सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिप्रश्नाधिकार ३६१
जहां त, थ क्रम से दीर्घवृत्त से दीर्घ और लघु अक्ष के आधे हैं।
परन्तु प द = प भ ×स्परे ∠ प भ द = प फ ×स्परे ∠ प फ द
∵ प भ ×स्परे आ = प फ ×स्परे अ
= प भ × थ२/त२ ×स्परे अ
∴स्परे आ = थ२/त२ स्परे अ (५)
इसका अर्थ यह हुआ कि किसी स्थान के भौगोलिक अक्षांश की स्पर्शरेखा को
थ२/त२ से गुणा कर दिया जाय तो उस स्थान के भूकेन्द्रिक अक्षांश की स्पर्शरेखा आ
जायगी। विलोम क्रिया के द्वारा भूकेन्द्रिक अक्षांश दिया हुआ हो तो भौगोलिक अक्षांश
भी जाना जा सकता है।
यह बतलाया गया है कि त और थ पृथ्वी के दीर्घ और लघु अक्षों के आधे
हैं जिनके मान कर्नल क्लार्क के मतानुसार* यह हैं :—
त = २,०९,२६,२०२ फुट
= ३९६३.३ मील (स्वल्पान्तर से)
थ = २,०८,५४,८६५ फुट
= ३९४९.८ मील (स्वल्पान्तर से)
∵ थ२/त२ = २०८५४८६५२/२०९२६२०२२ = .९९३१६६५ = .९९३२
उदाहरण १—देहरादून का भौगोलिक अक्षांश ३०°१८′५१″.८ उत्तर है
तो इसका भूकेन्द्रिक अक्षांश और ऊर्ध्वरेखा का कोण क्या है ?
उपयुक्त सूत्र के अनुसार,
स्परे आ = .९९३२ × स्परे ३०°१८′५१″.८
∵ लरि स्परे आ = लरि .९९३२ + लरि स्परे ३०°१८
= १̄.९९७० + ९̄.७६७०
= ९̄.७६४
आ = ३०°८′४०″
यही देहरादून का भूकेन्द्रिक अक्षांश हुआ। यदि इसको भौगोलिक अक्षांश से
घटा दिया जाय तो ऊर्ध्वरेखा का कोण १०′१२″ के समान होगा। ऊर्ध्वरेखा के
*Hall's Spherical Astronomy pp. 44.