सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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घरी घरी घटत छीजत जात छिन छिन,
भीजत ही गरि जात माटी कौ सौ ढेल है ।
मुक्ति हू कै द्वारे आइ सावधान क्यों न होई,
वार वार चढत न “त्रिया कौ सौ तेल है” ॥
करि लै सुकृत हरि भजन अखड उर,
याही मैं अन्तर परै यामैं ब्रह्म मेल है ।
मनुष जन्म पाउ जीति भावै हारि अब,
सुन्दर कहत यामैं जूवा कौ सौ खेल है ॥१३॥
जोवन कौ गयौ राज और सब भयौ साज,
आपुनि दुहाई फेरि दामामौ वजायौ है ।
लकुटी हथियार लिये नैनन की ढाल दीये,
सेत वार भये ताकौ तंबू सौ तनायौ है ॥
दशन गये सु मानौ, दरवान दूरि कीये,
झींगरी परी सु औरै बिछौना बिछायौ है ।
सीस कर कंपत सु सुन्दर निकार्यौ रिपु,
देषत ही देषत बुढापौ दौरि आयौ है ॥१४॥
(१३) सुकृत-सत्कर्म । और-भेद, दूरी । भावै-चाहे ।
(१४) सेतवार-सफेद बाल । दशन, दात । झींगरी
परी-चमड़ी सिकुड़ गई ।