis | $\lambda$ orionis | $\lambda$ orionis | $\lambda$ orionis | $\lambda$ orionis |
| ६ | आर्द्रा | $\alpha$ Orionis | 133 Tauri | $\alpha$ orionis | $\alpha$ orionis | $\alpha$ orionis | $\gamma$ Gemino-rum | $\alpha$ orionis |
| ७ | पुनर्वसु | Pollux अर्थात् $\beta$ Geminorum | Pollux | Pollux | Pollux | Pollux | Pollux | $\beta$ Gemino-rum |
| ८ | पुष्य | $\delta$ cancri | $\delta$ cancri | $\delta$ cancri | $\delta$ cancri | $\delta$ cancri | $\delta$ cancri | Proesepe |