सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
२२२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम्
नानादिगन्तादथ दन्तिमुख्यमुपायनीकृत्य पदार्थजातम् ।
सेवाविशेषं विशदी करिष्यंस्तस्थौ चिरं द्वारि नरेन्द्रलोकः ॥१४॥
नाना देश विदेशों से आये हुये राजा लोग, उत्तम हाथी और अन्य विशिष्ट वस्तुओं को भेंट
देकर, अपनी विशेष सेवा को प्रकट करने के लिये, बहुत देर तक द्वार पर खड़े रहे ॥१४॥
प्रीत्या नृपस्योपरतस्य केचिद् वयस्यतामस्य विभाव्य केऽपि ।
भयेन भूपा मिलितास्तथाऽन्ये परे त्वनौचित्यनिवारणाय ॥१५॥
कुछ राजा तो दिवंगत राव सुर्जन के प्रेम के कारण आये, कुछ राजा राजकुमार भोज के
मित्र होने के कारण आये, कुछ राजा भय के कारण आये और कुछ अनौचित्य का निवारण
मात्र करने के लिये एकत्रित हुये ॥१५॥
सुपर्वसिन्धुप्रभृतीः स्रवन्तीः समुद्रमुख्यांश्च नदानुपेत्य ।
सरांसि पुण्यानि च पुष्करादीन्युपानयन् नीरमथाऽप्तभृत्याः ॥१६॥
योग्य कर्मचारी गंगा आदि नदियों से, मुख्य मुख्य समुद्रों से और पुष्कर आदि पवित्र सरोवरों
से (महाभिषेक के लिये) जल लाये ॥१६॥
तत्रान्तरङ्गैर्गणकैर्गुणाढयैर्मुहुर्मुहूर्तं महितं विचार्य ।
उपक्रमे मङ्गलकर्मणोऽस्य सच्छ्रोत्रिया[स्त्वस्तमया]न्तः ॥१७॥
घनिष्ठ सम्बन्ध वाले गुणवान् ज्योतिषियों [ने मुहूर्त] में बार बार विचार
करके श्रेष्ठ कर्मकांडी विद्वान् राजकुमार के राज्या[भिषेक को] प्रारंभ करने के लिये,
स्वस्तिवाचन करने लगे ॥१७॥
व्यासात्मजश्चक्रधरो धुरीणो धराभृतः कृत्यविधौ समग्र ।
तातं पुरस्कृत्य पुरोऽवतस्थे जगद्धिते कर्मणि जागरूकः ॥१८॥
संसार में हित करने वाले कर्मों में जागरूक तथा समस्त राजसंस्कारों [में प्रवीण] राज-
पुरोहित गोपाल व्यास के पुत्र चक्रधर व्यास, अपने पिता को आगे करके राज्या[भिषेक] का
सारा कार्य अपने तत्त्वावधान में करा रहे थे ॥१८॥
तथेतरे तत्र रथन्तरज्ञा ब्राह्मं महः प्राज्यतमं दधानाः
तत्कालीनयोग्यानि जगुः समेताः सामानि सन्मङ्गलसाधना[नि ॥१९॥]
अत्यन्त उत्कृष्ट ब्रह्मतेज को धारण करने वाले रथन्तर साम के विद्वान् एकत्र होकर उस
समय के योग्य, शुभ और मंगलकारी, सामवेद के मंत्रों को गाने लगे ॥१९॥
उपात्तमङ्गल्यमहौषधीकैस्तीर्थाम्बुपूर्णैः कलशैरशून्याम् ।
भोजोऽथ जाम्बूनदबद्धवेदिं जगाम विद्वानभिषेकभूमिम् [॥२०॥]
फिर विद्वान् भोज अभिषेक भूमि की ओर गये जहाँ सोने से जड़ी हुई [वेदी बनाई] गई थी
और जहाँ सुवर्णकलश रक्खे हुये थे जिनमें विविध तीर्थों से लाये गये पवित्र जल भरे थे और मांग-
लिक ओषधियाँ (वनस्पतियाँ आदि) पड़ी हुईं थीं ॥२०॥
(१९) रथन्तरं सामवेदस्य गीतिभेदः ।
CC0. In Public Domain, Digitizagtion by eGangotri
विंशतितमः सर्गः २२३
धाराऽथ वारां विशदाऽस्य मूर्ध्नि व्यरोचत स्फाटिककुम्भमुक्ता।
पीयूषधारा मिहिकामयूखबिम्बात् पतन्तीव नगेशशृङ्गे ॥२१॥
अभिषेक के समय भोज के ऊपर स्वर्णकलश से गिरने वाली पवित्र जलधारा, हिमालय
