सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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अनुवाद—(१३) चन्द्रमा का १२वाँ भाग भी ग्रस्त हो तो स्वच्छता के
कारण देखा जा सकता है परन्तु सूर्य की तीन कला भी ग्रस्त हो तो सूर्य की तीक्ष्णता
के कारण नहीं देख पड़ता ।
विज्ञान भाष्य—इसका अर्थ करने में टीकाकारों ने बड़ा मत-भेद प्रकट किया
है । आचार्य रंगनाथ जी, तथा उनके अनुयायी माधव पुरोहित जी और पंडित इन्द्र-
नारायण द्विवेदी जी यह अर्थ लगाते हैं कि चन्द्रमा का १२ वाँ भाग भी ग्रस्त हो तो
स्वच्छता के कारण नहीं देख पड़ता । परन्तु यह अर्थ मेरी समझ में ठीक नहीं जंचता ।
स्वच्छता का अर्थ तीक्ष्णता नहीं लिया जा सकता । स्वच्छता के शब्द से ही यह बोध
होता है कि चन्द्रमा की ज्योति स्वच्छ या स्पष्ट होती है इसलिए बारहवाँ भाग भी
ग्रस्त हो तो स्वच्छतापूर्वक स्पष्ट देखा जा सकता है । जैसा अर्थ मैंने ऊपर लिखा है
वैसा ही अर्थ श्री विज्ञानानन्द स्वामी ने अपने बंगला अनुवाद के पृष्ठ २०३ पर
किया है ।
इस सम्बन्ध में भास्कराचार्य१, ब्रह्मगुप्त इत्यादि ने लिखा है कि चंद्रमा के
१६वें भाग से कम ग्रहण हो तो नहीं देखा जा सकता और सूर्य के १२वें भाग से
कम ग्रहण हो तो नहीं देखा जा सकता । इससे भी सूर्य-सिद्धान्त के पूर्वोक्त श्लोक का
अर्थ वही ठीक जान पड़ता है जो मैंने किया है । ब्रह्मगुप्त जी ने स्वच्छता का शब्द
इसी अर्थ में प्रयोग किया है जैसा कि इनके अवतरणों से प्रकट होता है ।
छादक के केन्द्र का मार्ग खींचना—
स्वसंज्ञिताः त्रयः कार्या विक्षेपाग्रेषु विन्दवः ।
तत्र प्राङ्मध्ययोर्मध्ये तथा मौक्षिक मध्ययोः ॥१४॥
लिखेन्मत्स्यो तयोर्मध्यमुखपुच्छविनिर्गतम् ।
प्रसार्य सूत्र द्वितयं तयोर्यंत्र युतिर्भवेत् ॥१५॥
सूत्रेण विलिखेद्वृत्तं तत्र विन्दुत्रयं स्पृशन् ।
स पन्था ग्राहकस्योक्तः तेनाऽसौ सम्प्रयास्यति ॥१६॥
१. इन्दोर्भागः षोडसः खण्डितोऽपि तेजः पुञ्जच्छन्नभावान्न लक्ष्यः ।
तेजस्तैक्ष्ण्यात् तीक्ष्णगोद्वादशांशो नादेश्योतोऽल्पोग्रहो बुद्धि मद्धिः ॥३७॥
—सिद्धान्त शिरोमणि, गणिताध्याय चन्द्रग्रहणाधिकार
वलनादि शशिवदन्यद् ग्रहणं तैक्ष्ण्याद्रवेरनादेश्यम् ।
द्वादशभागादूनं स्वच्छत्वात् षोडशादिन्दोः ॥२०॥
—ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त; सूर्यग्रहणाधिकार