सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 397, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ें३७४ सूर्य-सिद्धान्त
के सूत्र के अनुसार ५०° फा० तापक्रम और ३० इंच दबाव पर वर्तनांक १.०००२८३
होता है ।
सिम्प्सन और ब्रैंडली नामक ज्योतिषियों ने भी वर्तन के सूत्र बनाये हैं
परन्तु उनकी मीमांसा यहाँ आवश्यक नहीं है । यहाँ केवल ब्रैंडली का सूत्र दे देना
पर्याप्त होगा—
व = ५८"•३६१ स्परे (न—४•०६ व) (४)
इस सूत्र से ८०° नतांश तक वर्तन का परिमाण सन्तोषजनक होता है । इस
सूत्र से क्षितिज के पास वाले तारों का बेध ठीक-ठीक किया जा सकता है क्योंकि
नतांश ८० अंश के निकट होने पर भी स्परे (न—४•०६ व) का परिमाण बहुत बड़ा
नहीं होने पावेगा ।
तापक्रम तथा वायुमंडल के दबाव के घटने-बढ़ने से भी वर्तन के परिमाण में
अन्तर पड़ जाता है। परन्तु इन सब की चर्चा विस्तार के भय से छोड़ दी जाती है।
वेध से वातावरण के वर्तन का परिमाण जानना
वर्तन के लिए जो सूत्र पहले स्थापित किया गया है उसके गुणकों के मान
जानने के लिए कई रीतियाँ काम में लायी जाती हैं। इनमें से तीन रीतियों की चर्चा
यहाँ की जायगी । पहली और दूसरी रीतियों से एक ही वेधशाला के वेधों से
काम चल सकता है यदि इसका अक्षांश बहुत कम या अधिक न हो। तीसरी रीति में
दो वेधशालाओं की आवश्यकता पड़ती है ।
पहली रीति—ऐसा तारा चुनना चाहिए जो दोनों याम्योत्तरोल्लंघनों के
समय क्षितिज के ऊपर रहे । चित्र ७२ में त, ता ऐसे ही एक तारे के स्पष्ट स्थान
स्थान हैं । दोनों समय तारे का स्पष्ट नतांश जान लेना चाहिए । मान लो तारे
का स्पष्ट नतांश त स्थान पर न और ता स्थान पर ना है ।
सूत्र के अनुसार इसके यथार्थ नतांश हुए
न + प स्परे न + फ स्परे³ न
और ना + प स्परे ना + फ स्परे³ ना
यदि त, ता तारे के यथार्थ स्थान मान लिए जायें तो त ध = ता ध और
ख त + ख ता = २ ख ध = २ लम्बांश = २ (६०° - अ) अर्थात् दोनों यथार्थ
नतांशों का योग = २ (६०° - अ), जहाँ स स्थान का अक्षांश अ है ।
∴ न + प स्परे न + फ स्परे³ न + ना + प स्परे ना
- फ स्परे³ ना = १८०° - २ अ