के शिखर पर चन्द्रविम्ब से गिरने वाली पीयूषधारा (किरणपुञ्ज की अमृत के समान शीतल
और सुखद प्रकाश धारा) के समान सुशोभित हो रही थी ॥२१॥
तस्याऽभिषेकप्रभवानि तानि तोयानि शीतानि तनौ धृतानि।
व्यसर्जयन् सूर्जनविप्रयोगजन्मानमुग्रं परितापमुर्व्याम् ॥२२॥
अभिषेक के समय भोज के शरीर पर गिरने वाले उन शीतल जलों ने पृथ्वी के, राव सूर्जन
के वियोग से उत्पन्न, तीव्र सन्ताप को मिटा दिया ॥२२॥
मनोऽनुकूले कुलवर्धनोऽसौ शुद्धे दुकूले विशदे वसानः।
राजश्रियो लोचनलोभनीयमाशिश्रिये मण्डनमुच्छ्रितश्रीः ॥२३॥
उत्कृष्ट शोभा वाले कुलवर्धन राजकुमार भोज ने मन के अनुकूल शुद्ध और स्वच्छ वस्त्र
धारण किये और फिर राज्यलक्ष्मी के नेत्रों को लुभाने वाले आभूषण पहिने ॥२३॥
यत्तर्जनीसङ्गविशेषिताऽसौ विशेषकश्रीर्नवनायकस्य।
अतो बभूवाऽस्य विपक्षलक्ष्म्याः किल तर्जनी सा ॥२४॥
नये राजा राव भो[ज की ...] [त]र्जनी (अंगूठे के पास की उँगली) से राजतिलक
किया गया उसकी शोभा [...] के लिये तर्जनी (धमकाने वाली) बन गई ॥२४॥
[..] गोरोचनाकुङ्कु[म ...] विशाले तिलकः कृतो यः।
[स] एव मन्ये मनुजाधिपेऽस्मिन् जनानुरागाङ्कुरतां जगाहे ॥२५॥
राव भोज के विशाल ललाट पर जो गोरोचन और केसर से रंगीन लम्बा राजतिलक किया
गया मान[हुँ] इस राजा में प्रजा के अनुराग का अंकुर बन गया ॥२५॥
[.. दूर्वा]ङ्कुरचारुगुच्छं मङ्गल्यमेकं स निजोत्तमाङ्गे।
[...]ङ्कुराणि हर्म्याणि हन्त द्विषतामभूवन् ॥२६॥
[भोज] ने अपन[..] पर दूर्वादल (कुश) का एक सुन्दर और मांगलिक गुच्छा धारण किया,
किन्तु उसके [शत्रु] राजाओं के महलों में बड़े बड़े दूर्वांकुर (दूब, कुश आदि घास फूस) उग
गये अर्थात् [..]य से, अपने महल छोड़ कर, भाग गये और शून्य महलों में घास फूस
उग गये [...]
[...] भद्रकरः प्रजानां पट्टाम्बरस्रस्तरमारुरोह।
सौ[...] भृतधातुरागं तमोपनोदाय मयूखमाली ॥२७॥
सुन[...] और प्रजा से कोमल कर लेने वाले उदीयमान राव भोज रेशमी वस्त्रों से
सुसज्जित [...] पर प्रजा के दुःख रूपी अन्धकार को दूर करने के लिये, गेरु आदि धातुओं से
सुशोभित उदयाचल पर्वत पर अन्धकार को नष्ट करने के लिये उदीयमान कोमल किरणों वाले
सूर्य के समान, आरूढ़ हुये ॥२७॥
(२३) मण्डनमाभूषणम्।
Dr. Urmila Sharma Collection, Varanasi
२२४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम्
सिंहासनं हेमकृतं कुमारः पट्टाम्बरस्रस्तरमारुरोह ।
स्फुटं यथा मानसजं सरोजं परागसान्द्रच्छवि राजहंसः ॥२८॥
रेशमी वस्त्रों से सुसज्जित सुवर्ण-सिंहासन पर आरूढ़ भोज, मानसरोवर के पराग से सुशो-
भित कमल पर आरूढ़ राजहंस के समान सुशोभित हुये ॥२८॥
छायां धरित्र्याः स्वतनौ विलग्नां विहाय भीतः किमु शीतभानुः ।
आगः प्रमाष्टुं तदिवातपत्रमिषाद् धरित्रीरमणं सिषेवे ॥२९॥
भयभीत चन्द्रमा, अपने शरीर पर लगी हुई पृथिवी की छाया को छोड़ कर, अपने इस अपराध
की क्षमा माँगने के लिये, निष्कलंक छत्र के बहाने, क्या पृथिवी-पति भोज की सेवा कर रहा था ?
