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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 503, कुल 838 में से

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पृष्ठ 503

४७८ सूर्य-सिद्धान्त
पूर्व दिखलाया गया है। ऐसी दशा में स्फुटवलन प्राच्य बिन्दु से उत्तर की ओर होता
है। यदि इसी तरह दूसरा चित्र बनाकर ग्रह पच्छिम कपाल में दिखलाया जाय तो
उससे स्पष्ट होगा कि स्फुटवलन ग्रह के प्राच्य बिन्दु से दक्खिन की ओर होता है।
इस प्रकार श्लोक २४ के उत्तरार्ध की उत्पत्ति सिद्ध होती है। आक्षवलन का परिमाण
गोलीय त्रिभुज ग ग ध से इस प्रकार जाना जाता है :—
गोलीय त्रिभुज उ ग ध में,
ज्या (उ ग ध) / ज्या (ध उ) = ज्या (ग उ ध) / ज्या (ग ध) = ज्या (ख गा) / ज्या (ध्रुवान्तर)
क्योंकि उ ख और उ गा ६०° के समान हैं इसलिए इनके बीच का कोण
गा उ ख अथवा ग उ ध ख गा के समान हुआ जो समप्रोतवृत्त का नतांश है। ज्या
(ध्रुवान्तर) = ग्रह की क्रान्ति कोटि ज्या = ग्रह की द्युज्या १ = ग्रह के अहोरात्रवृत्त
की त्रिज्या; ज्या (ध उ) = अक्षांश की ज्या = अक्ष ज्या
इसलिए
ज्या (उ ग ध) = अक्ष ज्या × ज्या (ख गा) / ग्रह के अहोरात्रवृत्त की त्रिज्या
= अक्ष ज्या × ज्या (ख गा) / क्रान्ति कोटि ज्या ...(१)
इस तरह श्लोक २४ का पूर्वार्ध भी सिद्ध हो गया। यहाँ त्रिज्या का अर्थ
३४३८ नहीं है वरन् अहोरात्रवृत्त की त्रिज्या है जो ग्रह की क्रान्ति कोटि ज्या
के समान होती है और नत ज्या का अर्थ ग्रह के नतांश ख ग अथवा नतकाल
ख ध ग की ज्या नहीं है वरन् समप्रोतवृत्त का नतांश ख गा है। भास्कराचार्यजी ने
इसका परिमाण जानने के लिए यह नियम २ बतलाया है कि स्पर्शकाल में छाद्य ग्रह
का जो नतकाल हो उसको ६० से गुणा करके यदि सूर्यग्रहण हो तो दिनार्धमान और
चन्द्रग्रहण हो तो रात्र्यर्धमान से भाग दे दो। इसका कारण यह जान पड़ता है कि
जब दिनार्धमान या रात्र्यर्धमान में छाद्य ग्रह ६०° ऊपर चढ़ता है तो नतकाल में
जितना चढ़ेगा वही उसका नतांश है परन्तु यह नियम स्थूल है। जान पड़ता है कि
सूर्य-सिद्धान्त ने भी छाद्य ग्रह के नतांश ख ग की ज्या के लिए ही नत ज्या लिखा
है न कि ख गा के लिए क्योंकि ख गा का परिमाण जानने के लिए कोई नियम नहीं
बतलाया गया है। यह भी सम्भव है कि नतकाल ख ध ग की ज्या के लिए भी नत
ज्या लिखा गया हो। परन्तु यह दोनों अर्थ शुद्ध नहीं हैं। इसलिए मैंने अनुवाद में
इसका अर्थ समप्रोतवृत्त के नतांश की ज्या किया है।
१. देखो स्पष्टाधिकार पृष्ठ २०७ । २. गणिताध्याय पृष्ठ १२२