सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ सूरसागर सार सटीक
अर्थ—तब कृष्ण को नंदरानी जोर से बुलाती हैं। अच्छा हुआ पुत्र गारुड़ी हो
गया, (मैंने) यह बात आज सुनी। माता की पुकार को सुनकर कृष्ण आये, (और पूछने
लगे) माता क्या कहती हो। कीरति नाम की महरि बुलाने आयी है, कुँवर कृष्ण जाते
क्यों नही। राधा को कही सांप ने डस लिया है, जाओ झाड़ (फूँक) आओ न ! सूरदास
कहते हैं कि (यशोदा कहती हैं) बनवारी कृष्ण तुम कुछ जन्त्र-मन्त्र जानते हो ॥१५४॥
हरि गारुड़ी तहाँ तब आए।
यह बानी वृषभानु सुता सुनि, मन-मन हरष बढ़ाए।
धन्य-धन्य आपुन कौं कीन्हौ, अतिहिं गई मुरझाई।
तन पुलकित रोमांच प्रगट भए, आनंद-अश्रु बहाइ।
विह्वल देखि जननि भई व्याकुल, अँग विष गयौ समाइ।
सूर स्याम-प्यारी दोउ जानत, अन्तरगत कौ भाइ ॥१५५॥
अर्थ—तब गारुड़ी कृष्ण वहाँ आये। यह वाणी सुनकर राधा के मन-ही-मन मे
हर्षोल्लास हुआ। अत्यन्त मुरझाई हुई राधा ने अपने को धन्य-धन्य माना। उसके पुलकित
शरीर मे रोमांच प्रकट हो गया और आनद के आंसू बहने लगे। (राधा को) विह्वल
देखकर माता व्याकुल हो गयी कि (राधा के) अंग मे विष समा गया। सूरदास कहते हैं
कि कृष्ण और (प्यारी) राधा दोनों पारस्परिक अन्तर के भाव को समझते हैं ॥१५५॥
रोवति महरि फिरति विततानी।
बार-बार लै कंठ लगावति, अतिहिं सिथिल भई पानी।
नन्द सुवन कैं पाइ परी लै, दौरि महरि तब आइ।
व्याकुल भई लाड़िली मेरी, मोहन देहु जिवाइ।
कछु पढ़ि-पढ़ि कर, अंग परस करि, विष अपनी लियौ झारि।
सूरदास-प्रभु बड़े गारुड़ी, सिर पर गाडू डारि ॥१५६॥
अर्थ—रोती हुई महरि व्याकुल फिरती हैं। बार-बार (राधा को) लेकर
गले से लगाती हैं। वह अत्यधिक शिथिल होकर पानी-पानी (द्रवित) हो गईं। तब
महरि दौड़कर कृष्ण के पैरो पर (गिर) पढी। (ओर बोली) मेरी प्रिय पुत्री व्याकुल
हो गयी है, मोहन उसे जिला दो। कुछ पढ-पढ़ कर, अंग छू कर, सिर पर जादू
डालकर कृष्ण ने विष झाड दिया। सूरदास कहते हैं कि (इस प्रकार) कृष्ण बड़े
गारुड़ी (सिद्ध हो गये) है ॥१५६॥
लोचन दए कुँवरि उघारि।
कुँवर देख्यौ नन्द कौ तब, सकुची अंग सम्हारि।
बात बूझति जननि सौं री, कहा है यह आज।
मरत तैं तू बची प्यारी, करति है कह लाज।
तब कहति तोहिं कारैं खाई, कछु न रहि सुधि गात।
सूर प्रभु तोहिं ज्याइ लीन्ही, कही कुंवरि सौं मात ॥१५७॥