(किसी के शरीर पर पराई स्त्री की छाया पड़ना भी कलंक की बात है। पृथ्वी राजा की स्त्री
है। उसकी छाया चन्द्रमा के शरीर पर पड़ी। इस अपराध की क्षमा माँगने के लिये मानों चन्द्रमा
निष्कलंक छत्र बन कर राजा की सेवा कर रहा है। चन्द्रमा का धब्बा वास्तव में पृथ्वी की छाया
ही है। छत्र निष्कलंक चन्द्रमा के समान शुभ्र और उज्ज्वल है।) ॥२९॥
तत्पार्श्वयोरायतमाप्तभृत्यैर्विधूयमानं विधुकान्तिगौरम् ।
प्रकीर्णकद्वन्द्वमुवाह शोभां तरङ्गयुग्मं किमु कीर्तिनद्याः ॥३०॥
राव भोज के दोनों ओर योग्य अनुचरों द्वारा डुलाये जाते हुये चन्द्रमा के समान शुभ्र और उज्ज्वल
चँवर कीर्ति रूपी नदी के दो उज्ज्वल तरंगों के समान शोभा पा रहे थे ॥३०॥
अपि प्रकृत्या विशदं सुवर्णैः संयोजितं शिल्पविशेषविद्भिः ।
मुमोच तच्चामरयुग्ममस्य बालस्वभावान् न विलोलभावम् ॥३१॥
यद्यपि वे चँवर स्वभाव से ही स्वच्छ थे और कुशल कारीगरों द्वारा सुवर्ण में मढ़े गये थे
फिर भी बालस्वभाव (बालों से निर्मित; बचपन) होने के कारण उन्होंने चंचलता नहीं
छोड़ी ॥ ३१ ॥
प्रणेमुरेनं नमितारिलोकमालोकशब्देन कृतावधानम् ।
सामन्तसार्थाः सहमन्त्रिमूख्यैस्तथा परे भूपतयः प्रख्याताः ॥३२॥
शत्रुवर्ग को झुकाने वाले राव भोज को, जिन्हें अनुचर लोग 'महाराज की जय हो; अमुक
व्यक्ति आये हैं' इस प्रकार निवेदन कर सावधान कर रहे थे, मुख्य मंत्रियों के साथ सामन्त लोगों ने
और अन्य विख्यात राजाओं ने प्रणाम किया ॥३२॥
तं वन्दिनो नन्दितमित्रवर्गं नामान्वयज्ञा नमदाननेन्दुम् ।
गुणानगण्याननिशं गृणन्तः सन्तोषयामासुरसीमसत्त्वम् ॥३३॥
कुल के नामों को जानने वाले और रात दिन राव भोज के असंख्येय गुण गाने वाले
चारण भाटों ने मित्रवर्ग को प्रसन्न करने वाले, झुके हुये मस्तक वाले और महान् पराक्रमी राव
भोज को सन्तुष्ट किया ॥३३॥
(३२) आलोकशब्देन 'जयतु देवः, आलोकयतु देवः' इति शब्देन ।
२९ विंशतितमः सर्गः २२५
तस्मिन् महो सन्महसां द्विजानां समाजमभ्यर्च्य समाप्तकृत्यः ।
अव्याजमव्यग्रमनाः समग्रं वितत्य वित्तं विततार वेत्ता ॥३४॥
राज्यतिलक के उस उत्सव के समय, कार्य समाप्त कर लेने पर शान्तचित्त राव भोज ने
निश्छल भाव से महान् तेजस्वी ब्राह्मणों के समाज की पूजा की और फिर विपुल धन बाँटा ॥३४॥
मान्यान् नरेन्द्राननुजीविनोऽथ मित्राणि बन्धून् गुणिनां गणांश्च ।
गजाश्वरत्नाम्बरभूषणाद्यैः संभावयामास यथोचितं सः ॥३५॥
राव भोज ने सम्मान्य राजाओं को, अनुचरों को, मित्रों को, बन्धुओं को और गुणी पुरुषों
को उत्तम हाथी, घोड़े, रत्न, वस्त्र और आभूषणों द्वारा उचित रूप से सत्कृत किया ॥३५॥
