सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाष्यकार की भूमिका
[ स्व० श्री महावीर प्रसाद श्रीवास्तव द्वारा लिखित
भूमिका का संक्षिप्त अंश ]
ज्योतिषशास्त्र वेद का प्रधान अंग है क्योंकि इसी से यज्ञों का समय निश्चित
किया जाता है। इसलिए प्राचीन काल में भारतवर्ष में ज्योतिषशास्त्र का अध्ययन-
अध्यापन पुण्यकार्य समझा जाता था। इसका दूसरा नाम कालविधानशास्त्र अथवा
कालज्ञान भी है। कश्यप संहिता के अनुसार ज्योतिषशास्त्र के प्रवर्तक १८ आचार्य
थे जिनके नाम यह हैं :—
१—सूर्य, २—पितामह, ३—व्यास, ४—वसिष्ठ, ५—अत्रि, ६—पराशर,
७—कश्यप, ८—नारद, ९—गर्ग, १०—मरीचि, ११—मनु, १२—अंगिरा,
१३—लोमश, १४—पौलिश, १५—च्यवन, १६—यवन, १७—भृगु और १८—
शौनक।
यहां जो १८ नाम गिनाये गये हैं उन सब के सिद्धान्त-ग्रन्थों का पता नहीं
है। इनमें कई संहिता और सिद्धान्त दोनों के कर्ता हैं, कोई दोनों में केवल एक ही
विषय के हैं, किसी के नाम का ग्रन्थ दोनों विषयों पर भी नहीं उपलब्ध है।
जिन प्राचीन सिद्धान्तों की चर्चा वराहमिहिर के समय से अब तक होती
आयी है वे हैं १—पौलिश, २—रोमक, ३—वासिष्ठ, ४—सौर, और ५—पैतामह
सिद्धान्त, जिनका संग्रह वराहमिहिर ने (५५० ई० के लगभग) अपनी पंच-सिद्धांतिका
नामक पुस्तक में किया है जिसमें यह भी बतलाया है कि पौलिश सिद्धान्त स्पष्ट है,
उसी के निकट रोमक-सिद्धान्त है, परन्तु सबसे स्पष्ट सूर्य-सिद्धान्त है, शेष दो बहुत
भ्रष्ट है। पंचसिद्धान्तिका-प्रकाशिका टीका के पृष्ठ २ पर म० म० सुधाकर
द्विवेदी जी सूर्यारुण-संवाद का अवतरण देकर कहते हैं कि गर्गादि मुनियों का जो
ज्ञान पुलिश महर्षि ने कहा वह पौलिश सिद्धान्त, ब्रह्मशाप के कारण रोमक नगर में
उत्पन्न होकर, सूर्य भगवान ने जो ज्ञान रोमक के यवन जाति को बतलाया वह रोमक
सिद्धान्त, जिसे वसिष्ट ने अपने पुत्र पराशर को दिया वह वसिष्ट सिद्धान्त, जिसे
सूर्य ने मय दैत्य को दिया वह सौर-सिद्धान्त और जिसे ब्रह्मा ने अपने पुत्र वसिष्ठ को
दिया वह पैतामह-सिद्धान्त है।
यह सूर्यारुण संवाद कहाँ से लिया गया यह नहीं बतलाया गया है। इसके
अनुसार रोमक सिद्धान्त और सौर-सिद्धान्त दोनों के उपदेशक सूर्य भगवान् हैं। पहला