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सर्वकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 237

बिसरयौ सुख नातौ गोकुल कौ, और हमारे अग ।
सूर स्याम वह गई सगाई, वा मुरली कैं संग ॥६५॥
अर्थ—उनकी किस बात का पश्चात्ताप किया जाये । कृष्ण हमारी जाति-पांति
के तो है नही, (हम) क्या समझकर दुखी हो । न तो उनके सिर पर मयूर-चन्द्रिका
वाला मुकुट है, न हृदय पर वनमाल है । तमाल (वृक्ष) (जैसे) श्यामसुन्दर पर पुष्पों
के आभूषण शोभित नही है । अब कृष्ण नन्द-नन्दन तथा गोपीजन-वल्लभ नही कहे
जाते है । (अव वे) वन्दीजनो से वासुदेव (वसुदेव के पुत्र) तथा यादव-कुल के दीपक
के रूप मे वर्णित किये जाते है । उन्होने गोकुल के सुख-सम्बन्धो को तथा हमारे अंगो
को भुला दिया । सूरदास कहते है (गोपियां कहती है) कि मुरली के साथ हमारी
श्याम से सगाई समाप्त हो गई ॥६५॥
अब वै बातैं उलटि गईं ।
जिन बातनि लागत सुख आली, तेऊ दुसह भईं ।
रजनी स्याम स्याम सुन्दर सँग, अरु पावस की गरजनि ।
सुख समूह की अवधि माधुरी, पिय रस बस की तरजनि ।
मोर पुकार गुहार कोकिला, अलि गुंजार सुहाई ।
अब लागति पुकार दादुर सम, बिनही कुँवर कन्हाई ।
चन्दन चन्द समीर अगिन सम, तनहिं देत दव लाई ।
कालिन्दी अरु कमल कुसुम सब, दरसन ही दुखदाई ।
सरद वसंत सिसिर अरु ग्रीषम, हिम-रितु की अधिकाई ।
पावस जरैं सूर के प्रभु बिनु, तरफत रैन बिहाई ॥६६॥
अर्थ—(गोपियां कहती हैं) अब वे सभी बातें उलटी हो गईं । हे सखी ! जिन
बातो से सुख मिलता था वे भी दुःखसह हो गयो । पावस की गरज तथा श्याम सुन्दर
के साथ काली रात (अव तो भयावह है), प्रेमाभिभूत (होकर) प्रिय की डांट मधुर
सुख-पुज की सीमा (थी) । (उस समय की) मोर की पुकार तथा कोयल की कूक तथा
भ्रमर का गुंजन अब कृष्ण के विरह मे मेढक की (कर्कश) आवाज के समान जान
पड़ती है । चदन, चन्द्रमा (तथा) (शीतल) समीर आग के समान तन मे दावाग्नि
लगा देते है । यमुना और कमल पुष्प सर्व दर्शन से ही दुखदायी लगते है । शरद,
बसंत, शिशिर और ग्रीष्म (आदि मे) हिम ऋतु की ही अधिकता है । पावस भी कृष्ण
के बिना जलता हुआ प्रतीत होता है, तड़पते हुए ही रात बिताती हूँ ॥६६॥
मिलि बिछुरन की वेद न न्यारी ।
जाहि लगै सोई पै जानै, विरह-पीर अति भारी ।
जब यह रचना रची विधाता, तबहीं क्यौं न संभारी ।
सूरदास-प्रभु काहैं जिवाई, जनमत ही किन मारी ॥६७॥