तं भीमसेनं रिपवो वदन्ति कर्णस्य जेतारमथार्थिनो ये ।
धर्मप्रधाना धरणीभुजस्तु जानन्ति राजानमजातशत्रुम् ॥३६॥
राव भोज को शत्रु लोग 'भीमसेन' (भयानक सेना वाला; भीमसेन के समान पराक्रमी)
कहते थे; याचक गण उन्हें 'कर्णविजयी' (अपने दान से दानवीर कर्ण को जीतने वाला; अर्जुन)
कहते थे; और धार्मिक राजा उन्हें 'अजातशत्रु' (जिनका कोई शत्रु उत्पन्न नहीं हुआ; युधिष्ठिर)
समझते थे ॥३६॥
विनीतदम्भो विनयेन नतोऽपि शिरस्त्वं न जहौ निजं सः ।
स्मितेन सिक्तान्यपि वचनानि वज्रोपमानि द्विषतां सदाऽऽसन् ॥३७॥
विनय से नम्र होने पर भी राव भोज ने दर्परहित स्वाभिमान के कारण अपना मस्तक ऊँचा
ही रक्खा, उनके मुस्कान से मधुर वचन भी शत्रुओं के लिये सदा वज्रतुल्य होते थे ॥३७॥
असावधव्योऽपि नवाधिकाराज्जगन्मनोरञ्जनजागरूकः ।
प्रमाद...प्रवणैर्वचोभिः संभावयामास समग्रलोकम् ॥३८॥
... होने पर भी, नवीन अधिकार के कारण, सदा जनरञ्जन करने में
सावधानी बरतने वाले ... स्नेहसिक्त वचनों से सब लोगों का सत्कार किया ॥३८॥
...द्विग्भयान्न राजा प्रचण्डभावं प्रकटीचकार ।
...भुत्वस्य पुनः स्वभावात् तमुग्ररूपं ददृशुः पुरस्थाः ॥३९॥
प्रजा ... ग्न हो जाने के भय से राव भोज ने कभी प्रचण्ड भाव प्रकट नहीं किया; किन्तु
पुरवासी ... प्रभुत्व के स्वभाव के कारण, उन्हें उग्र रूप में देखते थे ॥३९॥
...तातिशयप्रमत्तैरकारि यैर्वाऽविनयोऽपि पूर्वम् ।
संत वतंसो विशदाशयानां सस्मार न प्राक्तनसेवकानाम् ॥४०॥
राव सुर्जन के उनसे अत्यन्त प्रसन्न रहने के कारण अभिमान में चूर जिन पुराने सेवकों ने
पहले, जब भोज राजकुमार ही थे, इनके प्रति जो धृष्टता की थी उसे, उदार हृदयवाले लोगों के
भूषण राव भोज ने कभी याद नहीं किया ॥४०॥
२२६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम्
विक्रान्तिराक्रामति न स्म नीतिं न ताञ्च नीतिः क्वचिदत्यशेत ।
विभज्य कालं द्वितयेऽपि विद्वान् साधारणीं प्रीतिमसौ दधार ॥४१॥
राव भोज का पराक्रम न तो राजनीति को दबाता था और न उनकी राजनीति पराक्रम की
उपेक्षा करती थी; वे दोनों में बराबर प्रीति रख कर पराक्रम और राजनीति दोनों से काम
लेते थे ॥४१॥
स्तोकप्रदाः केचन मानपूर्वं केचित् पुनस्तद्विपरीतकृत्याः ।
वित्तं प्रभूतं बहुमानताञ्च स एव वेदार्थिजनाय दातुम् ॥४२॥
कुछ लोग दान तो थोड़ा देते हैं, किन्तु देते हैं सम्मानपूर्वक; और कुछ लोग दान बहुत देते
हैं, किन्तु सम्मानपूर्वक नहीं देते; एक राव भोज ही थे जो याचकों को अत्यन्त सम्मान के साथ
विपुल द्रव्य देते थे ॥४२॥
उपेक्षिता ये क्षमया विपक्षाः पर्याप्तकृत्येन पुराऽस्य पित्रा ।
