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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 634

नक्षत्रग्रहयुत्यधिकार ६०६
भिन्नता (२) अश्विनी के आदि विन्दु की स्थिति के निश्चय करने में भिन्नता (३)
योग तारों के निश्चय में भिन्नता और (४) सम्पात विन्दु की गति । पहला कारण
तो स्पष्ट है क्योंकि वेध यन्त्रों की स्थूलता के कारण वेध के फलों में भिन्नता
स्वाभाविक है। दूसरा कारण भी विशेष महत्व का है। इससे यह जान पड़ता है कि
अश्विनी के आदि विन्दु के निश्चय में पुराने आचार्यों में भी मतभेद था जैसा कि
आजकल है। परन्तु इस मतभिन्नता से आजकल संक्रान्तियों और मलमासों के
निश्चय करने में बड़ी कठिनाई उपस्थित हो रही है जिससे अखिल भारतीय तिथियों
और पर्वों की स्थिरता ही नहीं हो सकती । इस बात पर सब प्रान्तों के ज्योतिषाचार्यों
में एकता हो जाय तो बड़ा भारी काम हो जायगा और इसके उद्योग में जो सज्जन तन
मन धन लगावेंगे वे बड़े पुण्य के भागी होंगे । महाराष्ट्र और गुजरात प्रान्तों में इसके
सम्बन्ध में बहुत दिनों से उद्योग हो रहा है परन्तु अभी तक कुछ निश्चय नहीं हुआ ।
इसी प्रकार सम्पात विन्दु की गति के कारण तारों के ध्रुवों और विक्षेपों में
अन्तर पड़ता जाता है यद्यपि इनके कदम्बाभिमुख भोगों और शरों में स्थिरता रहती है।
अब १०-१२ श्लोकों में बतलाये गये तारों के ध्रुवक और विक्षेप देकर
कई सारणियों में यह बतलाने का उद्योग किया जायगा कि तारों के ध्रुवांशों के
सम्बन्ध में प्राचीन और अर्वाचीन आचार्यों के क्या मत हैं।
अशीतिभागं र्यस्यायामगस्त्यो मिथुनान्तगः ।
विंशे च मिथुनस्यांशे मृगव्याधो व्यवस्थितः ॥१०॥
विक्षिप्तो दक्षिणे भागैः खार्णवैस्त्वावपक्रमात् ।
हुतभुग्ब्रह्म हृदयौ वृषद्वाविंशभागगौ ॥११॥
अष्टाभिः त्रिंशता चैव विक्षिप्तावुत्तरेण तौ ।
गोलं बद्ध्वोपरिक्षेत्रं विक्षेपध्रुवकान् स्फुटान् ॥१२॥
अनुवाद-(१०) अगस्त्य तारे का ध्रुव मिथुन राशि के अन्त में अर्थात्
६० अंश और दक्षिण विक्षेप ८० अंश है। मृगव्याध अथवा लुब्धक तारे का ध्रुव
मिथुन के २० अंश पर अर्थात् ८० अंश है। (११) इसका विक्षेप क्रान्तिवृत्त से
दक्षिण ४० अंश पर है। अग्नि और ब्रह्महृदय दोनों तारों के ध्रुव वृषराशि के २२
अंश पर अर्थात् ५२ अंश हैं। (१२) इनके विक्षेप क्रम से ८ अंश और ३० अंश
क्रान्तिवृत्त से उत्तर की ओर हैं। गोलयंत्र के द्वारा इन स्फुटविक्षेपों और ध्रुवकों की
परीक्षा करना चाहिए ।
विज्ञान-भाष्य-१२ वें श्लोक का उत्तरार्ध बड़े महत्व का है। इससे यह
सिद्ध होता है कि हमारे आचार्यों को लकोर का फकीर होना इष्ट नहीं था इसीलिए