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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 728, कुल 838 में से

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पृष्ठ 728

पाताधिकार ७०३

[चित्र १२०]

चन्द्रमा के एक फेरे के यह घटना कितनी बार हो सकती है। मान लो र सूर्य का
स्थान वसंत-सम्पात व और दक्षिणायन बिन्दु द के बीच में किसी जगह है। जब
चन्द्रमा भी र पर रहेगा अर्थात् अमावस्या के दिन, तब दोनों की क्रान्तियाँ एक
ही रहेंगी। जब चन्द्रमा च, चा और चि पर रहेगा तब भी दोनों की क्रान्ति समान
रहेंगी यदि वर = चश = शचा = चिव । परन्तु जब चन्द्रमा चा बिन्दु पर रहेगा
तब पूर्णिमा होगी। सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार पातकालिक क्रान्तिसाम्य के लिए
अमावस्या और पूर्णिमा के दिन का विचार नहीं किया जाता इसलिए जब चन्द्रमा
च और चि पर रहेगा तभी क्रान्ति साम्य का योग आवेगा ।

पहले श्लोक में बतलाया गया है कि जब सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों का
योग ३६० अंश हो तब वैधृति नामक पात होता है। यह दशा तभी हो सकती है
जब सूर्य र, च, चा या चि पर हो तो चन्द्रमा क्रम से चि, चा, च या र पर हो
क्योंकि तभी वसंत सम्पात व से सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों का योग ३६० अंश हो
सकता है। चित्र से स्पष्ट है कि र और चि स्थान उत्तरायण बिन्दु उ, वसंत सम्पात
व और दक्षिणायन बिन्दु द के बीच में है इसलिए र और चि दोनों उत्तरायण हैं।
इसी प्रकार च, चा दोनों दक्षिणायन हैं। इसीलिए पहले श्लोक में बतलाया गया है
कि जब सूर्य और चन्द्रमा एक अयन में हों और दोनों के (सायन) भोगांशों का योग
३६० अंश हो तभी वैधृति पात होता है। इसके प्रतिकूल जब दोनों भिन्न अयन में
हों और भोगांशों का योग १८० अंश हो तब व्यतीपात होता है। चित्र में यदि सूर्य
और चन्द्रमा र, च पर हों तो दोनों के भोगांशों का योग १८०° होगा और चा,
चि पर हों तो भी दोनों के भोगांशों का योग ३६० + १८० अंश अथवा १८० अंश
होगा । परन्तु र और च अथवा च और चि स्थान भिन्न अयनों में हैं, इसलिए
व्यतीतपात नामक क्रान्तिसाम्य योग तभी होता है जब सूर्य और चन्द्रमा भिन्न अयनों