सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 838 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 64

मध्यमाधिकार ४१
किस घंटे ( होरा ) का स्वामी कौन ग्रह है यह जानने के लिए वह क्रम
समझ लेना चाहिये जिस क्रम से घंटे के स्वामी बदलते हैं। शनि ग्रह पृथ्वी से सब
ग्रहों से अधिक दूर है, उससे निकट बृहस्पति है, बृहस्पति से निकट मंगल, मंगल से
निकट सूर्य, सूर्य से निकट शुक्र, शुक्र से निकट बुध १ और बुध से निकट चन्द्रमा
है। इसी क्रम से होरा के स्वामी बदलते हैं। यदि पहले घंटे का स्वामी शनि है तो
दूसरे घंटे का स्वामी वृहस्पति, तीसरे का स्वामी मंगल, चौथे का सूर्य, पांचवें का
शुक्र, छठें का बुध, सातवें का चन्द्रमा, आठवें का फिर शनि, इत्यादि क्रमानुसार
हैं। परन्तु जिस दिन पहले घंटे का स्वामी शनि होता है उस दिन का नाम शनिवार
होना चाहिये । इसलिए शनिवार के दूसरे घंटे का स्वामी बृहस्पति, तीसरे घंटे का
स्वामी मंगल इत्यादि हैं। इस प्रकार सात-सात घंटे के बाद स्वामियों का वही क्रम
फिर आरंभ होता है। इसलिए शनिवार के २२वें घण्टे का स्वामी शनि, २३वें
का वृहस्पति, २४वें का मंगल, और २४वें के बाद वाले घंटे का स्वामी सूर्य होना
चाहिये । परन्तु यह २५वां घंटा अगले दिन का पहला घंटा है जिसका स्वामी सूर्य
है इसलिए शनिवार के बाद रविवार होता है। रविवार के दूसरे घंटे का स्वामी
शुक्र, तीसरे का बुध, चौथे का चन्द्रमा, इत्यादि क्रमानुसार चलते हुए ११वें, १८वें
२५वें घंटों का स्वामी भी चन्द्रमा होता है। परन्तु २५वां घंटा अगले दिन का पहला
घंटा है इसलिए इसी घंटे के स्वामी के नाम से अगला दिन चन्द्रवार पड़ा। इसी
प्रकार और वारों का नामकरण २ हुआ है।
अब यह स्पष्ट हो गया कि शनिवार के बाद रविवार और रविवार
के बाद सोमवार और सोमवार के बाद मंगलवार क्यों होता है। ग्रहों के क्रम में
शनि से रवि चौथा ग्रह है, रवि से चंद्रमा चौथा ग्रह है, चन्द्रमा से मंगल चौथा
ग्रह है। इसलिए यह नियम हो गया है कि ग्रहों के क्रम को शनि से गिनते हुए
प्रत्येक चौथा ग्रह अगले वार का स्वामी होता है।
१. पृथ्वी से बुध शुक्र की अपेक्षा अधिक दूर है परन्तु हमारे ज्योतिष ग्रन्थों
में शुक्र ही अधिक दूर माना गया है। कारण इसका यह है कि जो ग्रह जितनी ही
दूर है उतनी ही देर में वह भगण पूरा करता है। ऐसा विश्वास हमारे ज्योतिषियों का
भी है परन्तु इन्होंने पृथ्वी से यह दूरी ली है और आधुनिक ज्योतिषियों ने सूर्य से ।
२. वारों का यह क्रम प्रायः सभी देशों में पाया जाता है। परन्तु इनके
नामकरण की उपपत्ति जैसी यहाँ की गयी है वैसी कहीं और भी है या नहीं यह
खोजने के योग्य है ।