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सर्वकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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विनय तथा भक्ति ३६
अर्थ—[हे मन तुम,] धोखे में पड़े-पड़े ठगे गये । [इस ठगी को] तुम समझ
नही पाये, विषय वासना के [क्षणिक] सुख मे फँसे रहे । भगवान् रूपी हीरा तुम्हारे
घर मे ही वर्तमान है किन्तु तुम [उसे प्रत्यक्ष न करके] उससे वंचित रहे। जिस प्रकार
मृग [सूखी] भूमि पर सूर्य किरणो की लहरों को (जिनमें जल का सर्वथा अभाव होता
है) जल समझ कर चारों दिशाओ मे दौडता फिरता है किन्तु उसकी प्यास नही
बुझती, उसी प्रकार जन्म-जन्मान्तर से [तुमने सुख के लिए] न जाने कितने कर्म किये
हैं ओर उनके बन्धन मे अपने को स्वयं फँसा लिया है। जिस प्रकार शुक [लुभावने
फूलो को देख कर बडे अच्छे फल पाने की] आशा से सेमल के पेड को रात-दिन मन
लगा कर निष्ठापूर्वक सेता रहा किन्तु जब उसने उसके फल को चखा (उस पर चोच
मारी) तो उसमे से रूई उड़ने लगी और उसके मनोरथ झूठे पड गये और उसे चक्कर
आने लगा। तथा जिस प्रकार वाजीगर बन्दर को डोरी मे बाँध कर दाने-दाने के लिए
चौराहो पर नचाता है [उसी प्रकार] सूरदास कहते हैं कि [हे मन,] भगवान् के भजन
के बिना [सुख की आशा मे पडकर] काल-रूपी सर्प से अपने को खुद डँसवाते रहे
(जन्म-मृत्यु के चक्कर मे पड़े रहे) । विशेष —मान्यता है कि सर्पदंश से मृत व्यक्ति को
मोक्ष प्राप्त नही होता ॥४२॥
भक्ति कब करिहौ, जनम सिरानौ ।
बालापन खेलतहीँ खोयौ, तरुनाई गरवानौ ।
बहुत प्रपंच किए माया के, तऊ न अधम अघानौ ।
जतन जतन करि माया जोरी, लै गयौ रंक न रानौ ।
सुत-वित-वनिता-प्रीति लगाई, झूठे भरम भुलानौ ।
लोभ-मोह तैँ चेत्यौ नाहीँ, सपनेँ ज्यौँ डहकानौ ।
विरध भएँ कफ कंठ विरोध्‍यौ, सिर धुनि-धुनि पछितानौ ।
सूरदास भगवंत-भजन-बिनु, जम कैँ हाथ विकानौ ॥४३॥
अर्थ—[हे मन,] जीवन बीत चला, [अब] भक्ति कब करोगे ? बचपन खेलने
में ही खो दिया, युवावस्था मे गर्व से भर गये । हे अधम, माया के अनेक प्रपंच करने
पर भी तुम्हारी तृप्ति नही हुई । अनेक उपायो से ऐश्वर्य जोड़ा, जिसे राजा से लेकर
रंक तक कोई [अपने साथ] नही ले जा सका । पुत्र, धन, स्त्री आदि की आसक्ति मे
पडे रहे और उनके सुख की झूठी आशा के भुलावे मे आ गये । लोभ-मोह [की अज्ञान-
मयी रात्रि] मे [सोते हुए] तुम स्वप्न के से झूठ व्यवहारो में पड़कर ठगे गये, सावधान
होकर जग न सके (लोभ-मोह की ठगी से मुक्त होकर अपने शुद्ध आनन्दमय चेतना
स्वरूप को प्राप्त न कर सके) अब वृद्ध होने पर जब कफ ने कण्ठ अवरुद्ध कर दिया,
सिर पीट-पीट कर पछताने लगे । सूरदास कहते हैं कि खेद है, भगवद्भजन के बिना
तुम यम (काल) के हाथ बिक गये (जन्म-मरण के चक्कर मे पड़े रहे) ॥४३॥