लीनश्चिरं चेतसि कालयोगात् तेषां ज्वरः [प्राण]हरो जजृम्भे ॥४३॥
पहले इनके पिता राव सुर्जन ने अपने आप को [समर्थ] मान कर क्षमा के कारण जिन शत्रुओं
की उपेक्षा कर दी थी उन शत्रुओं के मन में चिर[काल से छि]पा हुआ प्राण हरने वाला ज्वर अब
काल के कारण प्रवृद्ध हुआ ॥४३॥
प्रयात्ययं किन्तु मृगान् निहन्तुं किं वा सपत्नानिति संशयालोः ।
यानोन्मुखे कौतुकतोऽपि यस्मिन् पुरं वनं वा न सुखाय शत्रोः ॥४४॥
जब राव भोज कुतूहलवश चलते थे तब, यह निश्चय न करने के कारण कि भोज [शिकार]
के लिये जा रहे हैं या शत्रुओं पर आक्रमण करने जा रहे हैं, शत्रुओं के [लिये न] नगर [में शा]न्ति
थी और न वन में ॥४४॥
चापं समारोपितशिञ्जिनीकं सनाथयत्यस्य करे कदापि [।]
स्वावासभूमौ परिवृत्तिमीयुः परस्परं वन्यमृगाः परे च ॥[४५॥]
जब राव भोज अपने हाथ में प्रत्यंचा चढ़ा हुआ धनुष ले लेते थे तब वन्य [मृग और] शत्रु;
परस्पर निवास स्थानों का विनिमय कर लेते थे अर्थात् शत्रु वन में भाग [जाते थे और] वन के
जानवर शून्य नगर में चले आते थे ॥४५॥
(४१) कालिदासैरप्युक्तं रघुवंशे—'कातर्यं केवला नीतिः शौर्यं श्वापदचेष्टितम् । अतः सिद्धिं समेता-
भ्यामुभाभ्यामन्वियेष सः ।।' इति ।
विंशतितमः सर्गः २२७
जिष्णुः स्फुरद्वैरिवरूथिनीनां दुरात्मनां दण्डधरः खलानाम् ।
मित्रे प्रचेता धनदोऽर्थिवर्गे चतुर्दिगीशः स बभूव वीरः ॥४६॥
चारों दिशाओं के स्वामी वीर राव भोज उद्धत शत्रु सेनाओं के लिये 'जिष्णु' (विजयशील;
इन्द्र) थे; कुबुद्धि वाले दुष्टों के लिये 'दण्डधर' (दमन करने वाले; यमराज) थे; मित्रों के
लिये 'प्रचेता' (प्रसन्न चित्त वाले; वरुण) थे; और याचकों के लिये 'धनद' (धन देने वाले;
कुबेर) थे । (इन्द्र पूर्व के, यम दक्षिण के, वरुण पश्चिम के और कुबेर उत्तर के स्वामी हैं) ॥४६॥
नवप्रभोस्तस्य नवं निदेशं नोष्णीषयामास मदान्नृपो यः ।
उष्णीषमायोधनसीम्नि तस्य मस्तिष्कलुब्धो विनिनाय गृध्रः ॥४७॥
नवीन राजा भोज के नवीन आदेश को जिस किसी राजा ने दुर्मद के कारण अपनी पगड़ी पर
नहीं चढ़ाया, उस राजा की पगड़ी को, युद्धस्थल में, मस्तिष्कलोभी गिद्ध हटाता था ॥४७॥
और्वायितं शरणमम्बुनिधिं गतेषु दावायितं विततकाननमाश्रितेषु ।
वज्रायितं शिखरिसानुसनाथितेषु तस्योजितेन महसाऽरिमहीश्वरेषु ॥४८॥
राव भोज के महान् पराक्रम के कारण उनके शत्रु-राजाओं को कहीं भी शान्ति नहीं थी—
यदि वे समुद्र की शरण लेते थे तो तस्य तेजःप्रताप वहाँ बड़वानल बन जाता था, यदि वे वन की
शरण लेते थे तो भोज का प्रताप वहाँ भी दावाग्नि बन जाता था और यदि वे पर्वतों के शिखरों की
