सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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कोण को नाटिकल अलमैनेक में Reduction to Geocentric latitude कहा जाता
है । १६२७ ई० के नाटिकल अलमैनेक में इसका मान १०'५''.३ लिखता है । अंतर
का कारण यह है कि इस गणना में लघुरिक्थों की शुद्धता केवल चार अङ्कों तक ली
गयी है ।
भूकेन्द्र से किसो स्थान की दूरी इस तरह जानी जा सकती है :—
चित्र ७६
चित्र ७६ में व ध वां आधे दीर्घवृत्त का छेद (section) है जो विषुवत् रेखा
के व बिन्दु से आरम्भ होकर उत्तरी ध्रुव ध से होता हुआ विषुवत् रेखा की दूसरी
ओर वा तक गया है । यदि व वा पर एक अर्धवृत्त व दा वा खींचा जाय तो यही व
ध वा का सहायकवृत्त (auxiliary circle) होगा । प भ द कोण भूकेन्द्रिक अक्षांश
हुआ जो आ से सूचित किया जायगा । भूकेन्द्र से द स्थान की दूरी भ द को त्र अक्षर
से सूचित किया जायगा । त्रिभुज प भ द में
प भ = भ द कोज्या आ = त्र कोज्या आ
प द = भ द ज्या आ = त्र ज्या आ
मुखोपाध्याय की Geometry of Conics पृष्ठ ६५ से सिद्ध है कि
प द / प दा = भ ध / भ व = थ / त
∵ प दा = त / थ × प द = त / थ × त्र ज्या आ
परन्तु प भ² + प दा² = भ दा² = त²
∵ ( त्र कोज्या आ )² + ( त / थ × त्र ज्या आ )² = त²
या त्र² कोज्या² आ + त² / थ² × त्र² ज्या² आ = त²