सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 424, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिप्रश्नाधिकार ४०१
= ज्या (क—का) / कोज्या क कोज्या का
∵ ज्या (क—का) / कोज्या क कोज्या का × स्परे का ( १ — ज्या घ / ज्या घा )
= ज्या लि ज्या आ / कोज्या क
अथवा
ज्या (क—का) / कोज्या क कोज्या का = ज्या लि ज्या आ / कोज्या क — स्परे का / ज्या घा (ज्या घा—ज्या घ)
परन्तु Hall and Knight की Trigonometry पृष्ठ ११३ के अनुसार
ज्या घा—ज्या घ = २ ज्या घा—घ / २ कोज्या घा+घ / २
जहां घा स्पष्ट नतकाल और घ यथार्थ नतकाल है ।
इसलिए घा—घ = विषुवांश लम्बन = ली
घा+घ = घा—घ+२ घ = ली+२ घ
∴ ज्या घा—ज्या घ = २ ज्या ली / २ कोज्या ( ली+२ घ / २ )
और क—का = स्पष्ट और यथार्थ क्रान्तियों का अन्तर
= कान्ति लम्बन = लु (देखो पृष्ठ ३६६)
∵ ज्या लु / कोज्या क कोज्या का = ज्या लि ज्या आ / कोज्या क — स्परे का / ज्या घा
× २ ज्या ली / २ कोज्या ( घ + ली / २ )
परन्तु ज्या ली = २ ज्या ली / २ कोज्या ली / २
∴ २ ज्या ली / २ = ज्या ली / कोज्या ली / २
= ज्या लि कोज्या आ ज्या (घ+ली) / कोज्या क कोज्या ली / २ (देखो पृष्ठ ३६७)
∵ २ ज्या ली / २ = ज्या लि कोज्या आ ज्या घा / कोज्या क कोज्या ली / २
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