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सर्वकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 188

स्पष्टाधिकार १६५
समीकरण (१), (२) और (३) से उ के किसी मान को जान कर स्पष्ट
मन्द केन्द्र, मन्द कर्ण और द के मान जान सकते हैं । परन्तु व्यवहार में इससे सरलता
नहीं होती । यदि मध्यम मन्द केन्द्र का मान जान कर स्पष्ट मन्द केन्द्र और कर्ण
का मान जाना जा सके तो अधिक उपयोगी होता है । इसके लिए समीकरण (३)
को त्रिकोणमिति की रीति से फैलाना पड़ता है जो यों किया जाता है :—
लोनी की त्रिकोणमिति भाग २ अथवा टाडहंटर की त्रिकोणमिति या
म. म. सुधाकर द्विवेदी के चलन कलन पृष्ठ ४२ से यह स्पष्ट है कि
इ^(स/२ √-१) - इ^(-स/२ √-१) १
स्परे स/२ = --------------------------------- × ------- ,
इ^(स/२ √-१) + इ^(-स/२ √-१) √-१
यहाँ इ नेपिएरियन लघुरिक्त का आधार है, जिसका मान बीजगणित के अनुसार है
१ + १ + १/|२ + १/|३ + १/|४ + ⋯ इत्यादि जब कि |४ का अर्थ है ४ × ३ × २
× १, |३ का अर्थ है ३ × २ × १, |११ का अर्थ है ११ × १० × ६ × ... २ × १ ।
इ^(उ/२ √-१) - इ^(-उ/२ √-१) १
इसी प्रकार स्परे उ/२ = --------------------------------- × -------
इ^(उ/२ √-१) + इ^(-उ/२ √-१) √-१
∴ समीकरण (३) का रूप होगा,
इ^(स/२ √-१) - इ^(-स/२ √-१)

इ^(स/२ √-१) + इ^(-स/२ √-१) / १+च
= /------- ×
/ १-च
इ^(उ/२ √-१) - इ^(-उ/२ √-१)

इ^(उ/२ √-१) + इ^(-उ/२ √-१)