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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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गोकुल लीला ४६
सूरदास कहते हैं कि (सम्पूर्ण जगत के) स्वामी सुन्दर श्याम कृष्ण, सुख के सागर
हैं ॥४॥
आजु नन्द के द्वारैं भीर।
इक आवत, एक जात बिदा ह्वै, इक ठाढ़े मन्दिर कैं तीर ।
कोउ केसरि कौ तिलक बनावति, कोउ पहिरति कंचुकी सरीर ।
एकनि कौं गौ-दान समर्पत, एकनि कौं पहिरावत चीर ।
एकनि कौं भूषन पाटंबर, एकनि कौं जु देत नग हीर ।
एकनि कौं पुहुपनि की माला, एकनि कौं चन्दन घसि नीर ।
एकनि मथैं दूध-रोचना, एकनि कौं बोधति दै धीर ।
सूरदास धनि स्याम सनेही, धन्य जसोदा पुन्य-सरोर ॥५॥
अर्थ—आज नन्द के दरवाजे पर भीड़ लगी है। एक आता है, एक विदा होकर
जाता है और एक मन्दिर के पास खडा रहता है। कोई केशर का तिलक रचाती है और
कोई अपने अंगो पर कंचुकी (चोली) धारणा करती है। (माँ यशोदा) किसी को गोदान
कर रही हैं किसी को साडी (वस्त्र) पहना रही हैं, किसी को आभूषण और रेशमी-वस्त्र
तथा किसी को नग-हीरा आदि रत्न, दे रही है। किसी को पुष्पो की माला, किसी को
जल मे घिस कर चंदन लगा रही है। माता यशोदा किसी के मस्तक पर दूब और गोरो-
चन डालती हैं। और किसी को धैर्य देकर सम्बोधित कर रही है। सूरदास कहते है कि
श्याम के स्नेही और पुण्यशरीर धारण करने वाली मां यशोदा धन्य है ॥५॥
सोभा सिंधु न अन्त रही री।
नंद-भवन भरि पूरि उमँगि चलि, ब्रज की बीथिनि फिरति वही री।
देखी जाइ आजु गोकुल मैं, घर-घर बेँचति फिरति दही री।
कहँ लगि कहौं बनाइ बहुत विधि, कहत न मुख सहसहुँ निबही री।
जसुमति-उदर-अगाध-उदधि तैं उपजी ऐसी सबनि कही री।
सूरश्याम प्रभु इंद्र-नीलमनि, ब्रज-बनिता उर लाइ गही री ॥६॥
अर्थ – एक गोपी दूसरी गोपी से कहती है कि हे सखि, श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव से
उत्पन्न शोभा के सागर का कोई अन्त नही रहा। नन्द के भवन को तृप्त करके उमंग मे
आकर वह (शोभा) ब्रज की गलियो मे वह रही है। आज मैंने घर-घर जाकर दही बेचते
समय (गोकुल मे इस अपूर्व शोभा) को देखा। मैं उसका (शोभा का) वर्णन किस प्रकार
अनेक प्रकार से करूँ। हजारो मुखो से भी प्रशंसा करने पर उसका (उस शोभा के
वर्णन का) निर्वाह नही किया जा सकता। ऐसा सभी ने कहा कि (वह शोभा) यशोदा
के उदररूपी अगाध समुद्र से उत्पन्न हुयी है। सूरदास कहते है कि इन्द्रनीलमणि के
समान भगवान् को ब्रजांगनाओ ने हृदय से लगा कर पकड़ रखा है ॥६॥
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