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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 827

८०२ सूर्य-सिद्धान्त
नक्षत्रों से दो दो के साथ होता है, केवल अन्तिम मास और उससे ठीक पहले का
मास तथा पांचवे मासों का संयोग तीन तीन नक्षत्रों से होता है ।
विज्ञान भाष्य—नाक्षत्र दिन की व्याख्या पृष्ठ ७, ३००-३०१, और ३३६
में की गयी है । चान्द्र मासों के नाम उन नक्षत्रों के नाम पर रखे गये हैं जिन पर
चंद्रमा पूर्णमा के दिन रहता है । इस युक्ति से तिथि, मास और नक्षत्रों का जो
गठबंधन कर दिया गया है वह संसार के ज्योतिष के इतिहास में अनुपम है । इससे
यह अच्छी तरह सिद्ध हो जाता है कि प्राचीन काल में हिन्दू ज्योतिषी कितने प्रतिभा-
वान थे और उनपर दूसरे देशों के ज्योतिष शास्त्र के नकल करने का जो अभियोग
लगाया जाता है वह कितना निस्सार और पक्षपात पूर्ण है । अब सूक्ष्म गणना से यह
अवश्य सिद्ध होता है कि नक्षत्रों और मासों का यह परस्पर सम्बन्ध कभी-कभी छूट
जाता है परन्तु यहाँ यह भी विचार करना होगा कि जो नियम तीन हजार वर्ष से
अधिक समय से चला आ रहा है उसका कहीं कहीं ढीला पड़ जाना अचंभे की बात
नहीं है और न नियम बनानेवालों की ही अनभिज्ञता का प्रमाण हैं । पृष्ठ ५५७-५८
में दी हुई सारणी से यह सहज ही जाना जा सकता है कि इस समय कितना अंतर
पड़ गया है ।
इस सारिणी में १६६४-६५ वि० के नीचे के नक्षत्र बंगला के विशुद्ध
सिद्धान्त-पञ्जिका से लिखे गये हैं जो आधुनिक ज्योतिषशास्त्र के आधार पर बनायी
जाती है, जिसमें वर्षमान् ३६५ दिन ६ घंटा ६ मिनट ६-५०४ सेकंड का होता है
और चित्रा तारे का भोग ठीक १८० अंश माना गया है। शेष तीन वर्षों के नक्षत्र
लखनऊ और काशी के साधारण पंचांगों से लिये गये हैं। जिन नक्षत्रों पर धन के
चिह्न बने हुए हैं वही उपर्युक्त नियम से कुछ भिन्न हो गये हैं। जहाँ दो नक्षत्र एक
साथ दिये हैं वे अधिमासों के सूचक हैं। इससे प्रकट है कि अब भी यह नियम अच्छी
तरह काम दे रहा है ।
वार्हस्पत्य वर्ष के नाम—
वैशाखादिषु कृष्णेः च योगः पञ्चदशे तिथौ ।
कार्तिकादीनि वर्षेषु गुरोर्युक्तोदयास्तमात् ॥१७॥
अनुवाद—(जिस प्रकार चन्द्रमा के पूर्णमान्त काल के नक्षत्रों के नाम से
चान्द्रमासों के नाम पड़े हैं इसी प्रकार) वैशाखादि मासों के कृष्णपक्ष की पन्द्रहवीं
तिथि के योग में वृहस्पति के अस्त और उदय होने से इसके कार्तिकादि वर्षों के नाम
रखे गये हैं।