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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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स्पष्टाधिकार २१३
नक्षत्र जानने की रीति
भभोगोऽष्टशतीलिप्ताः खाश्विशैलास्तथा तिथेः ।
ग्रहलिप्ता भभोगाप्ता भानि भुक्त्या दिनानि च ॥६४॥
अनुवाद—(६४) एक नक्षत्र का भोग ८०० कलाओं का और एक तिथि का
भोग ७२० कलाओं का होता है। ग्रह के भोग की कला बनाकर एक नक्षत्र भोग
अर्थात् ८०० कला से भाग देने पर लब्धि गत नक्षत्रों की संख्या होती है और शेष
आगे के नक्षत्र की गत कला होता है। यदि यह जानना हो कि ग्रह वर्तमान नक्षत्र में
कब आया है तो गत कला को ग्रह की दैनिक गति से भाग दे देने से दिन घड़ी आदि
की संख्या निकल आवेगी । ८०० कला में से गत कला को घटाकर शेष को दैनिक
गति से भाग देने पर यह ज्ञात होगा कि ग्रह वर्तमान नक्षत्र में कब तक रहेगा ।
विज्ञान भाष्य—यह बतलाया जा चुका है कि नक्षत्र क्रान्तिवृत्त के
२७वें भाग को भी कहते हैं। क्रान्तिवृत्त चक्र ३६० अंशों या ३६० × ६० अर्थात्
२१६०० कलाओं के समान होता है इसलिए एक नक्षत्र २१६०० ÷ २७ = ८०० कला
के समान होता है। सुविधा के लिए प्रत्येक नक्षत्र का नाम रखा गया है—
१ अश्विनी १५ स्वाती
२ भरणी १६ विशाखा
३ कृत्तिका १७ अनुराधा
४ रोहिणी १८ ज्येष्ठा
५ मृगशिरा १९ मूल
६ आर्द्रा २० पूर्वाषाढ़
७ पुनर्वसु २१ उत्तराषाढ़
८ पुष्य २२ श्रवण
६ आश्लेषा २३ धनिष्ठा
१० मघा २४ शतभिषा
११ पूर्वाफाल्गुनी २५ पूर्वाभाद्रपद
१२ उत्तराफाल्गुनी २६ उत्तराभाद्रपद
१३ हस्त २७ रेवती
१४ चित्रा
इन २७ नक्षत्रों के अतिरिक्त अभिजित् नक्षत्र की भी किसी-किसी जगह
आवश्यकता पड़ती है। यह उत्तराषाढ़ और श्रवण के बीच में पड़ता है। उत्तराषाढ़