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सर्वकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 158

राधाकृष्ण १५७
सूरदास कहते हैं, सुनो, उसी रस से परिपूर्ण करके कृष्ण ने शरीर के दाह को दूर कर
दिया ॥२७॥
स्याम कौन कारे की गोरे।
कहाँ रहत काके पै ढोटा, वृद्ध, तरुन की धौं हैं भोरे।
इहँई रहत कि और गाउँ कहुँ, मैं देखे नाहिंन कहूँ उनकौं।
कहै नहीं समुझाइ बात यह, मोहिं लगावति हौ तुम जिनकौं।
कहाँ रहीं मैं, वै धौं कहँकै, तुम मिलवति हौ काहैं ऐसी।
सुनहु सूर मोसी भोरी कौं, जोरि जोरि लावति हौ कैसी ॥२८॥
अर्थ- (राधा कहती है) श्याम (कृष्ण) कौन है। (वह) काले हैं कि गोरे।
कहाँ रहते हैं और किसके पुत्र है। वृद्ध हैं कि युवक हैं कि भोले हैं। यही रहते हैं कि
और किसी गांव मे (रहते हैं)। मैंने कही उनको देखा नही है। यह बात समझाकर
कहो जिससे मेरा अवैध (भोग-विलास का) सम्वन्ध लगाती हो। मैं कहां रहती हूँ, वे
पता नही कहाँ के हैं। तुम क्यों ऐसे (व्यर्थ ही) बातें मिलाती हो। सूरदास कहते है कि
(राधा कहती है) मेरी जैसी भोली को क्या उलटा-पुलटा लगा रही हो ॥२८॥
सुनहु सखी राधा की बातें।
मोसौँ कहति स्याम हैं कैसे, ऐसी मिलई घातैं।
की गोरे, की कारे-रँग हरि, की जोबन, की भोरे।
की इहिं गाउँ बसत, की अनतहिं, दिननि बहुत की थोरे।
की तू कहति बात हंसि मोसौँ, की बूझति सति-भाउ।
सपनैँ हूँ उनकौं नहिं देखे, वाके सुनहु उपाउ।
मोसौँ कही कौन तोसी प्रिय, तोसौँ बात दुरैहौं।
सूर कही राधा मो आगैँ, कैसैँ मुख दरसैहौँ ॥२६॥
अर्थ-सखी राधा की बातें सुनो। मुझसे कहती है कि कृष्ण कैसे हैं। इस
प्रकार कपटपूर्ण बाते बनाती है कि (कृष्ण) गोरे है कि काले है, युवक हैं या किशोर
(भोले) है। (वह) इस गाँव में बसते हैं कि दूसरी जगह, बड़े (बहुत दिन के) हैं कि
छोटे (थोड़े दिन के) हैं। तू मुझसे हँसी की बात कहती हो कि सच्चे भाव से पूछती
हो? स्वप्न में भी मैंने उनको नही देखा। उसके (राधा के बहाने बनाने के) उपाय
को सुनो। उन्होंने मुझसे कहा कि तुम्हारे समान प्रिय कौन है जिससे कि मैं बात
छिपाऊँगी। सूरदास कहते हैं कि (एक सखी दूसरी सखी से कहती है) राधा मेरे आगे
कैसे मुंह दिखायेगी ॥२६॥
राधे तेरौ बदन बिराजत नीकौ।
जब तू इत-उत बंक बिलोकति, होत निसा-पति फीकौ।
भृकुटी धनुष, नैन सर सांधे, सिर केसरि कौ टीकौ।
मनु-घूंघट-पट मैं दुरि बैठ्यो, पारधि रति-पतिही कौ।