सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूगोलाध्याय ७२६
हैं। (४१) यह नगरियां एक दूसरे से भूपरिधि के चतुर्थांश अन्तर पर स्थित हैं
जिनके उत्तर दिशा में उतने ही अन्तर पर का निवास स्थान मेरु है। (४२) जब
सूर्य विषुवद्वृत्त पर आता है तब इन नगरियों के ठीक ऊपर होता है इसलिए
न वहाँ विषुवच्छाया होती है और न अक्षांश ही होता है।
विज्ञान-भाष्य – इन छः श्लोकों में विषुवत् रेखा पर स्थित चार नगरियों
की स्थिति का बड़ा ही स्पष्ट वर्णन है। ये नगरियां एक दूसरे से भूपरिधि के चतुर्थांश
अन्तर पर हैं अर्थात् यह एक दूसरे से ६० अंश के अन्तर पर हैं और उत्तर मेरु
(उत्तरी ध्रुव) भी इतने ही अन्तर पर इनसे उत्तर में है। इन नगरियों की दिशायें
भारतवर्ष से मानी गयी हैं। भारतवर्ष के दक्षिण विषुवत् रेखा पर लङ्का नगरी है
जिसका स्थान मध्यमाधिकार के ६२ वें श्लोक अनुसार के उज्जैन की देशान्तर रेखा
माना जाना चाहिए (पृष्ठ ६५) । ग्रीनविच से उज्जैन का देशान्तर ७६ अंश के
लगभग है। इसलिये यदि लङ्का इसी देशान्तर पर और विषुत् रेखा पर मानी जाय
तो आजकल यहाँ समुद्र है। इससे ६० अंश पूर्व का स्थान ग्रीनविच से १६६ अंश
पूर्व देशान्तर पर है। इसलिए यमकोटी नगरी की जगह भी आजकल समुद्र है ।
लङ्का से ६० अंश पच्छिम अथवा ग्रीनविच से १४ अंश पच्छिम देशान्तर पर भी विषुवत्
रेखा पर स्थल का नाम नहीं हैं इसलिए रोमक नगरी का भी पता नहीं लगाया जा
सकता । यह रोमक नगरी आजकल के पच्छिमी अफ्रीका के फ्रीटाउन से ५० मील
के लगभग दक्षिण रही होगी । इसी प्रकार सिद्धपुरी वर्तमान् मेक्सिको से १०००
मील से भी अधिक दक्षिण रही होगी ।
यदि इन चार पुरियों का अस्तित्व कभी रहा होगा तो वह काल बहुत ही
प्राचीन होगा क्योंकि आजकल तो इतना अन्तर पड़ गया है कि उस काल का कोई
चिह्न वर्तमान नहीं है। यह भी सम्भव है कि इन चार पुरियों का अस्तित्व कवि
की कल्पना में ही रहा हो और आलंकारिक भाषा में इस बात का वर्णन किया
गया हो कि विषुवत् रेखा पर ये चार स्थान ऐसे हैं कि जब लङ्का में मध्याह्न होता
है तब रोमक में सूर्योदय, सिद्धपुरी में मध्यरात्रि और यमकोटि में सूर्यास्त ।
यह तो स्पष्ट ही है कि जब सूर्य विषुवत् रेखा के खस्वस्तिक पर रहता है
तब वहां मध्याह्नकाल में किसी खड़ी वस्तु की कोई छाया नहीं पड़ती। इस रेखा
के क्षितिज पर उत्तर और दक्षिण ध्रुव हैं इसलिए यहाँ ध्रुव तारे की ऊँचाई शून्य
होती है। इसलिए अक्षांश भी शून्य होता है। इसी कारण विषुवत् रेखा को निरक्ष
देश कहा गया है। इसका और स्पष्ट वर्णन अगले तीन श्लोकों में है।
मेरु पृथिवी के बीच से होता हुआ दोनों ओर निकला हुआ बतलाया गया
है इसलिए इसे पृथिवी का अक्ष समझना चाहिए जिसका उत्तरी सिरा उत्तरी ध्रुव
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