सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
पृष्ठ 38, कुल 359 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनय तथा भक्ति ३७
[मनुष्य-जन्म का] यह सुअवसर जो संसार मे फिर दुष्प्राप्य है, प्राप्त करके इसकी
(भगवद्-भजन-रूपी) सार्थकता (लाभ) प्राप्त कर लो ॥३८॥
जा दिन मन पंछी उड़ि जैहैँ ।
ता दिन तेरे तन-तरुवर कै, सबै पात झरि जैहैँ ।
या देही कौ गरब न करिये, स्यार-काग-गिध खैहैँ ।
तीननि में तन कृमि, कै बिष्टा कै ह्वै खाक उड़ैहैँ ।
कहँ वह नीर, कहाँ वह सोभा, कहँ रंग-रूप दिखैहैँ ।
जिन लोगनि सौँ नेह करत हैं, तेई देखि घिनैहैँ ।
घर के कहत सबारे काढ़ौ, भूत होइ घर खैहैँ ।
जिन पुत्रनिहिँ बहुत प्रतिपाल्यौ, देवी-देव मनैहैँ ।
तेई लै खोपरी बाँस दे, सीस फोरि बिखरैहैँ ।
अजहूँ मूढ़ करौ सतसंगति, सतानि मैँ कछु पैहैँ ।
नर-बपु धारि नाहिँ जन हरि कौँ, जम की मार सो खैहैँ ।
सूरदास भगवंत-भजन बिनु वृथा सु जनम गँवैहैँ ॥३६॥
अर्थ-हे मन, जिस दिन प्राण रूपी पक्षी उड़ जायेगा उस दिन तुम्हारे शरीर
रूपी वृक्ष के सारे पत्ते झड़ जायेगे (सम्पूर्ण कायिक सौन्दर्य समाप्त हो जायेगा) । इस
शरीर पर गर्व मत करो; [प्राण छूटने पर] इसे स्यार, कौवे, गिद्ध आदि खायेगे ।
शरीर का तीन मे से एक परिणाम होगा, या तो [गाडे जाने पर सड़कर यह] कीड़ों में
परिणत होगा, या [स्यार, गिद्ध आदि द्वारा खाया जाकर] मल बन जायेगा, या
[जलाया जाकर] खाक बन कर उड़ जायेगा । शरीर की वह आभा, वह सौन्दर्य, वह
रंग-रूप तब कहाँ दिखाई पडेगा ? जिन लोगों से तुम स्नेह करते हो वे ही देख कर
घृणा करने लगेगे । घर के लोग कहने लगेगे कि शीघ्र ही [इसे बाहर] निकालो, नही
तो भूत बन कर पकड़ कर खाने लगेगा । जिन पुत्रो का बड़ा प्रतिपालन किया और
[उनकी कुशलता के लिए] अनेक देवी देवताओ की मनोती मानी, वे ही तुम्हारी
खोपड़ी पर बाँसो से प्रहारकरके उसे तोड कर बिखरा देगे । हे मूढ, अब भी सत्संगति
करो, संतो में तुम्हेकुछ [अवश्य] प्राप्त होगा । मनुष्य का शरीर धारण करके जो भगवान्
का भक्त (जन) नही होता उसे यमराज (काल) का दण्ड सहना पड़ेगा । सूरदास कहते
हैं कि भगवान् के भजन के बिना मनुष्य का जन्म व्यर्थ ही नष्ट हो जायेगा ॥३६॥
तिहारौ कृष्न कहत कह जात ?
बिछुरै मिलन बहुरि कब ह्वैहै, ज्यौँ तरवर के पात ।
सीत-वात-कफ कंठ बिरौधै, रसना टूटै बात ।
प्रान लए जम जात, मूढ़-मति देखत जननी-तात ।
छन इक माहिँ कोटि जुग बीतत, नर की केतिक बात ।
यह जग-प्रीति सुवा-सेमर ज्यौँ, चाखन ही उड़ि जात ।