शरण लेते थे तो भोज का प्रताप वहाँ वज्र बन जाता था ॥४८॥
दिक्पालोद्रिक्तदन्तिद्विरदबहलचलत्कर्णतालान् विलुम्प-
न्नावृण्वन् व्योमनद्या निरतिशयरयं स्फारधाराविरावम् ।
रुन्धानोऽरुन्धतीशप्रभृतिसुरमुनिस्तोमस्सञ्चारधाम
प्रोद्दामो यस्य यात्रासमयसमुचितो जृम्भते तूर्यनादः ॥४९॥
भोज की विजययात्रा के समय के उचित जो शहनाइयों का प्रचंड घोष होता था वह
दिक्पालों के मदान्ध गजों के वेग से फड़फड़ाये गये कानों को फाड़ता था, तथा स्वर्गंगा के
भयंकर शब्द करने वाले विस्तृत धाराप्रवाह के कोलाहल को भी ढक देता था और वसिष्ठ आदि
सप्तर्षियों के गमन के मार्ग को (आकाश को) रोक देता था ॥४९॥
अव्यग्रप्रवेलात्तुरगखरखुरक्षोदितक्षोणिपृष्ठ-
स्पष्टप्रोद्भूतधूलीनिवहकवलितव्योमवीथिप्रदीपः ।
घोरभीमैः पटुपटहरवाडम्बरैरम्बरान्तं
यो भिन्दन्नाजिभूमौ रिपुनृपतिचमूचक्रमाक्रामति स्म ॥५०॥
राव भोज युद्धभूमि में अपने अव्याकुल तथा जोरों से उछलने वाले घोड़ों के तीक्ष्ण खुरों
से खोदी गई भूमि से स्पष्ट उठे हुये धूलसमूह के कारण सूर्य को भी ढक कर, और नगाड़ों और
ढोलों के भयंकर घोषों से आकाश को भेद कर, शत्रुराजाओं के सेनामंडल पर आक्रमण
करते थे ॥५०॥
३२८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम्
आलोकादेव लोकान् कवलयितुमिव प्रोद्यता तीव्रवेगा ।
दुष्टक्ष्मापालवक्षःक्षतजरसवसाकर्दमोद्दामरूपा ।
कल्पान्तक्रूरकालीविलुलितरसनासन्निभा शत्रुसैन्यै-
रुद्गीता यस्य नेतुः समरभुवि करक्रोडगा खड्गवल्ली ॥५१॥
युद्धभूमि में राव भोज के हाथ में सुशोभित तलवार को शत्रु-सैनिक, अपनी चमक से ही
लोगों को खा जाने के लिये उद्यत, तीव्र वेग वाली तथा दुष्ट राजाओं के वक्षःस्थल के रुधिर,
मांस और चर्बी रूपी कीचड़ में सनी हुई प्रलय काल में क्रूर काली माई की लपलपाती हुई जीभ
के समान मानते थे ॥५१॥
कांचिद्व्यालोलबालव्यजनपवनवत् प्रागनैषील्लघुत्वं
कांश्चित् त्रस्तान् कुरङ्गानिव गुरुकृपया पालयामास बालान् ।
दृप्तानन्यान् मृगेन्द्रानिव शरनखरैर्भिन्दतः कुम्भिकुम्भा-
नद्धा बद्धावधानः प्रशममगमयत् क्रूरशस्त्रेण शास्ता ॥५२॥
कुशल शासक राव भोज ने कुछ राजाओं को [...] ही चंचल बालों वाले चँवरों के वायु
के समान लघु बना दिया था; कुछ बालक राजाओं [...] भयभीत हिरणों के समान शरण में
आये, उन्होंने बड़ी कृपा से पालना की; और कुछ अन्य राजाओं को, जो अभिमानी सिंहों के
समान अपने बाणरूपी नखों से हाथियों के गण्डस्थलों को छिन्नभिन्न कर रहे थे, उन्होंने सावधान
होकर अपने तीक्ष्ण शस्त्र से झट शान्त कर दिया ॥५२॥
धावन्तो ये मदान्धा वनकरिन इवोत्क्षिप्तहस्तस्ति प्रहर्तुं [...]
