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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 213

२१२ सूरसागर सार सटीक
भू पर दौरि निकट हरि आयौ, चरननि चित्त लगायौ ।
पुलक अंग, लोचन जल-धारा, श्रीपद सिर परसायौ ।
कृपासिंधु करि कृपा मिले हँसि, लियौ भक्त उर लाइ ।
सूरदास यह सुख सोइ जानै, कहौँ कहा मैं गाइ ॥३॥
अर्थ—सुफलक पुत्र (अक्रूर) ने कृष्ण का दर्शन पाया । सुख से व्याकुल होकर
रथ पर (बैठे) नही रह सके, वही मन को भाने वाली (बात) हुई । पृथ्वी पर दौड़कर
कृष्ण के निकट आये और चरणों मे चित्त लगाया । पुलकित अंगो तथा आंख मे आंसू
भरकर श्रीचरणो मे सिर को स्पर्श कराया । कृपासिंधु कृपा करके हंसकर मिले और
भक्त को हृदय से लगा लिया । सूरदास कहते हैं कि इस सुख को वही (अक्रूर) जान
सकते हैं, मैं उसे गाकर क्या कहूँ ॥३॥
चलन चलन स्याम कहत, लैन कोउ आयौ ।
नंद-भवन भनक सुनी, कंस कहि पठायौ ।
ब्रज की नारि गृह बिसारि, ब्याकुल उठि धाईँ ।
समाचार बूझन कौँ, आतुर ह्वै आईं ।
प्रीति जानि, हेत मानि, बिलखि बदन ठाढीँ ।
मानहु वै अति विचित्र, चित्र लिखी काढीँ ।
ऐसी गति ठौर-ठौर, कहत न बनि आवै ।
सूर स्याम बिछुरैँ, दुख-बिरह काहि भावै ॥४॥
अर्थ—कोई सखी किसी सखी से कह रही है कि हे सखी, कृष्ण बारम्बार जाने
की बात कह रहे है और उन्हे लेने के लिए मथुरा से कोई आया है । नन्द के घर मे
यह भनक पहुँची कि कंस ने कहकर भेजा है। ब्रज की स्त्रियां घर भुलाकर व्याकुल
होकर दौड पड़ी । समाचार जानने के लिए आतुर होकर आयी । प्रीति जानकर,
हित को मानकर बिलखते शरीर से खड़ी रह गयीं । मानो वे विचित्र चित्र मे लिखी
गयी हों, ब्रज मे जगह-जगह ऐसी गति है कि कहते नही बनता । सूरदास कहते है
कि श्याम से विछुड़ने पर विरह का दुख किसे अच्छा लगता है ॥४॥
चलत जानि चितवहिं ब्रज-जुवती, मानहुँ लिखीँ चितेरैँ ।
जहाँ सु तहाँ एकटक रहि गईँ, फिरत न लोचन फेरैँ ।
बिसरि गईं गति भाँति देह की, सुनतिँ न स्रवननि टेरैँ ।
मिलि जु गईं मानौँ पै पानी, निबरहिँ नहीं निबेरैँ ।
लागौँ संग मतंग मत्त ज्यौँ, घिरतिँ न कैसेँहु घेरैँ ।
सूर प्रेम-आसा अंकुस जिय, वै नहिँ इत-उंत हेरैँ ॥५॥
अर्थ—चलता हुआ जानकर ब्रज की युवतियां देखती हैं मानो चितेरे ने तस्वीर
बना दी हो । जो जहाँ थी वही रह गयी, घुमाने पर भी नेत्र घूमते ही नही (दूसरी
ओर देखती ही नही) । शरीर की गति को भूल गयी, पुकारने पर भी कानो से नही