सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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और नक्षत्रों का सूक्ष्म से सूक्ष्म वेध लेकर इनके मूलाङ्क फिर से स्थिर किये जायें।
ऐसे काम में भी नाविक पंचांग के आश्रित होना किसी प्रकार वांछनीय नहीं है।
चन्द्रमा का उदयास्त काल और कालांश—
उदयास्त विधिः प्राग्वत्कर्तव्यः शीतगोरपि ।
भागैर्द्वादशभिः पश्चाद् दृश्यः प्राग्यात्यदृश्यताम् ।।१।।
अनुवाद—(१) चन्द्रमा के भी उदय और अस्त होने का समय उदयास्ता-
धिकार के श्लोक ४, ५ में बतलायी गयी रीति से जानना चाहिए । जब इसका
कालांश सूर्य से १२ अंश पीछे होता है तब यह पच्छिम में दृश्य होता है और पहले
होता है तब पूर्व में अदृश्य हो जाता है ।
विज्ञान-भाष्य—इस पर विशेष लिखने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि जैसे
और ग्रहों का उदयास्त काल जाना जाता है वैसे ही चन्द्रमा का भी । चन्द्रमा का
ऐसा उदय अस्त चान्द्र-मास में केवल एक बार होता है। चन्द्रमा की गति बहुत
तीव्र है इसलिए चन्द्रमा का अस्त पूर्व में कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को होता है और
उदय पच्छिम में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के उपरान्त सन्ध्याकाल में होता है।
दैनिक उदयास्त काल जानने की रीति—
रवीन्द्वोः षड्भयुतयोः प्राग्वल्लग्नान्तरासवः ।
एकराशौ रवीन्द्रोश्च कार्या विवरलिप्तिकाः ।।२।।
तन्नाडिकाहते भुक्ती रवीन्द्वोः षष्टिभाजते ।
तत्फलान्वित मो भूयः कर्तव्या विवरासव ।।३।।
एवं यावत् स्थिरी भूता रवीन्द्वोरन्तरासवः ।
तैः प्राणैरस्तमेतीन्द्रः शुक्लेऽर्कास्तमयात्परम् ।।४।।
अनुवाद—( २ ) ( शुक्ल पक्ष के जिस दिन चन्द्रमा का अस्त काल जानना
हो उस दिन के सूर्यास्त काल के सूर्य और चन्द्रमा को स्पष्ट करके और चन्द्रमा में
आक्ष और आयनदृक्कर्म संस्कार करके ) सूर्य के भोगांश और चन्द्रमा के
दृक्कर्म संस्कृत भोगांश में छः छः राशि जोड़ने से जो आवे उनके उदय लग्नों के
अन्तरासुओं को जान ले । यदि सूर्य और चन्द्रमा एक ही राशि में हों तो इनके
भोगांशों के अन्तर की कला बना लेना पर्याप्त होगा । (३) इन उदय लग्नों के
अन्तरासुओं की घड़ी बनाकर इससे सूर्य और चन्द्रमा की दैनिक गतियों से गुणा कर
दे और गुणनफल को ६० से भाग दे दे। सूर्य की गति से जो लब्धि मिले
उसे उसको सूर्य के भोगांश में और चंद्रगति से जो लब्धि मिले चन्द्रमा के भोगांश