तेषामुच्छिद्य सद्यः समरभुवि शिरः कीर्ति[...]पहारिं [...]
[L21
विंशतितमः सर्गः २२९
सुह्माः सङ्ग्रामजिह्माः सपदि दिशि दिशि प्राप्तभङ्गाश्च वङ्गाः
वैदर्भा न्यस्तदर्भा निजदशनमधि त्रस्तदेहा विदेहाः ।
त्रैगर्ताः प्राप्तगर्ता ययुरथ विकला मालवाः कालबाधां
गान्धारास्तीक्ष्णधाराहतिचकितधियः सिन्धुपारं प्रयाताः ॥५४॥
राव भोज के पराक्रम को देख कर सुह्म लोग युद्ध से विमुख हो गये और वङ्ग देश के लोग
शीघ्र हार कर इधर उधर भाग गये । विदर्भ देश के लोग अपने दाँतों में तिनके ले लेकर शरण में
आये । विदेह देश के लोगों के शरीर ढीले पड़ गये । त्रैगर्त लोग (विपद्) गर्त में गिर गये ।
मालव देश के लोग व्याकुल होकर कालबाधा को प्राप्त हो गये और गन्धार देश के लोग राव
भोज की तेज तलवार के प्रहारों से चकित होकर सिन्धु के पार चले गये ॥५४॥
पण्डा मण्डाख्यदुर्गस्थितधरणिभुजो दत्तसर्वस्वदण्डा
वन्ध्याः संध्यानखण्डादपि लघिमधृतः केपि विन्ध्याद्रिसंस्थाः ।
अन्ये मन्ये विलीनाः क्वचन विदधतो हन्त वन्येन वृत्तिं
यस्योदग्रे रणाग्रे स्फुरति जितहरिन्मण्डले मण्डलाग्रे ॥५५॥
राव भोज की दिशाओं के मंडल को जीतने वाली तीक्ष्ण तलवार के युद्ध में चमकने पर मंड
नामक दुर्ग में रहने वाले राजा सर्वस्व दंड देकर निर्वीर्य हो गये, विन्ध्य पर्वत में रहने वाले कोई
कोई राजा हलके (तुच्छ) बन कर जरा भी ध्यान में न रह सके (अत्यन्त व्यग्र हो गये) और
अन्य राजा, हमारे विचार से, वन्य वृत्ति .... करके इधर उधर विलीन हो गये ॥५५॥
पिण्डीभूततुषारपाण्डरतरे यस्यानुविन्ध्यं यशः-
स्तोमे किन्नरकामिनीभिरभितः प्रोद्गीयमाने मुदा ।
प्रालेयाचलशङ्कया पितृगृहावासाय बद्धस्पृहा
शैलेन्द्रं तमपोहितुं न सहते मन्ये नगेन्द्रात्मजा ॥५६॥
[विन्]ध्याचल [...] पर चारों ओर किन्नरकामिनियाँ राव भोज के शुभ्र यश को प्रसन्नता से
गाती हैं [...] वह शुभ्र यश बर्फ के समान श्वेत और पिण्डीभूत बन कर विन्ध्याचल पर चारों
ओर छा गया है । [हमारे] समझ में यही कारण है कि नैहर में रहने की इच्छुक भगवती विन्ध्य-
वासिनी पार्वती [वि]न्ध्याचल को हिमालय समझ कर यहाँ से हटना नहीं चाहतीं ॥५६॥
तूर्[णं] सप्तापि तावद् विततजलनिधीन् सप्तलोकानुपेत्य
क्रान्त्वा पातालभूमीरतनुवयवशात्क्रमात् सप्तसंख्याः ।
[ब्रह्मा]ण्डभाण्डाद् बहिरथ विवरं क्वापि नासादयन्ती
[सङ्की]र्णेऽप्यस्य कीर्तिस्त्रिभुवनभवने स्थैर्यमालम्बते स्म ॥५७॥
राव [भोज की] कीर्ति सातों विस्तृत समुद्रों को तैर गई, सातों लोकों में फैल गई और सातों
पातालों को बड़े वेग से पार कर गई ; इस प्रकार सारे ब्रह्माण्ड में चक्कर लगाने पर भी जब उसे
बाहर जाने का कोई मार्ग नहीं मिला तो वह इस संकीर्ण त्रिभुवन में ही स्थिर हो गई ॥५७॥
