सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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का अंतिम चौथा भाग और श्रवण का पहला पन्द्रहवां भाग अभिजित् का भोग समझा
जाता है । इस प्रकार अभिजित का भोग* २५३ १/३ कला का हुआ ।
प्राचीन काल में २७ नक्षत्रों की जगह अभिजित् को लेकर २८ नक्षत्रों के
मान भिन्न भिन्न थे । भास्कराचार्यजी† कहते है कि पुलिश, वशिष्ठ, गर्ग आदि
ज्योतिषी विवाह यात्रा आदि के फल की सिद्धि के लिए नक्षत्रों के सूक्ष्म मान यह
बतला गये हैं :—
चन्द्रमा की मध्यम दैनिक गति ७९०′ ३५″ मानी गयी है । इसका ड्योढ़ा
११८५′ ५२.″५ और आधा ३६५′ १७″.५ होते हैं ।
विशाखा ┐
पुनर्वसु │
रोहिणी ├ प्रत्येक का भोग ११८४′ ५२.″५
तीनों उत्तरा ┘
आश्लेषा ┐
आर्द्रा │
स्वाती │
भरणी ├ प्रत्येक का भोग ३६५′ १७.″५
ज्येष्ठा │
शतभिज ┘
शेष १५ नक्षत्रों में प्रत्येक का भोग ७९०′ ३५″ है । इन सबके भोगों को
जोड़ कर २१,६०० कला में से घटाने पर जो आता है वही अभिजित् का भोग है ।
इस प्रकार सत्ताईस नक्षत्रों के भोग मिलकर ६ × ३/२ + ६ × १/२ + १५ × १ अथवा २७
मध्यम दैनिक गतियों के समान है, जो = २७ × ७९०′ ३५″
= २७ × (८०० − ९′ ५″)
= २१६००″ − २४४′ १५″
इस तरह सिद्ध है कि अभिजित् का भोग २५४′ १५″ है जो मुहूर्त चिंता-
मणि के मान से ४५″ अधिक है ।
इन सब बातों से समझ पड़ता है कि नक्षत्रों के मान प्राचीन काल में चंद्रमा
की मध्यम गति के अनुसार तथा नक्षत्र सूचक चमकीले ताराओं को देख कर निश्चित
किये गये थे । परन्तु पीछे से जैसे-जैसे ज्योतिष का विकास हुआ तैसे जान पड़ा होगा
*वैश्य प्रांत्यांघ्रिः श्रुति तिथिमागतो ऽभिजित्स्यात् ।
मुहूर्त चिंतामणि विवाह प्रकरण श्लोक ५५
† सिद्धान्त शिरोमणि गणिताध्याय पृष्ठ १००-१०१