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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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परिशिष्ट (ख) ३७५
अजामिल (अजामील)—कन्नोज निवासी एक कुकर्मी, दासीपति ब्राह्मण जिसने दासी
से उत्पन्न अपने सबसे छोटे और सबसे प्रिय पुत्र 'नारायण' का नाम लेने मात्र
से यम-दूतों से छुटकारा पाया । नाम की महिमा से उसका जीवन पवित्र हो
गया और उसका उद्धार हो गया । द्र० भा०, स्कं० ६, अ० १; सू०, प०
४१५ ।
अर्जुन—पांडवों में तृतीय, श्रीकृष्ण के सबसे अधिक कृपा-पात्र जिन्हें श्रीकृष्ण ने अपना
प्रिय सखा करके माना । अर्जुन ने महाभारत युद्ध में श्रीकृष्ण की विशाल सेना
न लेकर केवल श्रीकृष्ण की व्यक्तिगत सहायता माँगी थी । श्रीकृष्ण ने स्वयं
अर्जुन के सारथी बनकर उनकी सहायता की थी तथा अर्जुन के मोह को दूर
करने के लिए उन्हें गीता का उपदेश दिया था ।
अहि—सर्प, परन्तु यहाँ कालियानाग के लिए प्रयुक्त । देखो 'कालियनाग' ।
इन्द्र—प्रधान वैदिक देवता जिन्हें अपदस्थ करके पुराणों ने विष्णु की महत्ता स्थापित ,
की । कृष्ण-लीला मे इस विषय का मुख्य प्रसंग गोवर्धन लीला है । ब्रज में इन्द्र
की पूजा मिटाकर गोवर्धन पूजा कराने पर कुपित होकर जब इन्द्र ने घोर जल-
वृष्टि की, तब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को हाथ पर धारण करके ब्रजवासियों
की रक्षा की तथा इन्द्र का गर्व-प्रहार किया । इन्द्र कृष्ण की शरण में आया
और उसने उनसे क्षमायाचना की । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० २४-२५;
सू०, प० १४२८-१५०१, १५८१-१६०० ।
उग्रसेन—मथुरा के यदुवंशी राजा जिन्हें उनके ज्येष्ठ पुत्र कंस ने अपने श्वसुर जरासंध
की सहायता से कारागार में डाल दिया था और स्वयं राजा बन बैठा था ।
श्रीकृष्ण ने कंस को मारकर उन्हें फिर राज्याधिकार दिलाया ।
उपंग सुत (उपंग सुत)—उद्धव, उपंग नामक एक यादव के पुत्र, जो श्रीकृष्ण के सखा
थे और मथुरा से उनका संदेश गोपियों के पास ले गए थे । देखो उद्धव ।
ऋषि पत्नी—गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या, भूल से अपराध हो जाने के कारण
जिसे गौतम ने पत्थर हो जाने का शाप दिया था । श्रीराम की चरण-रज के
स्पर्श से उसे पुनः मनुष्य शरीर मिला तथा उसका उद्धार हो गया । द्र० सू०,
प० ४१८ ।
ऐरावत—इन्द्र का श्वेत रंग का हाथी जो चौदह रत्नों में एक था ।
कंस—मथुरा के राजा उग्रसेन का क्षेत्रज ज्येष्ठ पुत्र जिसने अपने श्वसुर जरासंध की
सहायता से पिता को कारागार में डालकर राज्य हस्तगत कर लिया था ।
कृष्ण को मारने के उसने अनेक असफल उपाय किए और अन्त में जब उसने
धनुष-यज्ञ के बहाने कृष्ण-बलराम को मारने के लिए मथुरा बुलाया तब वह
स्वयं कृष्ण के द्वारा मारा गया । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० १-४, ४२-
४४; सू०, प० ६२२, ३६५२-३७०६ ।