(५५) पण्डाः निर्वीर्याः । संध्यानखण्डात् स्वल्पध्यानादपि वंध्याः अतीव व्यग्रा इत्यर्थः ।
२३० सुर्जनचरितमहाकाव्यम्
न श्यामा न च सञ्चरेन्मृदुपदं क्षामोदरी नाप्यसौ
निन्दन्तीव कलाभृतं वितनुते नग्नस्य कण्ठग्रहम् ।
प्रागल्भ्यात् कुलभूभृतामपि शिरांस्याश्रित्य नृत्यत्यहो
तस्याभूत् तदपीयमद्भुतरुचेः कीर्तिः परा प्रेयसी ॥५८॥
यद्यपि कीर्ति न तो नवयुवती है, न वह मन्द सविलास चाल से चलती है, न वह पतली कमर
वाली है, वह कलाधर (कला वाले पुरुष; चन्द्रमा) की निन्दा करती है (अर्थात् उसने अपनी
कान्ति से चन्द्रमा को हीन बना दिया है), वह नंगे (शिव जी) के गले से लिपट रही है और उसका
दुःसाहस इतना अधिक है कि वह कुल. के राजाओं (कुलाचल पर्वतों) के मस्तक पर चढ़ कर
नाच रही है, तथापि आश्चर्य है कि अद्भुत रुचि वाले राव भोज की यह कीर्ति ही सबसे बड़ी
प्रेयसी है ! ॥५८॥
बाले व्यालस्तवाग्रे दलय बलयुते कण्टकान् दुष्टकेशान्
मन्दे मन्दप्रयाणं त्यज हतहृदये लग्नमार्चिनिचोले ।
द्रागुद्विग्ना दवाग्नेः प्रथममथ पुरः सञ्चरिष्णोः प्रतापात्
कान्तारे मुक्तकान्ता मुहुरिति जगदुर्यस्य विद्वेषिकान्ताः ॥५९॥
राव भोज के शत्रुओं की स्त्रियाँ अपने पतियों से वियुक्त होकर वनों में भटकती हुईं पहले तो
राव भोज के आगे चलने वाले प्रताप से और फिर दावानल से व्याकुल होकर एक दूसरे से इस
प्रकार कहा करती थीं—बाले ! तेरे आगे साँप है (जरा बच कर चल) ; अरी तुझमें अभी तो
कुछ बल है ! अपने इन बालों में उलझे हुये काँटों को तो हटा ले ; मन्द बुद्धि वाली ! ज़रा
जल्दी जल्दी चल; अभागी ! तेरी चोली में आग लग गई है, इसे जल्दी से बुझा ॥५९॥
भ्राम्यन्ती वनसीम्नि वैरितरुणी जीर्णात् कदाचिद् गुणात्
स्रस्तानि स्तनमौक्तिकानि विततान्यादातुकामा द्रुतम् ।
चिन्वाना बदराणि यस्य नृपतेः कीर्त्या दधत्यच्छतां
वन्याभिर्विनिवार्यते युवतिभिः साक्षेप-साडम्बरः ॥६०॥
वन में भटकने वाली किसी शत्रु-युवती के स्तनों का हार-सूत्र टूट गया और उसके बड़े बड़े
मोती नीचे बिखर गये, तब वह शीघ्र उनको उठाने के लिये झुकी, किन्तु भौं के बजाय मोतियों
के, राव भोज की कीर्ति से श्वेत बने हुये बेरों को उठाने लगी और उस समय वन की स्त्रियों ने
आक्षेपपूर्ण वचनों से उसे मना किया ॥६०॥
आत्मानं त्रिषु विष्टपेषु परितस्त्रेधा विभज्य स्वयं
तन्वन् दिक्षु दशस्वपि स्थितिमतीरन्याश्च मूर्त्ती...
क्लृप्तद्वादशमूर्त्तिमुष्णमहसं निर्जेतुमुत्कण्ठितः
शङ्के संववृते त्रयोदशतनुर्यस्य प्रतापोच्चयः ॥६१॥
.बारह मूर्तियों वाले सूर्य को (द्वादश आदित्यों को) जीतने की उत्कंठा के कारण ही मानों
राव भोज के प्रताप ने अपने आप को तीनों लोकों में और दसों दिशाओं में बाँट कर अपनी तेरह
मूर्तियाँ बनाईं ॥६१॥