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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 582, कुल 838 में से

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पृष्ठ 582

परिलेखाधिकार ५५७
अनुवाद—(१४) स्पर्श, मध्य और मोक्षकाल में ग्राहक का केन्द्र जहाँ-जहाँ
होता है उन बिन्दुओं का पता विक्षेपाग्र बिन्दुओं से ही लगाया जाता है । इन तीन
बिन्दुओं में से स्पर्श और मध्य बिन्दुओं से तथा मध्य और मोक्ष बिन्दुओं से (१५)
मत्स्य बनावे । प्रत्येक मत्स्य को दो समान भागों में विभाजित करने वाली और
उसके मुख और पुच्छ से होकर निकलने वाली रेखाएँ बढ़ाने पर जिस बिन्दु पर
मिलती हैं (१६) उसको केन्द्र मानकर एक ऐसा धनु बनावे जो पूर्वोक्त तीन बिन्दुओं
को स्पर्श करे तो इसी धनु पर ग्रहणकाल में छादक के केन्द्र का मार्ग होता है।
विज्ञान भाष्य-- यदि दो बिन्दुओं में से प्रत्येक को केन्द्र मानकर दूसरे
बिन्दु की दूरी पर दो धनु खींचे जाँय तो उनके बीच में जो क्षेत्र बनता है वह मछली
के आकार का होता है। ऐसे आकार को तिमि या मत्स्य कहा जाता है (देखो पृष्ठ
२२३) इसी प्रकार का मत्स्य बनाने का नियम १४वें श्लोक में बतलाया गया है।
स्पर्श और मध्यकाल के छादक के केन्द्रों से तथा मध्य और मोक्षकाल के छादक के
केन्द्रों से जो दो मत्स्य बनाए जाते हैं उनकी सामान्य जीवाएँ (common
chords) बढ़ाने पर जिस बिन्दु पर मिलती हैं उसको छादक के केन्द्र के मार्ग
का केन्द्र माना गया है और इसी केन्द्र से छादक के केन्द्रों को स्पर्श करने वाला धनु
छादक के केन्द्र का मार्ग माना गया है। यह त्रिप्रश्नाधिकार के ४१वें श्लोक के
भाभ्रम-रेखा के खींचने के नियम की तरह है, और उसी प्रकार स्थूल भी है। इस
नियम से छादक के केन्द्र का जो मार्ग सिद्ध होता है उससे यथार्थ मार्ग का अंतर
बहुत कम होता है। इसलिए आगे लिखे हुए श्लोकों के अनुसार इससे जो काम लिया
जाता है वह व्यवहार के लिए पर्याप्त शुद्ध है।
किसी इष्टकाल में ग्रहण का परिलेख खींचना -
ग्राह्यग्राहकयोगाधार्त्प्रोज्झयेदिष्टग्रासमागतम् ।
अवशिष्टाङ्‌गुलसमां शलाकां मध्यविन्दुतः ॥१७॥
तमोमार्गोन्मुखों दद्याद्ग्रसतः प्रग्रहाश्रितम् ।
विमुञ्चतो मोक्षदिशं ग्राहकाध्वानमेव वा ॥१८॥
स्पृशेद्यत्र ततो वृत्तं ग्राहकार्धेन संलिखेत् ।
तेन ग्राह्यं यदाक्रान्तं तत्तदा ग्रासमादिशेत् ॥१९॥
अनुवाद-(१७) गणित से जाने गये इष्टकाल के ग्रास को मानैक्य खंड से
घटाने पर जो शेष आवे उसके अंगुल बनाकर इसी के समान एक शलाका अथवा सीधी
लकड़ी लेकर परिलेख के केन्द्र से (१८) यदि इष्टकाल ग्रहण के मध्यकाल से पहले
हो तो स्पर्श बिन्दु की ओर और यदि इष्टकाल मध्यकाल के उपरान्त हो तो मोक्ष बिन्दु