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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 729, कुल 838 में से

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पृष्ठ 729

७०४ सूर्य-सिद्धान्त
में हों और सूर्य वसंत-सम्पात से जितना आगे या पीछे हो उतना ही चन्द्रमा शरद
सम्पात से पीछे या आगे हो ।
दोनों पातों का स्वरूप और स्वभाव—
तुल्यांशुजालसंपर्कातयोस्तु प्रवाहातात् १ ।
तद्दृक्क्रोधभवो वह्निः लोकाभावाय जायते ॥३॥
विनाशयति पातोऽस्य लोकानामसकृद्यतः ।
व्यतीपातः प्रसिद्धोऽत्र संज्ञाभेदेन वैधृतः ॥४॥
स कृष्णो दारुणवपुः लोहिताक्षो महोदरः ।
सर्वानिष्टकरो रौद्रः भूयोभूयः प्रजायते ॥५॥
अनुवाद—(३) क्रान्ति-साम्य-कालिक सूर्य और चन्द्रमा की समान किरणों
के मिलने से और उनकी दृष्टि रूपी क्रोध से उत्पन्न अग्नि प्रवह वायु से प्रज्वलित
होकर संसार के लिए अशुभ फल उत्पन्न करती है। (४) जब सूर्य और चन्द्रमा की
क्रान्तियाँ समान होती हैं तब यह पात संसार को बारंबार नाश करता है। इसे
व्यतीपात और वैधृति कहते हैं । (५) यह पात रंग में काला, कठिन शरीरवाला, लाल
नेत्रोंवाला, बड़ा पेटवाला, सबका अशुभ करने वाला और भयंकर है और बार-बार
उत्पन्न होता है ।
विज्ञान भाष्य—इन तीन श्लोकों में दोनों पातों का बड़ा भयंकर चित्र
खींचा गया है परन्तु तो भी काशी के अच्छे-अच्छे पंचांगों में भी इनकी चर्चा बहुत कम
रहती है। बम्बई प्रान्त के भी पंचांगों में इनकी चर्चा नहीं देख पड़ती । हाँ, गुजराती
के 'प्रत्यक्ष पंचांग' में इसका विचार अवश्य रहता है । इससे जान पड़ता है कि सूर्य-
सिद्धान्त के इन महापातों का विचार फलित ज्योतिषी लोग बहुत कम करते हैं।
व्यतीपात और वैधृति नाम के योग भी होते हैं । पहले की क्रम संख्या १७
और दूसरे की २७ है । व्यतीपात नामक योग का सम्बन्ध व्यतीपात नामक पात से
कुछ भी नहीं है परन्तु वैधृत योग का सम्बन्ध इस नाम के पात से उस समय अवश्य
रहा होगा जब वसंत-संपात अश्विनी नक्षत्र के आदि स्थान में था ।
सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्ति कब निश्चय करनी चाहिए—
भास्करेन्द्वोर्भवक्रान्तश्चक्रार्धावधिसंस्थयोः ।
दृक्तुल्यसाधितांशादि युक्तयोः स्त्रावपक्रमौ ।।६।।
१. वेंकटेश्वर प्रेस वाले और बंगला संस्करण में प्रवाहतः पाठ है ।