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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 838 में से

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पृष्ठ 141

११८ सूर्य सिद्धान्त
अब (१), (२), (३)...(न) समीकरणों के सम पक्षों को जोड़ने से
त₁ - त_{न+१} = २ उज्या प (ज्या प + ज्या २ प ,

  • ज्या ३ प +...ज्या नप)
    परन्तु त₁ - त_{न+१} = ज्या प + ज्या नप - ज्या (न + १) प
    ∵ ज्या प + ज्या नप - ज्या (न + १) प = २ उज्या प
    × (ज्या प + ज्या २ प +...ज्या नप)
    ∵ ज्या (न + १) प = ज्या नप + ज्या प - २ उज्या प
    (ज्या प + ज्या २ प +...ज्या नप)
    यहाँ प = ३°४५' = २२५'
    ∴ २ उज्या प = २ उज्या २२५' = २ (१ - कोज्या २२५')
    = २ (१ - .९९७८) = २ × .००२२ = ४४ / १०००० = १ / २२७
    = १ / २२५ स्वल्पान्तर से
    ∴ ज्या (न + १) प = ज्या नप + ज्या प - १ / २२५ ×
    (ज्या प + ज्या २प +...ज्या नप)
    तत्त्वाश्विनोऽङ्काब्धिवेदा रूपभूमिधरर्तवः ।
    खाङ्काष्टौ पञ्चशून्येशा वाणभूमिगुणेन्दवः ॥१७॥
    शून्यलोचनपञ्चैकाश्छिद्ररूपमुनीन्दवः ।
    वियच्चन्द्रातिधृतयो गुणरन्ध्राम्बराशिषः ॥१८॥
    मुनिषड्यमनेत्राणि चन्द्राग्निकृतदस्रकाः ।
    पञ्चाष्टविषयाक्षोणि कुञ्जराश्विनगश्विनः ॥१९॥
    रन्ध्रपञ्चाष्टकयमा वस्वद्र्यङ्कयमास्तथा ।
    कृताष्टशून्यज्वलना नगाद्रिशशिवह्नयः ॥२०॥
    षट्पञ्चलोचनगुणाश्चन्द्रनेत्राग्निवह्नयः ।
    यमाद्रिवह्निज्वलना रन्ध्रशून्यार्णवाग्नयः ॥२१॥
    रूपाग्निसागरगुणा वसुत्रिकृतवह्नयः ।
    प्रोज्झ्योत्क्रमेण व्यासार्धादुत्क्रमज्यार्धपिण्डकाः ॥२२॥
    अनुवाद—(१७) २२५, ४४६, ६७१, ८६०, ११०५, १३१५; (१८) १५२०,
    १७१६, १९१०, २०६३; (१९) २२६७, २४३१, २५८५, २७२८; (२०) २८५६,