सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२० सूर्य-सिद्धान्त
अनुवाद—(१) इसके उपरान्त मयासुर ने सूर्य के अंश से उत्पन्न हुए पुरुष
को हाथ जोड़ कर प्रणाम करके और बड़ी भक्ति से पूजा करके यह पूछा । (२) हे
भगवन्, इस पृथ्वी का परिमाण क्या है, इसका आकार कैसा है और यह किस के
आधार पर है, इसके कितने विभाग हैं और इसमें सात पातालों की भूमि कैसे स्थित
है । (३) सूर्य अहोरात्र की व्यवस्था कैसे करते हैं और भुवनों को प्रकाशित करते हुए
पृथ्वी के चारों ओर कैसे घूमते हैं। (४) देवताओं और असुरों के दिन-रात एक
दूसरे के विपरीत क्यों होते हैं और सूर्य का एक भगण (चक्कर) पूरा होने पर यह
कैसे होता है । (५) पितरों का दिन-रात एक मास का और मनुष्यों का ६० घड़ियों
का क्यों होता है । सब जगह एक ही प्रकार के दिन-रात क्यों नहीं होते । (६) दिन,
वर्ष, मास और होरा (घंटा) के स्वामी समान क्यों नहीं होते, ग्रहों के साथ नक्षत्र
मंडल कैसे घूमता है और इनका आधार क्या है । (७) ग्रहों और नक्षत्रों की कक्षाएँ
पृथ्वी से ऊपर कितनी कितनी ऊँचाई पर तथा परस्पर कितने अन्तर पर हैं, इनके
मान क्या हैं और ये किस क्रम से स्थित हैं। (८) ग्रीष्म ऋतु में सूर्य कि किरणें बहुत
तीव्र क्यों होती हैं और हेमन्त ऋतु में वैसी क्यों नहीं होतीं । यह किरणें कितनी दूर
दूर तक जाती हैं; सौर, चन्द्र आदि मान कितने हैं और इनसे क्या प्रयोजन निकलता
है । (६) हे भूतभावन, भगवन् मेरी इन शंकाओं को दूर कीजिये क्योंकि आप सर्वज्ञ
हैं इसलिये आपके सिवा दूसरा मनुष्य मेरी शंकाओं को नहीं दूर कर सकता (१०)
भक्ति से कहे हुए मयासुर के इन वचनों को सुनकर सूर्यांश पुरुष ने उससे फिर पहले
के रहस्य स्वरूप दूसरा अध्याय कहा । (११) एकाग्रचित्त होकर यह अध्यात्म नामक
तत्व सुनो जिसे मैं कहता हूं क्योंकि भक्तों के लिए मैं कोई वस्तु अदेय नहीं समझता ।
विज्ञान-भाष्य—मयासुर ने जितने प्रश्न किये हैं उनका उत्तर जानने की
अभिलाषा सभी तत्वज्ञानियों को होती है । इस पर सूर्यांश पुरुष ने बतलाया है कि
उत्तर में जिस रहस्य का प्रतिपादन किया जायगा वह अध्यात्म ज्ञान से सम्बन्ध
रखता है । इस पर बहुत से लोग कह उठेंगे कि मयासुर के प्रश्नों का उत्तर तो कोई
भी ज्योतिषी और भूगोलशास्त्री दे सकता है । यह विचार कुछ दूर तक ठीक है
परन्तु सूर्यांश पुरुष ने इस संसार की उत्पत्ति की चर्चा की है वह तो अवश्य अध्यात्म
संबंधी ही कही जा सकती है क्योंकि यह भौतिक विज्ञान से परे की बात है ।
सृष्टि का क्रम—
वासुदेवः परं ब्रह्म तन्मूर्तिः पुरुषः परः ।
अव्यक्तो निर्गुणः शान्तः पञ्चविंशात्परोऽव्ययः ॥१२॥
प्रकृत्यन्तर्गतो देवः बोध्यमानश्च सर्वगः ।
संकर्षणोऽपः सृष्ट्वादौ तासुवीर्यमवासृजत् ॥१३॥