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सर्वकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 755, कुल 838 में से

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पृष्ठ 755

७३० सूर्य-सिद्धान्त
और दक्षिणी सिरा दक्षिणी ध्रुव कहलाते हैं। इसी अक्ष के मध्य अर्थात् भूकेन्द्र के
चारों ओर समान पूरी पर विषुवत रेखा मानी गयी है जो जम्बूद्वीप और लवण
समुद्र की सीमा समझी गयी थी ।
विषुवत् रेखा और उत्तर दक्षिण ध्रुवों का सम्बन्ध
मेरोरुभयतो मध्ये ध्रुवतारे नभःस्थिते ।
निरक्षदेशसंस्थानामुभये क्षितिजाश्रिये ॥४३॥
अतो नाक्षोच्छ्रयस्तासु ध्रुवयोः क्षितिजस्थयोः ।
नवतिर्लम्बकांशास्तु मेरावक्षांशकास्तथा ॥४४॥
मेषादौ देवभागस्थे देवानां याति दर्शनम् ।
असुराणां तुलादौ तु सूर्यस्तद्भागसञ्चरः ॥४५।
अनुवाद—(४३) मेरु के दोनों ओर अर्थात् उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों की
तरफ आकाश में स्थित ध्रुव तारे ठीक ख मध्य में हैं; निरक्ष देश में रहने वालों को
ये दोनों तारे क्षितिज में देख पड़ते हैं। (४४) इसलिये इन नगरियों की क्षितिज रेखा
पर दोनों ध्रुवतारों के होने के कारण इन पुरियों का अक्ष ऊँचा नहीं है अर्थात् इनका
अक्षांश शून्य है परन्तु लम्बांश ६० है। इसी प्रकार मेरुओं का अर्थात् ध्रुवों का अक्षांश
६० है । (४५) सूर्य जब देव-भाग में अर्थात् उत्तरी गोलार्द्ध में रहता है तब मेष के
आदि स्थान में देवताओं को उसका प्रथम दर्शन होता है और जब सूर्य असुर भाग में
अर्थात् दक्षिणी गोलार्द्ध में रहता है तब तुला के आदि में वह असुरों को पहले पहल
देख पड़ता है।
विज्ञान-भाष्य—यहाँ बतलाया गया है कि उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के
ख मध्य में ध्रुव तारे हैं जो निरक्ष देश की क्षितिज पर हैं। इससे यह अनुमान किया
जा सकता है कि प्राचीन काल में जब सूर्य-सिद्धान्त कहा गया था तब दो ध्रुव तारे
रहे होंगे। यह भी कहा जा सकता है कि जैसे उत्तरी ध्रुव के ख मध्य में एक तारा
है वैसे ही दक्षिणी ध्रुव के ख मध्य में भी एक तारा समझा गया होगा । परन्तु यह
निश्चय है कि उत्तरी ध्रुव के ख मध्य में इस समय जो तारा देख पड़ता है वह
प्राचीन काल में इस स्थान पर नहीं था क्योंकि अयन-चलन के कारण इसका स्थान
भी बदल रहा है (देखो पृष्ठ २४०-४२) । इसलिए यहाँ जिन ध्रुव तारों का वर्णन
है वे आकाशीय ध्रुवों के स्थान हैं जो उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के ख मध्य में हैं ।
इनसे किसी तारे का सनातन सम्बन्ध नहीं है । जब अयन-चलन के कारण कोई
तारा इनके पास आ जाता है तब यह भी प्रत्यक्ष में ध्रुव तारा कहलाने लगता है ।
यह कई जगह बतलाया जा चुका है कि विषुवत् रेखा पर अक्षांश शून्य और