सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशः सर्गः
तस्मिन् गते पुण्यकृतां प्रयाते प्रह्लादनामा तनयस्तदीयः ।
प्रह्लादयन् मानसमानतानां समुद्रकाञ्चीं सुमनाः शशास ॥ १ ॥
पृथ्वीराज के पुण्यात्मा पुरुषों की गति (स्वर्गलोक) प्राप्त करने पर उनके पुत्र प्रह्लाद,
विनीत जनों के मनों को आह्लाद देते हुए, समुद्ररशना पृथ्वी पर शासन करने लगे ॥ १ ॥
नितान्तभक्त्या भगवत्युपेन्द्रे सत्वप्रधानैश्च गुणैरगण्यैः ।
मनीषिणोऽमंसत मर्त्यमूर्ति प्रह्लादमेव क्षितिपालमेनम् ॥ २ ॥
असंख्य सत्वगुण प्रधान गुणों से और भगवान् विष्णु में आत्यन्तिक भक्ति होने से राजा
प्रह्लाद को बुद्धिमान् लोग मनुष्य-शरीरधारी प्रह्लाद ही मानते थे ॥ २ ॥
गोविन्दराजं रजसोज्झितात्मा तनूजमात्मीयपदेऽभिषिच्य ।
यशोवदातैः सुकृतैरुपार्त्तैः पौरन्दरे धाम्नि स निर्ववार ॥ ३ ॥
रजोगुण से विमुक्त मनवाले प्रह्लाद ने, राज्य-