सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूर्यग्रहणाधिकार ५३७
५ ,, = ˙०८५
१ ,, = ˙०१७
˙५ ,, = ˙००६
∴ १ घड़ी २६˙५ पल की गति = १′˙५
अमान्तकालिक सायन सूर्य = २६३° १४′
१ घड़ी २६˙५ पल की गति = १′˙५
द्वितीय-लंबन-संस्कृत-अमान्तकाल का सूर्य = २६३° १५′˙५
त्रिभोन लग्न = ३२४° ४३′˙५
∵ विश्लेषांश = ३१° २८′
दृग्गति = त्रिभोन लग्न की नतांश कोटि ज्या = कोज्या ४०° ५७′
∴ छेद = १ / ४ दृग्गति = १ / ४ कोज्या ४०° ५७′
∴ लंबन = ज्या विश्लेषांश / छेद
= ४ कोज्या ४०° ५७′ × ज्या ३१° २८′
= ४ × ˙७५५३ × ˙५२२०
= १ घड़ी ३४˙६ पल
सूर्योदय से अमान्तकाल तक का समय = १४ घड़ी ४५ पल
तीसरी बार का लंबन = १ घड़ी ३४˙६ पल
∴ तृतीय-लंबन-संस्कृत-अमान्तकाल = १६ घड़ी १६˙६ पल
इस प्रकार पहले लंबन से अमावस्यान्त काल १५ घड़ी ४८˙६ पल पर, दूसरे
लंबन के १६ घड़ी ११˙५ पल पर और तीसरे लंबन से १६ घड़ी १६˙६ पल पर होता
है। इससे प्रकट है कि पिछले अमावस्यान्त कालों में केवल ८ पल का अन्तर है। यदि
दो तीन बार और संस्कार किया जाय तो अन्तर शून्य हो जायगा। उस दशा में जो
अमावस्यान्त काल आवेगा वही शुद्ध अमावस्यान्त होगा। अनुमान से जान पड़ता है
कि जो अमावस्यान्त काल तीसरी बार आया है उससे शुद्ध अमावस्यान्त केवल दो या
तीन पल अधिक होगा। इसलिए दो तीन पल के लिए दो तीन बार और संस्कार करने
में झंझट के सिवा विशेष लाभ नहीं है। इसलिए मान लिया जाता है कि लंबन-संस्कृत-
शुद्ध-अमावस्यान्त काल सूर्योदय से १६ घड़ी २० पल पर है। यही सूर्यग्रहण का मध्यकाल
समझना चाहिए। यहाँ तक ६वें श्लोक की क्रिया समाप्त हुई।
नति—
१० वें श्लोक में बतलाया गया है कि सूर्य और चन्द्रमा की मध्य गतियों के