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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 155

१५४ सूरसागर सार सटीक
स्याम यह तुमसौँ क्यौँ न कहौँ।
जहाँ तहाँ घर घर कौ घेरा, कौनी भाँति सहौँ।
पिता कोपि करवाल गहत कर, बंधु वधन कौँ धावै।
मातु कहै कन्या कुल कौ दुख, जनि कोऊ जग जावै।
बिनती एक करौँ कर जोरे, इनि वीधिन जनि आवहु।
जौ आवहु तौ मुरलि-मधुर-धुनि, मो जनि कान सुनावहु।
मन क्रम वचन कहति हौँ सांची, मैँ मन तुमहिँ लगायौ।
सूरदास-प्रभु अन्तरजामी, क्यौँ न करौ मन भायौ ॥२०॥
अर्थ—कृष्ण यह तुमसे क्यो न कहूँ । जहां-तहां घर-घर की कुचर्चा किस तरह
सहूँ । पिता क्रोधित होकर हाथ मे तलवार लेते हैं । भाई मारने को दोडते हैं । माता
कहती है कि कन्या कुल का दुःख है, जग मे कोई (कन्या) न पैदा करे । (राधा कहती
है) तुमसे मैं हाथ जोडकर विनती करती हूँ कि इन गलियो में मत आओ । जो आओ
(भी) तो मुरली की मधुर ध्वनि मेरे कान मे न पडने पाये । मन, कर्म और वचन से
सत्य कहती हूँ, मैंने मन तुम्ही मे लगाया है। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण तुम अन्तर
की बात जानने वाले हो, क्यो मन को भाने वाली बात नही करते हो ॥२०॥
हँसि बोले गिरिधर रस-बानी।
गुरजन खिझैँ कतहिँ रिस पावति,काहे कौँ पछतानी।
देह धरे कौ धर्म यहै है, स्वजन कुटुंब गृह-प्रानी।
कहन देहु, कहि कहा करैँगे, अपनी सुरत हिरानी ?।
लोक लाज काहै कौँ छोड़ति, ब्रजहीँ बसैँ भुलानी।
सूरदास घट द्वै हैं, मन इक, भेद नहीं कछु जानी ॥२१॥
अर्थ—हँसकर कृष्ण रस से भरी वाणी बोले। गुरुजन के खीझने पर तुम
नाराज क्यो होती हो और पछताती क्यो हो । शरीर धारण करने वाले का यही धर्म
है। स्वजन, कुटुंब तथा घर के प्राणी (जो कुछ कहते हो) कहने दो, कहकर क्या
करेगे ? क्या (तुम्हारी) स्वयं की स्मृति (सुरति) खो गयी है ? लोक की लाज क्यो
छोड़ती हो । ब्रज में बसने पर भूल गई। सूरदास कहते हैं कि (कृष्ण कहते है) शरीर
दो है किन्तु मन एक ही है, इसमे (मैं) कुछ भेद नही जानता ॥२१॥
ब्रज बसि काके बोल सहौँ ।
तुम बिनु स्याम और नहिँ जानौँ, सकुचि न तुमहिँ कहौँ।
कुल की कानि कहा लै करिहौँ, तुमकौँ कहाँ लहौँ ।
धिक माता, धिक पिता बिमुख तुव, भावै तहाँ बहौँ ।
कोउ कछु करै, कहै कछु कोऊ, हरष न सोक गहौँ ।
सूर स्याम तुमकौँ बिनु देखैँ, तनु मन जीव दहौँ ॥२२॥