सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम्
सिंहासनं हेमकृतं कुमारः पट्टाम्बरस्रस्तरमारुरोह ।
स्फुटं यथा मानसजं सरोजं परागसान्द्रच्छवि राजहंसः ॥२८॥
रेशमी वस्त्रों से सुसज्जित सुवर्ण-सिंहासन पर आरूढ़ भोज, मानसरोवर के पराग से सुशो-
भित कमल पर आरूढ़ राजहंस के समान सुशोभित हुये ॥२८॥
छायां धरित्र्याः स्वतनौ विलग्नां विहाय भीतः किमु शीतभानुः ।
आगः प्रमाष्टुं तदिवातपत्रमिषाद् धरित्रीरमणं सिषेवे ॥२९॥
भयभीत चन्द्रमा, अपने शरीर पर लगी हुई पृथिवी की छाया को छोड़ कर, अपने इस अपराध
की क्षमा माँगने के लिये, निष्कलंक छत्र के बहाने, क्या पृथिवी-पति भोज की सेवा कर रहा था ?
(किसी के शरीर पर पराई स्त्री की छाया पड़ना भी कलंक की बात है। पृथ्वी राजा की स्त्री
है। उसकी छाया चन्द्रमा के शरीर पर पड़ी। इस अपराध की क्षमा माँगने के लिये मानों चन्द्रमा
निष्कलंक छत्र बन कर राजा की सेवा कर रहा है। चन्द्रमा का धब्बा वास्तव में पृथ्वी की छाया
ही है। छत्र निष्कलंक चन्द्रमा के समान शुभ्र और उज्ज्वल है।) ॥२९॥
तत्पार्श्वयोरायतमाप्तभृत्यैर्विधूयमानं विधुकान्तिगौरम् ।
प्रकीर्णकद्वन्द्वमुवाह शोभां तरङ्गयुग्मं किमु कीर्तिनद्याः ॥३०॥
राव भोज के दोनों ओर योग्य अनुचरों द्वारा डुलाये जाते हुये चन्द्रमा के समान शुभ्र और उज्ज्वल
चँवर कीर्ति रूपी नदी के दो उज्ज्वल तरंगों के समान शोभा पा रहे थे ॥३०॥
अपि प्रकृत्या विशदं सुवर्णैः संयोजितं शिल्पविशेषविद्भिः ।
मुमोच तच्चामरयुग्ममस्य बालस्वभावान् न विलोलभावम् ॥३१॥
यद्यपि वे चँवर स्वभाव से ही स्वच्छ थे और कुशल कारीगरों द्वारा सुवर्ण में मढ़े गये थे
फिर भी बालस्वभाव (बालों से निर्मित; बचपन) होने के कारण उन्होंने चंचलता नहीं
छोड़ी ॥ ३१ ॥
प्रणेमुरेनं नमितारिलोकमालोकशब्देन कृतावधानम् ।
सामन्तसार्थाः सहमन्त्रिमूख्यैस्तथा परे भूपतयः प्रख्याताः ॥३२॥
शत्रुवर्ग को झुकाने वाले राव भोज को, जिन्हें अनुचर लोग 'महाराज की जय हो; अमुक
व्यक्ति आये हैं' इस प्रकार निवेदन कर सावधान कर रहे थे, मुख्य मंत्रियों के साथ सामन्त लोगों ने
और अन्य विख्यात राजाओं ने प्रणाम किया ॥३२॥
तं वन्दिनो नन्दितमित्रवर्गं नामान्वयज्ञा नमदाननेन्दुम् ।
गुणानगण्याननिशं गृणन्तः सन्तोषयामासुरसीमसत्त्वम् ॥३३॥
कुल के नामों को जानने वाले और रात दिन राव भोज के असंख्येय गुण गाने वाले
चारण भाटों ने मित्रवर्ग को प्रसन्न करने वाले, झुके हुये मस्तक वाले और महान् पराक्रमी राव
भोज को सन्तुष्ट किया ॥३३॥
(३२) आलोकशब्देन 'जयतु देवः, आलोकयतु देवः' इति शब्देन ।