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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पदानुक्रमणी ३८१
धीर धरहु फल पावहुगे । १८६ नीकें तप कियो तनु गारि । १०२
धोखैं ही धोखैं दहकायो । ३८ नीकें देहु न मेरी गेंडुरी । १२२
नंद-नंदन तिय-छवि तनु काछे । १८८ नीकें रहियो जसुमति मैया । २६५
नंद-नंदन हँसे नागरी-मुख चितै, १६२ नैंकु निकुज कृपा करि आइये । १६८
नंद करत पूजा, हरि देखत । ६४ नैन करैं सुख, हम दुख पावैं । १४२
नंद कह्यो हो कहँ छांडे हरि । २२८ नैन चपलता कहां गँवाई । १८६
नंद गये खरिकहिं हरि लीन्हे । १४७ नैन न मेरे हाथ रहे । १४१
नंद जसोदा सब ब्रजवासी । ३५७ नैननि सौं झगरौ करिहौं री । १४३
नंद जु के वारे कान्ह, ५७ नैन भए बस मोहन तैं । १४३
नंद-नंदन वृषभानु-किसोरी, २१० नैन सलोने स्याम, २४७
नंद-नंदन सुखदायक है । १८७ नैना घूंघट मैं न समात । १४४
नंद-नंदन सोँ इतनी कहियो । ३२३ नैना भए अनाथ हमारे । ३५१
नंद बवा की बात सुनौ हरि । १४८ पंथी इतनी कहियौ बात । २३५
नद बिदा होइ घोष सिधारो । २२६ पथिक, कहियौ हरि सोँ यह बात । ३५७
नद-महर-घर के पिछवारैं, १७७ पथिक कह्यो ब्रज जाइ, ३५०
नंदलाल सौं मेरी मन मान्यो, १३४ पनघट रोके रहत कन्हाई । १२०
नंद-सुवन गारुडी बुलावहु । १५१ परम चतुर वृषभानु दुलारी । १८०
नंद हरि तुमसोँ कहा कह्यो । २३० परसुराम तेहिं औसर आए । ३६५
नटवर वेष धरे ब्रज आवत । १३८ परी पुकार द्वार गृह गृह तैं, २८०
नर तैं जनम पाइ कह कीनौ ? ३३ परेखो कौन बोल कौ कीजे । २३८
नवल नंदनंदन रंगभूमि राजे । २२२ पहिलैं प्रनाम नंदराइ सौँ । २६७
ना जानोँ तबहीँ तैं मोकौँ । १६८ पाती बांचत नंद डराने । ८८
नाथ अनाथनि की सुधि लीजे । २३७ पाती मधुवन तैं आई । २७६
नाथत ब्याल विलम्ब न कीन्हौ । ८२ पाती मधुवन ही तैं आई । २७५
नाना रंग उपजावत स्याम । १८७ पिय तेरेँ बस यौँ री माई । १८३
नाम कहा तेरो री प्यारी । १४६ पिय प्यारी खेलैं जमुन-तीर । २०८
नारद ऋषि नृप तौँ यौँ भाषत । ८७ पिय बिनु नागिनि कारी रात । २४६
नित्य धाम वृन्दावन स्याम । २०७ पियहिं निरखि प्यारी हँसि दीन्हो । १६३
निरखत ऊधो कौँ सुख पायो । २७२ पुनि-पुनि कहति हैं ब्रज नारि । १६४
निरखतिं अंक स्याम सुंदर के, २७६ पूछौ जाइ तात सौँ बात । ८८
निरखि पिय-रूप तिय चकित प्रकृति जो जाकैं अग परी । २८१
भारी । १८८ प्रथम करी हरि माखन-चोरी । ६६
निरगुन कौन देस को वासी ? २८२ प्रथम सनेह दुहुँनि मन जान्यो । १४७
निसि दिन बरषत नैन हमारे । २४३ प्रभु कौ देखो एक सुभाइ । १८