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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 227

२१८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
तीजौ वाचिक विलास सु तौ सब बेदौ माहि,
बरनि कै जहा लग बचन ते कह्यौ है ।
चौथौ ब्रह्म कौ विलास तिहू कौ अभाव जहा,
सुन्दर कहत वह अनुभै तै लह्यौ है ॥२१॥
जीवत ही देवलोक जीवत ही इन्द्रलोक,
जावत ही जन तप सति लोक आयौ हे !
जीवत ही बिधि लोक जीवत ही शिव लोक,
जीवत बैकुण्ड लोक जो अकुण्ठ गायौ है ।
जीवत ही मोक्षशिला जीवत ही भिस्त मांहि,
जीवत ही निकट परम पद पायौ है ।
आत्मा कौ अनुभव जिनकौ जीवत भयौ,
सुन्दर कहत तिन सशय मिटायौ है ॥२२।
इच्छा ही न प्रकृति न महत्तत्त अहकार,
त्रिगुन न व्योम आदि शब्दादि न कोइ है ।
श्रवणादि बचनादि देवता न मन आदि,
सूक्षिम न स्थूल पुनि एक ही न दोइ है ॥
(२१) मायाविलास-माया का खेल या निर्माण ।
प्रपच-विस्तार ।
(२२) सति-सत्य । भिस्त-वहिस्त, स्वर्ग ।